Organic Farming

जैविक खेती-आय में वृद्धि-गाँव की समृद्धि

हमारे देश में जैविक खेती का इतिहास लग-भग ५००० साल से भी अधिक पुराना है. यह सजीव जैविक खेती ही थी,जिसने इतने लम्बे समय तक अनवरत अन्न उत्पादन के साथ मिटटी की उर्वरा शक्ति को बनाये रखा जिससे खाद्य सुरक्षा एवं पोषणीय सुरक्षा संभव हो सकती है.

जैविक खादों के गुण-

जैविक खेती की मुख्य आवश्यकता"केंचुआ खाद"

हम देखते हैं कि बरसात में केंचुए निकलते हैं. ये मल को खाकर मिटटी बनाते हैं. जब हम गाँव में रहते थे थे तो बच्चे बहुत सारे केंचुए पकड़ कर उसे कांटे में लगा कर मत्स्याखेट करते थे, गांवों में केंचुओं को मछली पकड़ने के लिए कांटे में लगा कर चारे के रूप में उपयोग में लिया जाता है, केंचुआ किसानो के लिए मित्र है, इसे"प्रकृति प्रदत्त हलवाहा"भी कहा जाता है.

गुलाब की जैविक उन्नत खेती,

जलवायु :-

यद्धपि इसके फूल साल भर प्राप्त होते है  लेकिन जाड़े की ऋतु में उच्च गुणवत्ता वाले एवं आकार में बड़े पुष्प प्राप्त होते है इसके फूलने का मुख्य समय मार्च माह है लेकिन कम तापमान होने पर अप्रैल के प्रथम सप्ताह तक अधिक संख्या में फूल आते रहते है फूलों की उत्तम पैदावार के  लिए प्रचुर मात्रा में धुप व आर्द्रता वाली जलवायु उपयुक्त रहती है |

भूमि :-

जिमीकंद की जैविक उन्नत खेती

जिमीकंद एक बहुवर्षीय भूमिगत सब्जी है जिसका वर्णन भारतीय धर्मग्रंथों में भी पाया जाता है। भारत के विभिन्न राज्यों में जिमीकंद के भिन्न-भिन्न नाम ओल या सूरन हैं। पहले इसे गृहवाटिका में या घरों के अगल-बगल की जमीन में ही उगाया जाता था। परन्तु अब तो जिमीकंद की व्यवसायिक खेती होने लगी है। जिमीकंद एक सब्जी ही नहीं वरन यह एक बहुमूल्य जड़ीबूटी है जो सभी को स्वस्थ एवं निरोग रखने में मदद करता है।

कुदरती खेती कैसे? मूल सिद्धान्त

कुदरती खेती के कुछ मूल सिद्धान्त हैं। मिट्टी में जीवाणुओं की मात्रा, भूमि की उत्पादकता का सब से महत्वपूर्ण अंग है। ये जीवाणु मिट्टी, हवा और कृषि-अवशेषों/बायोमास में प्राकृतिक रूप से उपलब्ध पोषक तत्त्वों को पौधों के प्रयोग लायक बनाते हैं। इस लिये मुख्यधारा के कृषि-वैज्ञानिक भी मिट्टी में जीवाणुओं की घटती संख्या से चिन्तित है। कीटनाशक फसल के लिये हानिकारक कीटों के साथ-साथ मित्र जीवों को भी मारते हैं। रासायनिक खादें भी मिट्टी में जीवाणओं के पनपने में बाधा पैदा करती हैं इसलिये सब से पहला काम है मिट्टी में जीवाणुओं की संख्या बढ़ाना। इस के लिए जरूरी है कि कीटनाशकों तथा अन्य रसायनों का प्र

कॉन्ट्रैक्ट खेती क्या है?

कई बार ये देखा गया है कि खऱीदार ना मिलने पर किसानों की फसल बर्बाद चली जाती है. इसके पीछे सबसे बड़ी वजह होती है किसान और बाज़ार के बीच तालमेल की कमी.

