Organic Farming

जीरा की उन्नत खेती

जीरा का वानस्पतिक नाम है Cuminum cyminum । भारत में यह 'जीरा' या हिंदी में 'Zeera' के रूप में जाना जाता है। यह विभिन्न खाद्य तैयारी स्वादिष्ट बनाने के लिए भारतीय रसोई में इस्तेमाल एक महत्वपूर्ण मसाला है। जीरा का स्वाद एक वाष्पशील तेल की उपस्थिति की वजह से है। जीरा के स्वदेशी किस्मों में, इस वाष्पशील तेल 2.5-3.5% तक मौजूद है। जीरा बड़े पैमाने पर भी विशेष रूप से मोटापा, पेट दर्द और dyspesia जैसी स्थितियों के लिए विभिन्न आयुर्वेदिक दवाओं में इस्तेमाल किया जाता है।17.7% प्रोटीन, 23.8% वसा, 35.5% कार्बोहाइड्रेट और 7.7% खनिज इस प्रकार है: जीरा के पोषण का महत्व है।

इलायची की जैविक खेती

छोटी इलायची एक मध्य पूर्व के बाजार में मसाले के बाद की मांग की है। यह केरल, कर्नाटक और तमिलनाडु में खेती की जाती है। भारत इलायची के छोटे cardamom.In जैविक खेती का दूसरा सबसे बड़ा उत्पादक है, का पालन किया जाना तरीकों के प्रयोजन के लिए निर्धारित मानकों के अनुरूप होना चाहिए। विस्तृत कम से कम 25 मीटर की अलगाव बेल्ट सभी पारंपरिक वृक्षारोपण भर से छोड़ा जा सकता है। इस क्षेत्र से उपज जैविक रूप में इलाज नहीं किया जाएगा। तीन साल के एक रूपांतरण अवधि जैविक खेती के लिए एक मौजूदा वृक्षारोपण के लिए आवश्यक है। Replanted और नए लगाए क्षेत्रों के लिए, चौथे वर्ष से उपज के बाद ही जैविक उत्पाद के रूप में विचार क

बड़ी इलायची/लार्ज कार्डेमम की उन्नत खेती

व्यवसायिक स्तर पर इसको बड़ी इलायची/लार्ज कार्डेमम के नाम से जाना जाता है। जिन्जिबरेसी कुल के इस पौधे का वानस्पतिक नाम एमोमम सुबुलेटम है। तना 0.9-2.0 मीटर तक लम्बा पत्तियां 30-60 सेमी. लम्बी 6 से 9 सेमी. चौडी, रंग हरा व दोनों तरफ रोम रहित होती है। पुष्पवृंत गोल छोटे वृन्त वाला तथा सहपत्र लाल भूरे रंग के अधिक घने व अण्डाकार कटींले व नोकदार होते है। कैप्सूल (फल) 2.5 सेमी. गोलाकार, लाल भूरे रंग का घना व हल्का कण्टीला होता है।

उपयोग

लौंग की लाभकारी खेती

लौंग एक सदाबहार वृक्ष है और यह समय अति प्राचीन बाद से भारत में एक मसाले के रूप में इस्तेमाल किया गया है। लौंग नम कटिबंधों के एक सदाबहार पेड़ है।लौंग तटीय रेतीले इलाके में छोड़कर देश के सभी क्षेत्रों में उगाया जा सकता है। लेकिन केरल के लाल मिट्टी और पश्चिमी घाट के पर्वतीय इलाकों इसकी खेती के लिए सबसे उपयुक्त हैं।

मिट्टी आवश्यकताएँ
रिच, नम कटिबंधों के बलुई मिट्टी लौंग पेड़ों की व्यावसायिक खेती के लिए आदर्श मिट्टी हैं।

दालचीनी खेती एक लाभकारी खेती

दालचीनी का वानस्पतिक नाम है सिनामोन verum और यह एक मसाले के रूप में प्रयोग किया जाता है सूखे भीतरी छाल, जिनमें से एक सदाबहार पेड़ है। दालचीनी के पेड़ पूर्ण विकास पर 6-15 मीटर की ऊंचाई तक पहुंच है कि मध्यम लंबा पेड़ हैं। दालचीनी अति प्राचीन काल से कारोबार किया गया है कि सबसे पुराना ज्ञात मसालों में से एक है। दालचीनी स्वाभाविक रूप से पश्चिमी घाट के जंगलों में देखा है और व्यावसायिक रूप से केरल, कर्नाटक और तमिलनाडु में खेती की जाती है।

टिंडा की उन्नत खेती

भूमि :-

इसको बिभिन्न प्रकार की भूमियों में उगाया जा सकता है किन्तु उचित जलधारण क्षमता वाली जीवांशयुक्त हलकी दोमट भूमि इसकी सफल खेती के लिए सर्वोत्तम मानी गई है वैसे उदासीन पी.एच. मान वाली भूमि इसके लिए अच्छी रहती है नदियों के किनारे वाली भूमि भी इसकी खेती के लिए उपयुक्त रहती है कुछ अम्लीय भूमि में इसकी खेती की जा सकती है पहली जुताई मिटटी पलटने वाले हल से करें इसके बाद २-३ बार हैरो या कल्टीवेटर चलाएँ |

जलवायु :-

मूंग की आर्गेनिक खेती

 

मूँग एक प्रमुख फसल है। इसका वानस्पतिक नाम बिगना सैडिएटा है। यह लेग्यमिनेसी कुल का पौधा हैं तथा इसका जन्म स्थान भारत है। मूँग के दानों में २५% प्रोटिन, ६०% कार्बोहाइड्रेट, १३% वसा तथा अल्प मात्रा में विटामिन सी पाया जाता हैं।

लोबिया की उन्नत खेती

जलवायु लोबिया वर्षा तथा ग्रीष्म ऋतू में उगाई जाने वाली फसल है , दक्षिणी भारत में इसकी खेती रबी मौसम में भी की है जाती , लोबिया में मक्का की अपेक्षा सूखा तथा गर्मी को सहन करने की क्षमता अधिक होती है , इसकी खेती के लिए ट्रोपिकल तथा सब - ट्रोपिकल जलवायु उत्तम रहती है , इसकी खेती के लिए 12-15 डिग्री सेल्सियस तापक्रम अनुकूल रहता है , फसल की समुचित बढ़वार के लिए 27-35 डिग्री सेल्सियस तापक्रम अनुकूल रहता है , लोबिया की वृद्धि पर पाले तथा कम तापक्रम का बुरा प्रभाव पड़ता है 

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