जल प्रबन्धन

जल संसाधन पानी के वह स्रोत हैं जो मानव के लिए उपयोगी हों या जिनके उपयोग की संभावना हो। पानी के उपयोगों में शामिल हैं कृषि, औद्योगिक, घरेलू, मनोरंजन हेतु और पर्यावरणीय गतिविधियों में। वस्तुतः इन सभी मानवीय उपयोगों में से ज्यादातर में ताजे जल की आवश्यकता होती हैधरातलीय जल या सतही जल पृथ्वी की सतह पर पाया जाने वाला पानी है जो गुरुत्वाकर्षण के प्रभाव में ढाल का अनुसरण करते हुए सरिताओं या नदियों में प्रवाहित हो रहा है अथवा पोखरों, तालाबों और झीलों या मीठे पानी की आर्द्रभूमियों में स्थित है। किसी जलसम्भर में सतह के जल की प्राकृतिक रूप से वर्षण और हिमनदों के पिघलने से पूर्ति होती है और वह प्राकृतिक रूप से ही महासागरों में निर्वाह, सतह से वाष्पीकरण और पृथ्वी के नीचे की ओर रिसाव के द्वारा खो जाता है।
हालाँकि कि किसी भी क्षेत्रीय जल तंत्र में पानी का प्राकृतिक स्रोत वर्षण ही है और इसकी मात्रा उस बेसिन की भौगोलिक अवस्थिति और आकार पर निर्भर है। इसके अलावा एक जल तंत्र में पानी की कुल मात्रा किसी भी समय अन्य कई कारकों पर निर्भर होती है। इन कारकों में शामिल हैं झीलों, आर्द्रभूमियों और कृत्रिम जलाशयों में भंडारण क्षमता; इन भण्डारों के नीचे स्थित मिट्टी की पारगम्यता; बेसिन के भीतर धरातलीय अपवाह के अभिलक्षण; वर्षण की अवधि, तीव्रता और कुल मात्रा और स्थानीय वाष्पीकरण का स्तर इत्यादि। यह सभी कारक किसी जलतंत्र में जल के आवागमन और उसके बजट को प्रभावित करते हैं।
मानव गतिविधियाँ इन कारकों पर एक बड़े पैमाने पर प्रभाव डाल सकती हैं। मनुष्य अक्सर जलाशयों का निर्माण द्वारा बेसिन की भंडारण क्षमता में वृद्धि और आद्रभूमि के जल को बहा कर बेसिन की इस क्षमता को घटा देते हैं। मनुष्य अक्सर अपवाह की मात्रा और उस की तेज़ी को फर्शबन्दी और जलमार्ग निर्धारण से बढ़ा देते हैं।
किसी भी समय पानी की कुल उपलब्ध मात्रा पर ध्यान देना भी जरूरी है। मनुष्य द्वारा किये जा रहे जल उपयोगों में से बहुत सारे वर्ष में एक निश्चित और अल्प अवधि के लिये ही होते हैं। उदाहरण के लिए अनेक खेतों को वसंत और ग्रीष्म ऋतु में पानी की बड़ी मात्रा की आवश्यकता होती है और सर्दियों में बिल्कुल नहीं। ऐसे खेत को पानी उपलब्ध करने के लिए, सतह जल के एक विशाल भण्डारण क्षमता की आवश्यकता होगी जो साल भर पानी इकठा करे और उस छोटे समय पर उसे प्रवाह कर सके जब उसकी आवश्यकता हो। वहीं दूसरी ओर कुछ अन्य उपयोगों को पानी की सतत आवश्यकता होती है, जैसे की विद्युत संयंत्र जिस को ठंडा करने के लिए लगातार पानी चाहिये। ऐसे बिजली संयंत्र को पानी देने के लिए सतह पर प्रवाहित जल की केवल उतनी ही मात्रा को भंडारित करने की आवश्यकता होगी कि वह नदी में पानी के कम होने की स्थिति में भी बिजली संयंत्र को शीतलन के लिये पानी उपलब्ध करा सके।
दीर्घकाल में किसी बेसिन के अन्दर वर्षण द्वारा पानी की कितनी मात्रा की पूर्ती की जाती है यही उस बेसिन की मानव उपयोगों हेतु जल उपलब्धता की ऊपरी सीमा होती है।
प्राकृतिक धरातलीय जल की मात्रा को किसी दूसरे बेसिन क्षेत्र से नहर या पाइप लाइन के माध्यम से आयात द्वारा संवर्धित किया जा सकता है। मनुष्य प्रदूषण द्वारा जल को 'खो' सकता है (यानी उसे बेकार बना सकता है)।
मीठे जल के भण्डारों के मामले में ब्राज़ील दुनिया सबसे अधिक जल भण्डार रखने वाला देश है जिसके बाद बाद दूसरे और तीसरे स्थान पर हैं रूस और कनाडा।

पानी की कमी का कारण कम बरसात नहीं है |

पानी की कमी का कारण कम बरसात नहीं है

किसी एक राज्य में नहीं सम्पूर्ण भारत में पानी की समस्या निर्माण हो गई है, इसका मुख्य कारण सिर्फ सूखा नहीं है, पिछले कई सालों से हमारा वाटर लेवल नीचे-नीचे जा रहा है, अच्छी बरसात होने पर वाटर लेवल में कुछ सुधार आता है, परन्तु हर साल नीचे जा रहा है, जब तक इस समस्या पर विचार नहीं किया जायेगा, तब तक पानी की समस्या बनी रहेगी |