किंतु-परंतु के साथ एक बेहतर बजट - सीता

बजट

ऐसा नहीं है कि वित्त मंत्री अरुण जेटली ने जो बजट पेश किया है, वह बेहतर बजट नहीं है, लेकिन यह वह धुआंधार बजट नहीं है, जिसकी कि उनसे उम्मीद की जा रही थी। इस बजट में बहुत सारे ऐसे बिंदु हैं, जिनकी जीभर के सराहना की जा सकती है, फिर भी यह एक महान बजट होने की दहलीज पर जाकर ठिठक गया आम बजट है।

अरुण जेटली का यह नवरत्न बजट (नौ विशेष स्तंभ, कर प्रस्तावों की नौ श्रेणियां) प्रथम दृष्टया तो एक संपूर्ण बजट लगता है, क्योंकि इसमें लगभग हर आयाम को छुआ गया है। कृषि, जी हां! छोटे व्यवसाय, जी हां! बुनियादी ढांचा, जी हां! मध्यवर्ग, जी हां! रोजगार निर्माण, जी हां! लेकिन इसके बावजूद किंतु-परंतु की गुंजाइश इसमें रह गई है।

इस बजट की सबसे अच्छी बात यह है कि कृषि और ग्रामीण अर्थव्यवस्था को इसमें खासी तवज्जो दी गई है। शायद इसकी उम्मीद भी की जा रही थी। खासतौर पर इस बात के लिए सरकार की सराहना की जानी चाहिए कि वह देशभर के किसानों को न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) का लाभ मिले, यह सुनिश्चित करना चाहती है। अभी यह स्थिति थी कि सरकार द्वारा अधिग्रहीत की जाने वाली फसलों का 80 प्रतिशत हिस्सा महज पांच राज्यों तक ही सीमित था। इससे एमएसपी के लाभ भी व्यापक पैमाने तक नहीं पहुंच पाते थे। लेकिन अब जेटली ने कहा है कि अन्य राज्यों को भी विकेंद्रीकृत अधिग्रहण के लिए प्रोत्साहित किया जाएगा। अब दलहन फसलें भी अधिग्रहीत की जाएंगी और यह प्रक्रिया ऑनलाइन संपन्न् होगी। लेकिन अब सरकार को किसानों को इस बारे में सजग भी करना होगा। अभी यह हालत है कि दूरदराज के क्षेत्रों में बसे किसानों को अधिग्रहण की कीमतों या उनके केंद्रों के बारे में पता ही नहीं होता है।

यह भी एक अच्छी बात है कि ग्रामीण कर्जों के लक्ष्य को बढ़ाया गया है और सरकार ने ब्याज दरों की भी चिंता की है। यह निश्चित ही किसानों द्वारा बड़े पैमाने पर की जा रही आत्महत्याओं पर अंकुश लगाने के लिए है। लेकिन क्या इससे बात बनेगी? अध्ययनों द्वारा पता चलता है कि ग्रामीण क्षेत्रों में दिए जाने वाले कर्जों का बड़ा हिस्सा उन सक्षम किसानों के हिस्से में चला जाता है, जिनके बैंक खाते होते हैं। छोटे किसानों व काश्तकारों के पास ऐसी कोई सुविधा नहीं होती, लिहाजा ब्याज में छूट के लाभ उन तक पहुंच ही नहीं पाते।

सरकार ने सुनिश्चित किया है कि बुनियादी ढांचे की परियोजनाओं पर जमकर पैसा लगाया जाए, खासकर रेल और सड़क मार्ग निर्माण पर, जिससे रोजगार के अवसर सृजित होंगे और सार्वजनिक परिवहन की स्थिति में भी सुधार आएगा। बजट में रेलमार्ग और सड़कों के निर्माण के लिए 2 लाख 18 हजार करोड़ रुपयों का प्रावधान किया गया है, लेकिन यह बजट में दिए गए कैपिटल एक्सपेंडिचर के आंकड़ों से मेल नहीं खाता।

