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जैविक खेती करने के तरीके

परिक्रमण :-

एक ही क्षेत्र में वर्ष दर वर्ष एक ही प्रकार की फसल उगाने से मिट्टी की उर्वरता कम होती है और मिट्टी में कीट, रोग और घास-फूस की पैदावार को बढ़ावा देता है. फसल को हर साल अलग-अलग जगह पर ले जाना चाहिए और वापिस से मूल क्षेत्र में कई सालों तक वापिस नही ले जाना चाहिए. सब्जियों के लिए कम से कम ३-४ साल का परिक्रमण की सिफारिश की गयी है. 

फसल परिक्रमण का मतलब है जहा मिट्टी की उर्वरता बढाई जाती है. विभिन्न प्राकृतिक शिकारियों को भी यह मदद करता है, उनके लिए विविध निवास और भोजन स्त्रोत उपलब्ध कराके ताकि वो खेत पर जीवित रह सके. 

खाद :-

खेती की लागत कम करने के उपाय

 खेती की लागत कम करने के उपाय

खेती को लाभदायक बनाने के लिए दो ही उपाय हैं- उत्पादन को बढ़ाएँ व लागत खर्च को कम करें। कृषि में लगने वाले मुख्य आदान हैं बीज, पौध पोषण के लिए उर्वरक व पौध संरक्षण, रसायन और सिंचाई। खेत की तैयारी, फसल काल में निंदाई-गुड़ाई, सिंचाई व फसल की कटाई-गहाई-उड़ावनी आदि कृषि कार्यों में लगने वाली ऊर्जा की इकाइयों का भी कृषि उत्पादन में महत्वपूर्ण स्थान है। इनका उपयोग किया जाना आवश्यक है, परंतु सही समय पर सही तरीके से किए जाने पर इन पर लगने वाली प्रति इकाई ऊर्जा की क्षमता को बढ़ाया जा सकता है। इनका अपव्यय रोककर व पूर्ण या आंशिक रूप से इनके विकल्प ढूँढकर भी लागत को कम करना संभव है। इस दिशा में किए गए क

बीज उत्पादन प्रौद्योगिकी

बीज उत्पादन प्रौद्योगिकी

फसल उत्पादन में वृद्धि के विभिन्न कारकों में से उन्नत बीज एक महत्वपूर्ण कृषि निवेष है। क्यों कि यदि बीज खराब है, तो शेष अन्य साधनों (उर्वरक, सिंचाई आदि) पर किया गया खर्च व्यर्थ हो जाता है। तात्पर्य यह है कि कृषि सम्बन्धी सभी साधन जैसे बीज, उर्वरक, कीटनाशी, सिंचाई तकनीकी जानकारी आदि महत्वपूर्ण एवं एक दूसरे के पूरक भी हैं, परन्तु इनमें बीज को सबसे महत्वपूर्ण कारक माना जाता है। भारत में कई गैर-सरकारी संस्थानों (जैसे-कृषि विश्वविद्यालयों, कृषि अनुसंधान, कृषि विभाग, बीज विकास निगम एवं प्राइवेट कम्पनियॉ) द्वारा बीज उत्पादन किया जा रहा है, परन्तु उसका उत्पादन उतना नहीं है जितनी कि मॉग हेै। लगभग सम

भारत को 450 साल पहले भी थी अलनीनो की जानकारी

अलनीनो

मौसम वैज्ञानिक भले ही अब अलनीनों को लेकर हल्ला मचाये हुये हैं। मौसम वैज्ञानिकों का दावा है कि अलनीनो के कारण किसानों पर अभी और मार पड़ेगी, क्योंकि प्रशांत महासागर पर बनने वाले अलनीनो के कारण आने वाली खरीफ की फसल पर भी असर पड़ेगा। इस अलनीनो के कारण बरसात के मौसम में मानसून ही नहीं आयेगा और सूखा पड़ेगा। जबकि इस सच को कवि घाघ ने 450 साल पहले अपनी कहावतों में ही लिख दिया था। घाघ ने लिखा है कि एक बून्द चैत में परे, सहस बून्द सावन की हरे। इसके अलावा उन्होंने लिखा है कि माघ में गर्मी जेठ में जाड़ तो कहे घाघ हम सब होवें उजाड़। इसका मतलब है कि चैत (मार्च) में एक बून

राष्ट्र-विकास में कृषि की घटती हिस्सेदारी

राष्ट्र-विकास में कृषि की घटती हिस्सेदारी

 देश के सकल विकास में कृषि की हिस्सेदारी साल दर साल घटती जा रही है। सरकार की अपनी ही रिपोर्ट बताती है कि यह छह वर्षों में 19 प्रतिशत से घटकर 14 प्रतिशत पर आ गई है। यह इस तथ्य के बावजूद है कि देश में अनाज का उत्पादन काफी बढ़ा है और सरकारी खरीद के कारण हमारे गोदाम न सिर्फ जरुरत से ज्यादा भरे हैं बल्कि तमाम अनाज बाहर खुले में भी रखना पड़ा है। कृषि की घटती हिस्सेदारी का एक दूसरा अर्थ यह भी है कि किसान खेती छोड़कर अन्य कार्यों में लग रहे हैं तथा कृषि योग्य जमीन घट रही व लागत बढ़ रही है। कृषि प्रधान देश होने के नाते भारत के लिए यह स्थिति ठीक नहीं कही जा सकती। देश में कृषि पर निर्भरता

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