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जैविक खेती : एक विकल्प (समस्याएं एवं संभानाएं )

जैविक खेती : एक विकल्प (समस्याएं एवं संभानाएं ) राधा कान्त

 एक अरब 20 करोड़ से भी अधिक जनसंख्या वाले देश में कृषि प्रणाली में बदलाव एक सुविचारित प्रक्रिया द्वारा होनी चाहिए, जिसके लिए काफी सावधानी और सतर्कता बरतने की जरूरत है। खाद्य, रेशा, ईन्धन, चारा और बढ़ती जनसंख्या के लिए अन्य जरूरतों की पूर्ति के लिए कृषि भूमि की उत्पादकता और मृदा स्वास्थ्य में सुधार लाना जरूरी है। स्वतन्त्रता पश्चात युग में हरित क्रान्ति ने खाद्य के क्षेत्र में आत्मनिर्भरता के लिए विकासशील देशों को रास्ता दिखाया है, किन्तु सीमित प्राकृतिक संसाधन के बल पर कृषि पैदावार कायम रखने के लिए रासायनिक कृषि के स्थान पर जैविक कृषि पर विशेष जोर दिया जा रहा है, क्योंकि रासायनिक कृषि से जह

लघु एवं सीमान्त कृषक तथा ग्रामीण विकास

ग्रामीण विकास से तात्पर्य ग्रामीण क्षेत्र की सामाजिक एवं आर्थिक स्थिति में संरचनात्मक परिवर्तन से लगाया जाता है जो ग्रामीण क्षेत्र में रहने वाले निम्न आय वर्ग के जीवन स्तर में सुधार लाने के लिए किये जाते हैं। इससे एक ओर तो देश के आर्थिक विकास में अवरोध उत्पन्न करने वाले तत्वों जैसे अत्यधिक गरीबी, अत्याचार, अत्यन्त निम्न उत्पादकता एवं ग्रामीण समाज का शोषण और उत्पीड़न से मुक्ति दिलाई जाती है तो दूसरी तरफ उनके विकास की प्रक्रिया को तीव्र करने एवं स्वतः सम्पोषणीय बनाने के लिए उन्हें बुनियादी सेवाएँ प्रदान की जाती हैं तथा आधारभूत ढाँचे को सुधारा जाता है। जैसे सिंचाई हेतु पर्याप्त मात्रा में विद्

जिन्दा रहने के लिए किसान संगठित और रचनात्मक संघर्ष करे

खेती कईली जीए-ला, बैल बिकागेल बीए-ला, यह लोकोक्ति मिथिला के ग्रामीण क्षेत्रों में खूब बोली जाती है। इसका अर्थ भी बताना चाहूंगा। किसान खेती करता है जीने के लिए लेकिन जब खेती करने के दौरान खेती का प्रधान औजार ही बिक जाये तो वैसी खेती करने का कोई औचित्य नहीं रह जाता है। पहले खेती के लिए हल-बैल महत्वपूर्ण साधन होता था लेकिन किसानों को बीज के लिए अगर बैल जैसे खेती के महत्वपूर्ण साधन बेचना पडे इससे बडी विडंवना और क्या हो सकती है। क्या सचमुच आज खेती और खेती करने वालें खेरूतों की स्थिति बदतर हो गयी है? इस बात का पता लगाने के लिए हमें एक विहंगम दृष्टि देश की खेती पर डालना होगा।

बर्बाद और बदहाल होता 'अन्नदाता

बर्बाद और बदहाल होता 'अन्नदाता

किसानों की बेबसी, लाचारी, उसकी तकलीफें आज टीवी चैनलों और अखबारों की सुर्खियां बनती है। किसान फसलों की बर्बादी की वजह से खुदकुशी कर रहे हैं। कहीं कोई किसान, तो किसी जगह पर किसान का पूरा परिवार खुदकुशी कर रहा है। हम इन खबरों को पढ़कर विचलित नहीं होते क्योंकि इनसे हमारा सरोकार ना के बराबर होता है। लेकिन एक बार अगर आप मदर इंडिया फिल्म मौका निकालकर देखें (ना देखी हो तो) आपकी आंखें भर आएंगी। इस फिल्म में किसानों की बदहाल और दर्दनाक तस्वीर को बेहद बारीकि से सेल्यूलाइड के पर्दे पर दिखाया गया था। कैसे एक किसान साहूकार के हाथों कर्ज के बोझ से दबता चला जाता है और उसकी जिंदगी ही नहीं बल्कि पूरा परिवार

किसान परेशान अन्नदाता' के पेट पर लात आखिर कब तक?

 परेशान अन्नदाता'

एक प्रचलित कहावत है कि 'किसी के पेट पर लात मत मारो भले ही उसकी पीठ पर लात मार दो।' मगर इस देश में आज से नहीं, सदियों से, गुलामी से लेकर आजादी तक, पाषाण युग से लेकर आज वैज्ञानिक युग तक, बस एक ही काम हो रहा है और वह काम यह है कि हम अपने अन्नदाता, अपने पालनहार, किसान के पेट पर लात मारते ही चले जा रहे हैं।
 
आखिर इस अन्नदाता का दोष क्या है? यही न कि वह अपने हाथ से इस देश की 100 करोड़ आबादी को निवाला खिला रहा है। जिस पालनहार की पूजा होनी चाहिए, इबादत होनी चाहिए, उसका स्वागत सम्मान होना चाहिए, उस किसान के पेट पर लात मारी जा रही है। आखिर कब तक चलेगा यह दौर? और क्यों चलेगा?

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