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बदल रहे हैं अनाज के कटोरे

 deष के अनाज के कटोरे

करीब 50 साल पहले प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री को देशवासियों से यह अपील करनी पड़ी थी कि वे दिन में एक वक्त खाना न खाएं. 1965 के सूखे के बाद देश में अनाज की आपूर्ति काफी तंग हो गई थी और देशभक्ति की भावना के तहत अनाज के अतिशय उपभोग के खिलाफ चेताया जा रहा था. लोगों से कहा जा रहा था: आप खाने के बाद जितना छोड़ देते हैं, बाकी लोगों के पास उतना भी नहीं है.

ताकि कृषि उत्पादन में कमी न आए

ताकि कृषि उत्पादन में कमी न आए

पृथ्वी का बढ़ता तापमान और जलवायु परिवर्तन के आगाज ने विषम परिस्थितियाॅं उत्पन्न कर दी हैं। औसत तापमान, औसत वर्षा और वायु प्रकृति में बदलाव से मौसम में बदलाव का असर अब कृषि में दिखने लगा है। ऐसी स्थितियों के चलते फसलों का उत्पादन प्रभावित हो रहा है। मौसम की अनिश्चितता को देखते हुए कुछ उपाय अपनाए जा रहे हैं। फसल चक्र में परिवर्तन किया जाकर खाद्यान्न उत्पादन को बरकरार रखा जा रहा है। फिर भी मौसम परिवर्तन की चुनौतियाॅं विकराल होती जा रही हैं।  पिछले 10 वर्षों में पृथ्वी का तापमान 1 से 3 डिग्री सेल्सियस तक बढ़ गया है। अंतर्राष्ट्रीय जलवायु परिवर्तन संस्था ने ऐसा आंकलन कर कहा है कि बदली स्थिति में म

भारत में कृषि की बढती चुनौतियाँ एवं समस्याएँ

भारत में कृषि की बढती चुनौतियाँ एवं समस्याएँ

कृषि भारतीय अर्थव्यवस्था की केन्द्रबिन्दु व भारतीय जीवन की धुरी है। आर्थिक जीवन का आधार, रोजगार का प्रमुख स्रोत तथा विदेशी मुद्रा अर्जन का माध्यम होने के कारण कृषि को देश की आधारशिला कहा जाए तो कोई अतिश्योक्ति नहीं होगी। देश की कुल श्रमशक्ति का लगभग 52 प्रतिशत भाग कृषि एवं कृषि से सम्बन्धित क्षेत्रों से ही अपना जीविकोपार्जन कर रही हैं। अतः यह कहना समीचीन होगा कि कृषि के विकास, समृद्धि व उत्पादकता पर ही देश का विकास व सम्पन्नता निर्भर है।

जैविक खेती : एक विकल्प (समस्याएं एवं संभानाएं )

जैविक खेती : एक विकल्प (समस्याएं एवं संभानाएं ) राधा कान्त

 एक अरब 20 करोड़ से भी अधिक जनसंख्या वाले देश में कृषि प्रणाली में बदलाव एक सुविचारित प्रक्रिया द्वारा होनी चाहिए, जिसके लिए काफी सावधानी और सतर्कता बरतने की जरूरत है। खाद्य, रेशा, ईन्धन, चारा और बढ़ती जनसंख्या के लिए अन्य जरूरतों की पूर्ति के लिए कृषि भूमि की उत्पादकता और मृदा स्वास्थ्य में सुधार लाना जरूरी है। स्वतन्त्रता पश्चात युग में हरित क्रान्ति ने खाद्य के क्षेत्र में आत्मनिर्भरता के लिए विकासशील देशों को रास्ता दिखाया है, किन्तु सीमित प्राकृतिक संसाधन के बल पर कृषि पैदावार कायम रखने के लिए रासायनिक कृषि के स्थान पर जैविक कृषि पर विशेष जोर दिया जा रहा है, क्योंकि रासायनिक कृषि से जह

लघु एवं सीमान्त कृषक तथा ग्रामीण विकास

ग्रामीण विकास से तात्पर्य ग्रामीण क्षेत्र की सामाजिक एवं आर्थिक स्थिति में संरचनात्मक परिवर्तन से लगाया जाता है जो ग्रामीण क्षेत्र में रहने वाले निम्न आय वर्ग के जीवन स्तर में सुधार लाने के लिए किये जाते हैं। इससे एक ओर तो देश के आर्थिक विकास में अवरोध उत्पन्न करने वाले तत्वों जैसे अत्यधिक गरीबी, अत्याचार, अत्यन्त निम्न उत्पादकता एवं ग्रामीण समाज का शोषण और उत्पीड़न से मुक्ति दिलाई जाती है तो दूसरी तरफ उनके विकास की प्रक्रिया को तीव्र करने एवं स्वतः सम्पोषणीय बनाने के लिए उन्हें बुनियादी सेवाएँ प्रदान की जाती हैं तथा आधारभूत ढाँचे को सुधारा जाता है। जैसे सिंचाई हेतु पर्याप्त मात्रा में विद्

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