Aksh's blog

उर्वरता की हिंसक भूमि

उर्वरता की हिंसक भूमि

खेतों में उर्वरता बढ़ाने के लिए, नाइट्रोजन के उर्वरक पाने के लिए यूरोप दुनिया के कोने-कोने खंगाल रहा था। ऐसा एक स्रोत था ‘गुआनो’। यह आता था दक्षिण अमेरिका के पश्चिमी छोर से दूर, प्रशांत महासागर के द्वीपों से। गुआनो असल में चिड़िया की बीट है। इन निर्जन द्वीपों पर न जाने कब से समुद्री चिड़ियाओं का वास था, जो समुद्र से मछली और दूसरे प्राणियों का शिकार करती हैं। अनगिनत इन चिड़ियों की बीट इन द्वीपों पर जम जाती थी और वहां इनके पहाड़ खड़े हो गए थे। बारिश कम होने के कारण ये पहाड़ जैसे के तैसे बने रहे और इनके उर्वरक गुण धुले नहीं थे। कुछ जगह तो बीट के ये पहाड़ 150 फुट से भी ऊंचे थे।

अब कौन कहेगा सूट-बूट की सरकार? - लॉर्ड मेघनाद देसाई

अब कौन कहेगा सूट-बूट की सरकार? - लॉर्ड मेघनाद देसाई

वर्तमान राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय परिस्थितियों में वित्त मंत्री अरुण जेटली द्वारा प्रस्तुत किया गया बजट बहुत ही संतुलित और सधा हुआ है। बजट में ग्रामीण भारत की चिंताओं और समस्याओं को विशेष तौर पर ध्यान में रखा गया है। ऐसा पहली बार है जब किसी वित्त मंत्री ने अपने बजट भाषण में कृषि क्षेत्र और किसानों पर विशेष ध्यान केंद्रित किया और एक तय सीमा अवधि में किसानों की आय को न सिर्फ बढ़ाने, बल्कि उसे दोगुना करने का लक्ष्य निर्धारित किया। यह एक अच्छी पहल है, क्योंकि सेवा और अन्य क्षेत्रों में देश की तमाम आर्थिक तरक्की के बावजूद किसान लगातार बदहाल हो रहे थे और खुद को उपेक्षित भी महसूस कर रहे थे।

किंतु-परंतु के साथ एक बेहतर बजट - सीता

बजट

ऐसा नहीं है कि वित्त मंत्री अरुण जेटली ने जो बजट पेश किया है, वह बेहतर बजट नहीं है, लेकिन यह वह धुआंधार बजट नहीं है, जिसकी कि उनसे उम्मीद की जा रही थी। इस बजट में बहुत सारे ऐसे बिंदु हैं, जिनकी जीभर के सराहना की जा सकती है, फिर भी यह एक महान बजट होने की दहलीज पर जाकर ठिठक गया आम बजट है।

देश में अन्नदाता का कोई दर्जा है क्या ?

देश में अन्नदाता का कोई दर्जा है क्या

देश में नेता हो या अभिनेता या फिर कोई लेखक सभी के सभी आतंकवाद, प्रदूषण, धार्मिक उन्माद, सामाजिक अंतद्र्वंद और महंगाई जैसी समस्याओं के पीछे अपना ध्यान लगाये बैठे है जो बोलते है या लिखते है उन सभी का विषय in के अतिरिक्त कुछ भी नही होता अभी ताजा हाल सभी को पता है असहिष्णुता के पीछे काफी बहस बनी रही काफी दिनों तक यह मुद्दा चर्चा का विषय भी बना रहा लेकिन इन सभी मुद्दों के मध्य कृषि प्रधान देश में कृषि की समस्याओं का मुद्दा हमेशा गौण रह जाता हैं इस विषय पर कोई बात नही करता नही । नेता जी तो अपने भाषण में केवल चुनावी मुद्दों के लिए ही कृषि और किसान की बात करते हैं उसके बाद अपनी पुस्तक में से वह नाम

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