लेकिन यह साफ है कि सरकार ने सार्वजनिक क्षेत्र की योजनाओं के लिए दिल खोलकर पैसा दिया है। सरकार एक नई स्वास्थ्य संरक्षण योजना प्रारंभ करने जा रही है, वह और नवोदय विद्यालय खोलेगी, उच्च शिक्षा के 20 संस्थानों को विश्व स्तर के संस्थान के रूप में विकसित करेगी, इत्यादि। लेकिन क्या 20 संस्थानों को विश्व स्तर का बनाने भर का संकल्प लेने से शिक्षा की गुणवत्ता में सुधार आएगा? या सरकार उच्च शिक्षा में वित्तीय अधोसंरचना में सुधार के लिए कोई हायर एजुकेशन फाइनेंस एजेंसी गठित करेगी? जरूरत देश को इस मानसिकता से बाहर लाने की भी है कि शिक्षा से मुनाफा कमाना एक बुरी बात है। आखिर सरकार उच्च शिक्षा के क्षेत्र को नियंत्रणमुक्त ही क्यों नहीं कर देती? यह उसकी न्यूनतम शासन वाली फिलॉस्फी के भी अनुरूप होगा।

वित्तीय क्षेत्र में सुधारों के लिए प्रस्तावित पैकेज निश्चित ही प्रभावी है और इससे अर्थव्यवस्था मजबूत होगी। कराधान संबंधी प्रस्तावों का जोर कर प्रणाली को सरल बनाने और मध्यवर्ग के हाथ में ज्यादा से ज्यादा पैसा देने पर है। कालाधन को लेकर भी सरकार ने व्यावहारिक दृष्टिकोण दिखाया है। एक बड़ी सकारात्मक घोषणा आधार को कानूनी दर्जा दिए जाने संबंधी है। जैम थ्योरी (जनधन, आधार और मोबाइल) को बढ़ावा देने के लिए यह जरूरी भी था। उर्वरक सबसिडी के डायरेक्ट कैश ट्रांसफर के लिए सरकार एक और पायलट प्रोजेक्ट चलाना चाहती है, जो कि यकीनन सराहनीय है।

इसके बावजूद यह एक अद्भुत बजट क्यों नहीं है? यह एक अद्भुत बजट तब होता, जब सरकार केंद्रीय जीएसटी (एक्साइज ड्यूटी और सेवाकर मिलाकर) के लिए जोर लगाती। उसने ऐसा किया नहीं। आज जब जीएसटी बिल पर लगातार राजनीतिक अवरोध बना हुआ है, ऐसे में सरकार ऐसा करके एकतरफा ढंग से कर प्रणाली को सरलीकृत कर सकती थी। वह यूपीए सरकार द्वारा अतीत की तारीख से लागू होने वाले करों में किए संशोधनों को हटा सकती थी। अभी तो जेटली ने केवल यह उम्मीद भर जताई है कि अदालत में चल रहे मुकदमे अपनी कानूनी परिणति तक पहुंचेंगे। लेकिन रेट्रोस्पेक्टिव टैक्सेशन को लेकर जिस तरह के टैक्स टेररिज्म के आरोप लगाए जाते हैं, उसको देखते हुए तो सरकार द्वारा उठाए गए कदम नाकाफी ही कहे जा सकते हैं।

यदि सरकार निजीकरण की नीति को लेकर और साहसी कदम उठाती, तब यह धमाकेदार बजट कहलाता। सरकार ने सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रमों के रणनीतिपूर्ण विक्रय की बात जरूर कही है, लेकिन इसका कोई रोडमैप नहीं दिया है। उल्टे विनिवेश विभाग का नाम बदलकर निवेश और सार्वजनिक संपत्ति प्रबंधन विभाग करने की बात कही है। यह निजीकरण की नीति को लेकर असमंजस जाहिर करने वाला कदम है, क्योंकि तब सार्वजनिक उपक्रम वाला विभाग क्या करेगा? यह एक बेहतरीन बजट तब होता, जब सरकार नए कर लगाने के अपने लोभ का संवरण कर पाती, लेकिन अब करयोग्य सेवाओं पर कृषि कल्याण उपकर लगा दिया गया है। कुछ कारों पर भी उपकर लगाया गया है। और क्लीन एनर्जी उपकर को बढ़ा दिया गया है। कई मायनों में यह एक बेहतर बजट है, लेकिन चंद किंतु-परंतु के साथ!

 

(लेखिका वरिष्ठ पत्रकार हैं। ये उनके निजी विचार हैं)