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हम खेती को नौकरियों से अव्वल कब मानेंगे

हम खेती को नौकरियों से अव्वल कब मानेंगे

रूस में अरबपति कारोबारी और नौकरी पेशा भी कर रहे खेती की ओर रुख

यूरोपीय देश ग्रीस के वर्तमान आर्थिक संकट पर पूरी दुनिया में बवाल मचा हुआ है। आखिर क्या वजहें हो सकती हैं, जिससे इस देश की अर्थव्यवस्था चकनाचूर हो गई? मैं कोई पेशेवर अर्थशास्त्री नहीं, ना ही कोई विद्वान, लेकिन आपसी चर्चाओं पर गौर करूं तो कहीं ना कहीं युवाओं में स्वावलंबी होने के लिए नकारापन होना एक बड़ी समस्या के तौर पर देखा जा सकता है। ग्रीस की समस्या एक सांकेतिक इशारा है, दुनिया के अन्य देशों के लिए।

 

आज़ाद देश में बेबस अन्नदाता

आज़ाद देश में बेबस अन्नदाता

भारत एक कृषि प्रधान देश है , किसान अन्नदाता है,देश की अर्थव्यवस्था में 70%कृषि का योगदान है सदियों से हम लोग कुछ जुमलो को दोहराते रहे है । निःसंदेह भारत की पिछले हजार दो हजार साल की अर्थ व्यवस्था कृषि पर आधारित रही है हांलाकि यह इस अर्थ में सही है कि अधिकांश लोग कृषि कार्य करते थे, और कृषि कार्य के आधार पर ही अपनी जीविका चलाते थे।

कृषि प्रधान देश में किसान क्यों है बेहाल ?

कृषि प्रधान देश  में किसान क्यों बेहाल ?

एक साल पहले फरवरी मार्च के दिनों में देश की राजधानी दिल्ली में तमिलनाडु के बदहाल किसान पहुंचे थे. उनके प्रतिरोध को हथकंडा, नाटक और फोटोशूट की संज्ञा देने वालों की कोई कमी नहीं थी. डॉयचे वेले में प्रकाशित एक आलेख में बताया गया था कि 2004-05 और 2007-08 में कृषि सेक्टर की सालाना औसत वृद्धि दर पांच फीसदी थी I  लेकिन 2008-09 और 2013-14  में ये गिर कर तीन फीसदी रह गई. इन्हीं अवधियों में अर्थव्यवस्था में क्रमशः नौ और सात फीसदी की सालाना औसत वृद्धि दर्ज की गी. कृषि की बदहाली का ठीकरा खराब मौसम की स्थितियों पर फोड़ा गया है I  

सबका साथ-सबका विकास में किसान शामिल क्यों नहीं ?

सबका साथ-सबका विकास में किसान शामिल क्यों नहीं ?

भाजपा सरकार का कहना है कि वो किसानों के मुद्दों को लेकर संजीदा हैं. बीते साल कई जनसभाओं में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कहा कि भाजपा सरकार 2022 तक किसानों की आय को दोगुना करने का संकल्प रखती है और इसी दिशा में आगे बढ़ रही है.

प्रधानमंत्री का कहना था कि किसानों की बेहतरी के लिए कृषि उत्पादों की मूल्य वृद्धि के लिए उन्होंने किसान संपदा योजना की घोषणा की है जो "सच्चे अर्थ में देश की अर्थव्यवस्था को एक नया आयाम देगा."

कृषि और किसानों की मुस्कुराहट का आएगा नया दौर

कृषि और किसानों की मुस्कुराहट का आएगा नया दौर

निःसन्देह वर्ष 2017 कृषि संकट का वर्ष रहा। देश के कई राज्यों में मौसम की मार से जूझते किसानों ने लाभकारी मूल्य पाने के लिये आन्दोलन किए, वहीं उत्तर प्रदेश, महाराष्ट्र, पंजाब, राजस्थान, कर्नाटक, आन्ध्र प्रदेश आदि राज्यों ने किसानों के हजारों करोड़ रुपए के ऋण माफ किए। बीते वर्ष किसानों को मिली निराशाओं और चिन्ताओं को ध्यान में रखते हुए नए वर्ष 2018 में केन्द्र सरकार कृषि व किसानों को सर्वोच्च प्राथमिकता देती दिखेगी।

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