Organic Farming

उत्‍तर भारत में खरीफ मौसम में प्‍याज की खेती

उत्‍तरी भारत में प्‍याज रबी की फसल है यहां प्‍याज का भंडारण अक्‍टूबर माह के बाद तक करना सम्‍भव नही है क्‍योकि कंद अंकुरित हो जाते हैं।

इस अवधि‍(अक्‍टूबर से अप्रैल) में उत्‍तर भारत में प्‍याज की उपलब्‍ध्‍ता कम होने तथा परिवहन खर्चे के कारण दाम बढ जाते हैं। इसके समाधान के लिए कृषि वैज्ञानिकों ने उत्‍तर भारत के मैदानो में खरीफ में भी प्‍याज की खेती के लिए एन-53(N-53) तथा एग्रीफाउंड डार्क रैड नामक प्‍याज की किस्‍मों का विकास किया है।

प्‍याज की किस्‍म : एन-53(आई.ए.आर.आई.); एग्रीफाउंड डार्क रैड (एन.एच.आर.डी.एफ.)

प्याज की उन्नत खेती

कन्द वर्गीय सब्जीयों में व्यापारिक दृषिटकोण से प्याज का बहुत अधिक महत्व है। भारतीय आहार में प्याज का बहुत अधिक उपयोग होता है। वर्तमान फास्ट-फूड के जमाने में इसका महत्व और अधिक बढ़ गया है। सब्जीयाें के गाढ़ेपन व स्वाद बढ़ाने के अतिरि ä प्याज से कुछ औषघीय तत्व भी शरीर को मिलते हैं, जिसके कारण हृदय रोग, खेन में थôा बनना व कोलेस्ट्राल आदि विकारों पर नियंत्रण रखने मेंं मदद होती है। इसी प्रकार मसाले, केचप, साँस आदि पदार्थाों में भी प्याज का उपयोग किया जाता है। निर्जलिकृत प्याज की चकितयाँ व पावडर की माँग विदेशें में अधिक है। सफेद प्याज को निर्जलिकृत पर चकितयाँ व पावडर बनाने के कारखाने महाराष्ट्र व

टमाटर में लगने वाले कीट एवं रोग और उनका प्रबंधन

प्रमुख कीट

टमाटर में रोपाई से लेकर फसल की कटाई तक बड़ी संख्या में कीटों और रोगों द्वारा किया जाता है । कीड़े जैसे फल छेदक, माहू, सफेद मक्खी, पत्ती खनिक, बदबूदार कीड़े और मकड़ी के कण उपज को कम करते हैं अपितु ये टमाटर पत्ती कर्ल वायरस जैसे संयंत्र रोगों को फैलने में  मदद करते हैं ।

टमाटर फल छेदक

वयस्क: स्टाउटमध्यम आकार, अग्रपंख के केंद्र के मध्य में गहरे धब्बे होते हैं । पिछले पंख पीले रंग के, साथ में ही काले भूरे रंग की सीमा एवं पीले रंग का मार्जिन पाया जाता है ।

धान की खेती में पानी की खपत करें कम

सूखा प्रतिरोधी धान की खेती करना अब मुमकिन हो गया है। शुक्र है कि गेहूं की तरह अब चावल उगाने के लिए तकनीक उपलब्ध हो गई है। इसका मतलब यह हुआ कि धान के खेत को हमेशा पानी से भरा हुआ रखे बिना भी इसकी खेती की जा सकती है। नई तकनीक से धान की फसल के लिए पानी की जरूरत में 40 से 50 फीसदी तक कम करने में मदद मिलेगी। भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (आइसीएआर) और फिलिपींस स्थित अंतरराष्ट्रीय चावल अनुसंधान संस्थान (आइआरआरआइ) ने संयुक्त रूप से यह तकनीक विकसित की है। इस परियोजना में कटक स्थित केंद्रीय चावल अनुसंधान संस्थान (सीआरआरआइ) की भी भागीदारी है।

