डाकघर व कृषि विज्ञान केंद्र के रास्ते बीज क्रांति की तैयारी

पूसा स्थित भारतीय कृषि अनुसंधान संस्थान के वैज्ञानिक देशभर में फैले डाकघर और कृषि विज्ञान केंद्र के नेटवर्क का इस्तेमाल कर बीज क्रांति लाने की तैयारी में जुटे हैं। योजना के तहत किसानों को उन्नत प्रजाति के बीजों के उत्पादन का प्रशिक्षण दिया जाएगा। इसके लिए पूसा संस्थान की ओर से व्यापक मॉडल तैयार किया गया है। परियोजना के लिए पूसा संस्थान की ओर से उत्तर प्रदेश के सीतापुर, बिहार के बक्सर, मध्य प्रदेश के शिवपुर तथा राजस्थान के सिरोही के डाकघरों का चयन किया गया है।

फसलों के जहरीले तत्वों पर अब होगा नियंत्रण

जीन साइलेंसिंग तकनीक पर रिसर्च होगा। इस तकनीक के माध्यम से फसलों के हानिकारक टॉक्सिन्स (जहरीले तत्वों) को दूर किया जाएगा। इससे कुछ हानिकारक तत्वों की वजह से अनुपयोगी कही जाने वाली फसलें उपायोगी हो जाएंगी। अभी इस तकनीक का इस्तेमाल कुछ विकसित देशों में हो रहा है।

बिना पानी के अब पैदा होगा गेहूं!

किसानों को जल्द ही गेहूं की ऐसी वैरायटी उपलब्ध कराई जाएंगी, जिसकी खेती बहुत कम पानी के इस्तेमाल से की जा सकती है। अब तक गेहूं की फसल कम से कम छह सिंचाई में अच्छी पैदावार देती है, लेकिन नई किस्में आने के बाद सिर्फ दो सिंचाई में ही गेहूं की फसल ली जा सकेगी। 

इंडियन काउंसिल ऑफ एग्रीकल्चर रिसर्च (नई दिल्ली) ने वैज्ञानिकों द्वारा ईजाद की गईं ऐसी आठ किस्मों को ट्रायल के लिए कृषि अनुसंधान केंद्रों को भेजा है। बुलंदशहर के अनुसंधान केंद्र पर एक सफल ट्रायल हो चुका है, जबकि दूसरे परीक्षण की रिपोर्ट अप्रैल तक आ जाएगी। 

जलवायु परिवर्तन का कृषि पर प्रभाव

climate change

जलवायु परिवर्तन की चुनौती भले ही रोजमर्रा की आजीविका के संघर्ष एवं व्यस्त दिनचर्या में लीन लोगों के लिए महज खबर या अकादमिक विषय सामग्री हो। लेकिन सच्चाई तो यह है कि हवा, पानी, खेती, भोजन, स्वास्थ्य, आजीविका एवं आवास आदि सभी पर प्रतिकूल असर डालने वाली इस समस्या से देर-सबेर, कम-ज्यादा हम सभी का जीवन प्रभावित होता है, चाहे वह समुद्री जल-स्तर बढ़ने से प्रभावित होते तटीय या द्वीपीय क्षेत्रों के लोग हों या असामान्य मानसून अथवा जल संकट से त्रस्त किसान। विनाशकारी समुद्री तूफान का कहर झेलते तटवासी हों अथवा सूखे एवं बाढ़ की विकट स्थितियों से त्रस्त लोग। असामान्य मौसम जनित अजीबो-गरीब बीमारियों से जूझते

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