ऐसे में ही कॉन्ट्रैक्ट खेती की ज़रूरत महसूस की गई ताकि फसल की बर्बादी रोकी जाए और किसानों को भी उनके उत्पाद की मुनासिब कीमत मिल सके.

सरकार ने केंद्रीय कृषि नीति में, कॉन्ट्रैक्ट खेती के क्षेत्र में, निजी क्षेत्र की भागीदारी को बढ़ावा देने का ऐलान किया था.

कांट्रेक्ट खेती का मकसद है - फसल उत्पाद के लिए तयशुदा बाज़ार तैयार करना। इसके अलावा कृषि के क्षेत्र में पूँजी निवेश को बढ़ावा देना भी कांट्रेक्ट खेती का उद्देश्य है।

खरपतवार नाशी का उपयोग करते समय सावधानी बरते

खरपतवारनाशी आधुनिक कृषि विज्ञान की परम आवश्यकता है। खरपतवार नाशीयों से खरपतवार नियंत्रण करना मजदूरो द्वारा, यंत्रों द्वारा, शारीरिक शक्ति से अधिक मितव्ययी है। किसान भाईयों को खरपतवारनाशी का चयन करने से पहले निम्नलिखित बातों का ध्‍यान करना चाहिये:

• खरपतवार का प्रकार।

• फसल को जख्म।

• खरपतवार नाशीयों की कीमत

• मौसम का प्रभाव

• आधुनिक संरक्षण तरीके जैसे कम जुताई, न के बराबर जुताई।

 

जैविक खादों का मृदा उर्वरता और फसल उत्पादन में महत्व

भारत एक कृषि प्रधान देश है । जिसकी अधिकतर जनसंख्या गांवों में रहती है जहां अनेक प्रकार के खाधान्नों का उत्पादन होता है । वास्तव में खाध पदार्थों का सीधा संबंध जनसंख्या से है । इस प्रकार जनसंख्या के बढ़ने के साथ साथ ये आवश्यक हो गया है कि खाधानों का उत्पादन भी बढाया जाए अतः घास के मैदान एवं जंगलों से काट कर भूमि को अधिक ऊपजाऊ बनाया जा रहा है ताकि खाधानों की उत्पादकता को बढाया जा सके लेकिन प्रदुषण मृदा अपरदन जैसी समस्याएं सामने आ रही है।

श्री विधि से खेती में बढ़ती है धान की पैदावार

आधुनिक और उन्नत तरीके से श्री विधि द्वारा धान की खेती, के अंतर्गत बिचड़ा खेत की सूखे में 2 या 3 बार जुताई की जाती है जिससे मिटटी नम हो जाती है और घास तथा कीड़े खत्म हो जाते हैं. इस मिटटी में करीब 50 किलो सड़ा हुआ गोबर या भरमी कम्पोस्ट मिला दिया जाता है. वर्षा होने पर खेत को 2 या 3 बार जोत दिया जाता है और अंतिम जोताई में 2 किलो यूरिया, 4 किलो डी.ए.पी.

उत्तर प्रदेश में धान की उन्नतशील खेती

धान की फसल में महावार महत्वपूर्ण कार्य बिन्दु – नर्सरी डालना :

मई

१ पंत-४ सरजू-५२ आई.आर.-३६ नरेन्द्र ३५९ आदि।
२ धान के बीज शोधन बीज को १२ घन्टे पानी मे भिगोकर तथा सुखाकर नर्सरी में बोना।

जून

१ धान की नर्सरी डालना। सुगन्धित प्रजातियां शीघ्र पकने वाली।
२ नर्सरी में खैरा रोग लगने पर जिंक सल्फेट तथा यूरिया का द्दिडकाव सफेदा रोग हेतु फेरस सल्फेट तथा यूरिया का द्दिडकाव
३ धान की रोपाई
४ रोपाई के समय संस्तुत उर्वरक का प्रयोग एवं रोपाई के एक सप्ताह के अंदर ब्यूटाक्लोर से खरपतवार नियंत्रण

Pages