Aksh's blog

खेती से मोहभंग खतरे की घंटी

खेती से मोहभंग खतरे की घंटी

खेती से मोहभंग खतरे की घंटीकिसी कृषि प्रधान देश के लिए इससे बुरी खबर नहीं हो सकती कि उस देश के किसान अपने पेशे से पलायन करने लगें। जी हां, किसानों के खेती से मुंह मोड़ने की बात अब तक मीडिया में ही पढ़ने को मिलती थी। अब केन्‍द्रीय कृषि मंत्रालय की स्‍थाई समिति ने भी अपनी रिपोर्ट में यह बात मान ली है। इसे सरकार की उदासीनता कहें या फिर बदलती परिस्थितियां कि किसान अपनी उपज से लागत तक नहीं निकाल पा रहे हैं। खेती से किसानों का मोहभंग का हाल क्‍या है इसका अंदाजा इससे ही लगाया जा सकता है कि वर्ष 2001 में देश में 12 करोड़ 73 लाख किसान थे जो 2011 में घट कर 11 करोड़ 87 लाख रह गए। किसानों का खेती छोड़ने

आमदनी बढ़े तो फांसी क्यों चढ़ें किसान

आमदनी बढ़े तो फांसी क्यों चढ़ें किसान

मुझे चार दशक हो गए हैं अर्थशास्त्रियों की एक-सी बातें सुनते कि किसान उत्पादकता बढ़ाने के लिए तकनीक का प्रयोग करें, लागत घटाएं, फसलों में विविधता अपनाएं, सिंचाई क्षमता बढ़ाएं व बिचौलियों के चंगुल से बचने के लिए इलेक्ट्रॉनिक ट्रेडिंग के प्लेटफॉर्म पर जाएं। उनकी मूलत: यही धारणा है कि कृषि संकट मुख्य रूप से किसानों की देन है, क्योंकि उन्होंने आधुनिक तकनीक व नई किस्मों का उपयोग नहीं किया। या वे बैंक कर्ज का उपयोग करना नहीं जानते। वे उत्पादन लागत को कम नहीं कर पा रहे हैं। वे कृषि आय में बढ़ोतरी के लिए फसल उत्पादन में वृद्धि के पक्ष में रहे हैं। यह भी कहा जाता है कि आज के दौर में किसान तभी बचे रह सकत

जैविक कृषि का अर्थ है पंचतत्वों से संतुलन बनाकर चलना

जैविक कृषि का अर्थ है पंचतत्वों से संतुलन बनाकर चलना

विद्वानों का मानना है कि सम्पूर्ण सृष्टि पंचतत्वों से बनी है। पंचतत्व यानि धरती, जल, अग्नि, वायु और आकाश। मानव हो या पशु−पक्षी या फिर पेड़−पौधे, सबमें इन पंचतत्वों का वास है। किसी में कोई एक तत्व प्रधान है, तो किसी में कोई दूसरा। जैसे मछली के लिए जल तत्व प्रधान है, तो पेड़−पौधों के लिए धरती। इसके बिना वे जीवित नहीं रह सकते। मानव भी वायु के बिना कुछ मिनट, जल के बिना कुछ दिन, अन्न के बिना कुछ महीने, अग्नि अर्थात ऊर्जा और आकाश अर्थात खालीपन के बिना भी कुछ दिन ही चल सकता है, पर इसके बाद उसे भी यह संसार छोड़ना पड़ता है।

मन, विचार और कर्म में सूखा

मन, विचार और कर्म में सूखा

चार सदी पहले ही लोककवि 'घाघ" कह गए थे कि 'खेत बेपनियां जोतो तब, ऊपर कुंआ खुदाओ जब", यानी किसान पहले कुंआ खोदे (यानी सिंचाई का समुचित इंतजाम कर ले), फिर उसके बाद ही खेत को जोते। तब गंगा, जमुना, गोदावरी, सिंधु, कावेरी जैसी नदियों में भी साफ शीतल जल छलकता था और दूरदराज के इलाकों में भी कुंआ खोदते ही पानी मिल जाया करता था। लेकिन आजादी के बाद जब किसान उत्पादक के बजाय महज एक वोट बैंक बन गया तो चुनाव-दर-चुनाव हर राजनीतिक पार्टी किसानों को मुफ्त बिजली-पानी देने के वादे करने लगी। जल कभी भी भुनाया जा सकने वाला चेक है, ऐसा मान लिए जाने से आदतें और बिगड़ गईं।

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