Aksh's blog

आमदनी बढ़े तो फांसी क्यों चढ़ें किसान

आमदनी बढ़े तो फांसी क्यों चढ़ें किसान

मुझे चार दशक हो गए हैं अर्थशास्त्रियों की एक-सी बातें सुनते कि किसान उत्पादकता बढ़ाने के लिए तकनीक का प्रयोग करें, लागत घटाएं, फसलों में विविधता अपनाएं, सिंचाई क्षमता बढ़ाएं व बिचौलियों के चंगुल से बचने के लिए इलेक्ट्रॉनिक ट्रेडिंग के प्लेटफॉर्म पर जाएं। उनकी मूलत: यही धारणा है कि कृषि संकट मुख्य रूप से किसानों की देन है, क्योंकि उन्होंने आधुनिक तकनीक व नई किस्मों का उपयोग नहीं किया। या वे बैंक कर्ज का उपयोग करना नहीं जानते। वे उत्पादन लागत को कम नहीं कर पा रहे हैं। वे कृषि आय में बढ़ोतरी के लिए फसल उत्पादन में वृद्धि के पक्ष में रहे हैं। यह भी कहा जाता है कि आज के दौर में किसान तभी बचे रह सकत

जैविक कृषि का अर्थ है पंचतत्वों से संतुलन बनाकर चलना

जैविक कृषि का अर्थ है पंचतत्वों से संतुलन बनाकर चलना

विद्वानों का मानना है कि सम्पूर्ण सृष्टि पंचतत्वों से बनी है। पंचतत्व यानि धरती, जल, अग्नि, वायु और आकाश। मानव हो या पशु−पक्षी या फिर पेड़−पौधे, सबमें इन पंचतत्वों का वास है। किसी में कोई एक तत्व प्रधान है, तो किसी में कोई दूसरा। जैसे मछली के लिए जल तत्व प्रधान है, तो पेड़−पौधों के लिए धरती। इसके बिना वे जीवित नहीं रह सकते। मानव भी वायु के बिना कुछ मिनट, जल के बिना कुछ दिन, अन्न के बिना कुछ महीने, अग्नि अर्थात ऊर्जा और आकाश अर्थात खालीपन के बिना भी कुछ दिन ही चल सकता है, पर इसके बाद उसे भी यह संसार छोड़ना पड़ता है।

मन, विचार और कर्म में सूखा

मन, विचार और कर्म में सूखा

चार सदी पहले ही लोककवि 'घाघ" कह गए थे कि 'खेत बेपनियां जोतो तब, ऊपर कुंआ खुदाओ जब", यानी किसान पहले कुंआ खोदे (यानी सिंचाई का समुचित इंतजाम कर ले), फिर उसके बाद ही खेत को जोते। तब गंगा, जमुना, गोदावरी, सिंधु, कावेरी जैसी नदियों में भी साफ शीतल जल छलकता था और दूरदराज के इलाकों में भी कुंआ खोदते ही पानी मिल जाया करता था। लेकिन आजादी के बाद जब किसान उत्पादक के बजाय महज एक वोट बैंक बन गया तो चुनाव-दर-चुनाव हर राजनीतिक पार्टी किसानों को मुफ्त बिजली-पानी देने के वादे करने लगी। जल कभी भी भुनाया जा सकने वाला चेक है, ऐसा मान लिए जाने से आदतें और बिगड़ गईं।

बढ़ता सूखे का संकट, तनावग्रस्त केंद्र सरकार

बढ़ता सूखे का संकट, तनावग्रस्त केंद्र सरकार

सूखे को लेकर सुप्रीम कोर्ट की फटकार झेल चुकी सरकार पर दबाव बढ़ता जा रहा है। सोमवार को राष्ट्रीय खरीफ सम्मेलन में कृषि मंत्री राधामोहन सिंह ने कहा "दस राज्यों में भयंकर सूखा है। स्थिति बहुत खराब है। पीने का पानी लोगों को नहीं मिल पा रहा है। लेकिन जो चित्र बन रहा है उससे लगता है कि 10 राज्यों में सर्वनाश हो गया है।" जाहिर है कृषि मंत्री राधामोहन सिंह तनाव में हैं। सुप्रीम कोर्ट की फटकार के बाद सरकार के लिए जवाब देना मुश्किल हो गया है।

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