जैविक खाद

अमृत घोल

 

विशेषतायें
i. मिट्टी में मुख्य पोषक तत्व (नाइट्रोजन, फास्फोरस, पोटाश) के जीवाणुओं की संख्या में वृद्धि करता है।
ii. शीघ्र तैयार होने वाली खाद है।
iii. मिट्टी को पोली करके जल रिसाव में वृद्धि करता है।
iv. मिट्टी को भुरभुरा बनाता है तथा भूमि की उत्पादकता में वृद्धि करता है।
v. फसलों पर कीट व रोगों का प्रकोप कम करता है।
vi. स्थानीय संसाधनों से बनाया जा सकता है।
vii. इसको बनाने की विधि सरल व सस्ती है।

आवश्यक सामग्री

 

गौमूत्र                               1 ली. (देशी गाय)

जीवाणु खाद मिट्टी के लिये वरदान

पौधों की उचित वृद्धि एवं ज्यादा उपज के लिये नाइट्रोजन, स्फूर, पोटाश तथा अन्य पोषक तत्वों की आवश्यकता होती है । यह पोषक तत्व रासायनिक खाद द्वारा पौधों को उपलब्ध कराये जाते हैं । मिट्टी में कुछ ऐसे भी सूक्ष्मजीवी जीवाणु है जो पौधों को मिट्टी में डाले गये पोषक तत्वों को उपलब्ध कराने में मदद करते हैं । जब ऐसे जीवाणुओं की संख्या  प्रयोगशाला में बढ़ा कर ठोस माध्यम में मिश्रित कर पैकेट के रूप में किसानों को उपलब्ध कराये जायें तो उसे ''जीवाणु खाद'' कहते हैं ।

मटका खाद

विशेषतायें
i. स्थानीय संसाधनों से तैयार किया जाता है।
ii. यह तकनीक सरल, सस्ती और प्रभावशाली है।
iii. पौधों में वानस्पतिक वृद्धि तेजी से करती है।
iv. भूमि में मित्र जीवाणुओं की संख्या बढ़ाता है।
v. भूमि की उर्वरा शक्ति में वृद्धि करता है और उत्पादन बढ़ाता है। 
vi. इसके उपयोग से रासायनिक खादों पर निर्भरता कम होगी।
vii. फसल की गुणवत्ता में वृद्धि होती है।

आवश्यक सामग्री

 

गौमूत्र                                     15 ली. (देशी गाय)

गाय का ताजा गोबर                     15 कि.ग्रा.

पंचगव्य

प्राचीन काल से ही भारत जैविक आधारित कृषि प्रधान देश रहा है। हमारे ग्रन्थों में भी इसका उल्लेख किया गया है। पंचगव्य का अर्थ है पंच+गव्य (गाय से प्राप्त पाँच पदार्थों का घोल) अर्थात गौमूत्र, गोबर, दूध, दही, और घी के मिश्रण से बनाये जाने वाले पदार्थ को पंचगव्य कहते हैं। प्राचीन समय में इसका उपयोग खेती की उर्वरक शक्ति को बढ़ाने के साथ पौधों में रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाने के लिए किया जाता था।
 

विशेषतायें

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