गन्ने में सफेद सुंडी का रोग अब लाइलाज नहीं

गन्ना, मूंगफली और आलू आदि फसलों पर कहर बनकर टूटने वाली सफेद सुंडी (ह्वाइट ग्रब) जिसे सफेद लट और सफेद गिलार के नाम भी जाना जाता है, अब लाइलाज नहीं रह गई है। भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (आईसीएआर) के राष्ट्रीय कृषि उपयोगी कीट ब्यूरो के वैज्ञानिकों ने ऐसी तकनीक विकसित की है, जिसके जरिए इस रोग का सौ फीसदी इलाज संभव हो सका है। इसके तहत मित्र कीटों के जरिए सफेद कीटों का खात्मा किया जाता है। वैज्ञानिकों ने किसानों की सुविधा के लिए इस तकनीक को पाउडर के रूप में भी विकसित किया है। जिसे पौधारोपण के समय ही मिट्टी में मिला दिया जाता है। इसके बाद पाउडर से पैदा होने वाले मित्र कीट स्वयं ही सफेद सुंडी का काम

उन्नतिशील प्रजातियां ही उत्कृष्ट खेती का आधार

गन्ना शोध परिषद के निदेशक डॉ. बीएल शर्मा ने मध्य प्रदेश से आई टीम को ‘मुख्यमंत्री खेत दर्शन’ योजना के तहत तमाम जानकारियां दीं। बताया कि उन्नतशील प्रजातियां ही उत्कृष्ट खेती का आधार होती हैं। इसलिए स्वीकृत प्रजातियाें की बुवाई करना चाहिए। साथ ही प्रमाणिक पौधशालाओं से बीज लेना चाहिए। इसके लिए उन्होंने मृदा का हेल्थ कार्ड बनवाने के बारे में भी बताया। कहा कि इससे मृदा प्रदूषण कम होने के साथ ही उत्पादन लागत में भी कमी आएगी। बताया कि किसान खेत की मिट्टी संस्थान लेकर आएं। इससे उनके खेत का हेल्थ कार्ड बन जाएगा। 

भूजल संकट : कृषि के लिए घातक

water problem

वर्तमान में कृषि, पशु-पालन, उद्योग-धंधों तथा पेयजल हेतु नदी जल व भूजल का ही सर्वाधिक उपयोग हो रहा है। उक्त उपयोगार्थ नदी जल से पर्याप्त पूर्ति न होने के फलस्वरूप भूजल का पर्याप्त दोहन किया जाता है। फलतः भूजल स्तर 1 से 1.5 मीटर प्रतिवर्ष के हिसाब से नीचे गिरता जा रहा है। परिणामस्वरूप भूजल के ऊपरी जल स्रोत सूख रहे हैं। अतः जल जल की आवश्यकता की पूर्ति हेतु भूजल के निचले एवं गहरे जल स्रोतों का दोहन किया जा रहा है, इनमें अधिकांश जल लवणीय गुणवत्ता का मिल रहा है। इसके कारण मृदा स्वास्थ्य खराब होने के कारण फसलोत्पादन व मानव स्वास्थ्य पर इसके अवांछित परिणाम स्पष्ट अनुभव किए जा रहे हैं। इसके साथ ही प

जल प्रदूषण/जल संकट

“जल (H2O) में सामान्यतः कुछ लाभाकरी खनिज लवण संतुलित आहार के कुछ अंश के रूप में विद्यमान रहते हैं, परंतु इसमें जहरीले रसायनों, कीटाणुओं, अस्वच्छता आदि की उपस्थिति ही जल प्रदूषण है।”

पृथ्वी पर लगभग 70 प्रतिशत पानी है जिसका 3 प्रतिशत ही पेय रूप में है, बाकी अपेय/अशुद्ध है। इस 3 प्रतिशत पेयजल का लगभग 90 प्रतिशत से भी अधिक भाग भूगर्भ जल के रूप में है, जिसका जल-स्तर अधिकाधिक और अविवेकपूर्ण दोहन, अपव्यय और संरक्षणहीनता और अपुन्रभरण के कारण खतरनाक रूप से घट रहा है और मोटरपंपों, ट्यूबवेलों से निकाला गया भूगर्भ जल तेजी से प्रदूषित हो रहा है।

Pages