गेहूं-गन्ना छोड़ मेंथा और खस उगा रहे किसान

छोटे किसानों की खेती के तौर तरीकों में आ रहे इस बदलाव के बारे में बताते हुए केंद्रीय औषधीय एवं सगंध पौधा संस्थान (सीमैप) के प्रमुख वैज्ञानिक एके सिंह कहते हैं, ”छोटी जोत के किसानों को इनकी खेती करने से ज्य़ादा लाभ मिलता है। जहां धान और गेेहंू जैसी पारंपरिक फसलों से किसान को अधिकतम 50 हज़ार रुपए प्रति हैक्टेयर मुनाफा मिलता है वहीं पिपरमिंट जैसी फसलों से एक हैक्टेयर में मुनाफा 1 लाख रुपए तक मिल सकता है। औषधीय एवं सगंध फसलें बाज़ार में अच्छे दामों पर बिक भी जाती हैं।”

विद्यालयों में किसान पढ़ेंगे खेती का ककहरा

विद्यालयों में किसान पढ़ेंगे खेती का ककहरा

फसलों की पैदावार बढ़ाने के लिए किसानों को और स्मार्ट किए जाने की योजना है। उनके लिए किसान विद्यालय खोले जाएंगे। इनमें उन्हें प्रशिक्षण दिया जाएगा। योजना के तहत बरेली में 15 किसान विद्यालय खुलेंगे। एक विद्यालय पर 50 हजार रुपये खर्च होंगे। अग्रणी काश्तकार किसानों को प्रशिक्षण देंगे। यह काम खरीफ फसलों के सीजन में शुरू होगा।

नीलगायों के आतंक से छोड़ी खेती

दर्जनों गाँवों में कुछ किसानों ने खेती छोड़ी है तो कुछ ने मक्का, गन्ना और दहलनी फसलों को बोना बंद कर दिया है। गाँवों के अधिकतर किसान अब गेहूं, धान के अलावा मेंथा की खेती करते हैं जिसमें नीलगाय कम से कम नुकसान करती हैं, जबकि कुछ ने खेती को बटाई या ठेके पर देकर दूसरा व्यवसाय चुन लिया है।

गुजिया से बचाने को आम के तने में बांधे पॉलिथीन

 आम के पेड़ों के लिए बौर आने का समय सबसे अहम होता है। अगर ऐसे में किसी कीट या रोग का हमला होता है तो पेड़ के उस हिस्से में फल नहीं आते। यह कहना है केंद्रीय एकीकृत नाशीजीव प्रबंधन केंद्र, लखनऊ के प्रमुख डॉ उमेश कुमार का।

डॉ उमेश ने बताया, ”इन कीटों से ज्यादातर नुकसान उन बगों में होता है जिनकी किसान ज्य़ादा देख-रेख नहीं करते हैं। ज्यादातर कीटों या रोगों की जब शुरुआत होती है, तो सचेत किसान जल्दी इसके लक्ष्ण पहचान कर इसका इलाज करते हैं और फसल को बड़ा नुकसान नहीं हो पाता है।”

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