मलबरी रेशमकीट पालनः आजीवि‍का का उत्तम साधन

मलबरी रेशमकीट को विभिन्न जलवायु स्थितियों और विस्तृत क्षेत्र वाली मिट्टी में उगाया जा सकता है। बेहतर पद्धतियों को अपनाकर कोकुन की अच्छी उपज प्राप्त की जा सकती है। लेकिन इसके लिए अधिक ऊपज देने वाली उत्तम किस्म की पत्ती का होना आवश्यक शर्त है। रेशमकीट का पालन लार्वा अवधि के दौरान पाँच विभिन्न चरणों से होते हुए होती है। लार्वा अवधि में उसे विशेष रूप से निर्मित रेशमकीट पालन शेड में रखा जाता है। साथ ही, उच्च कोटि का रेशम प्राप्त करने के लिए उचित समय पर प्रबंध और गहन देखभाल की जाती है।

मलबरी कृषि और रेशमकीट पालन की सर्वोत्तम पद्धतियाँ

पटसन उत्पादन का आर्थिक विश्लेषण एवं विपणन प्रबन्धन

पटसन भारत के पूर्वी व उत्तर राज्यों में उगाई जाने वाली एक महत्वपूर्ण पर्यावर्णीय अनुकूल रेशा फसल है | इसकी खेती लगभग 8 लाख हेक्टर में लगभग 40 लाख लघु व सीमान्त कृषकों द्वारा की जाती है | पश्चिम बंगाल पटसन के क्षेत्रफल एवं उत्पादन में देश का एक अग्रणी राज्य है | इसके अलावा इसकी खेती बिहार, असम, ओड़ीशा, त्रिपुरा, मेघालय तथा उत्तर प्रदेश में की जाती है | वर्तमान दशक में नवीनतम कृषि तकनीकों एवं क्षेत्रफल विस्तार के कारण इसकी राष्ट्रीय उत्पादकता 23.0 कु॰/हे॰ तथा वर्ष 2012-2013 में लगभग 103.4 लाख बेल का उत्पादन हुआ है | विभिन्न कारणों से पटसन उत्पादक राज्यों में  इसकी  औसत उत्पादकता में कृषकों के

खेती की लागत कम करने केउपाय

खेती को लाभदायक बनाने के लिए दो ही उपाय हैं- उत्पादन को बढ़ाएँ व लागत खर्च को कम करें। कृषि में लगने वाले मुख्य आदान हैं बीज, पौध पोषण के लिए उर्वरक व पौध संरक्षण, रसायन और सिंचाई। खेत की तैयारी, फसल काल में निंदाई-गुड़ाई, सिंचाई व फसल की कटाई-गहाई-उड़ावनी आदि कृषि कार्यों में लगने वाली ऊर्जा की इकाइयों का भी कृषि उत्पादन में महत्वपूर्ण स्थान है।

इनका उपयोग किया जाना आवश्यक है, परंतु सही समय पर सही तरीके से किए जाने पर इन पर लगने वाली प्रति इकाई ऊर्जा की क्षमता को बढ़ाया जा सकता है। इनका अपव्यय रोककर व पूर्ण या आंशिक रूप से इनके विकल्प ढूँढकर भी लागत को कम करना संभव है। 

सब्जी बगीचा निर्माण के आर्थिक लाभ

साग-सब्जियों का हमारे दैनिक जीवन में महत्वपूर्ण स्थान है विशेषकर शाकाहारियों के जीवन में। शाक-सब्जी भोजन के ऐसे स्रोत है जो हमारे पोषक मूल्य को ही नहीं बढ़ाते बल्कि उसके स्वाद को भी बढ़ाते हैं। पोषाहार विशेषज्ञों के अनुसार संतुलित भोजन के लिए एक वयस्क व्यक्ति को प्रतिदिन 85 ग्राम फल और 300 ग्राम साग-सब्जियों की सेवन करनी चाहिए। परन्तु हमारे देश में साग-सब्जियों का वर्त्तमान उत्पादन स्तर प्रतिदिन, प्रतिव्यक्ति की खपत के हिसाब से मात्र 120 ग्राम है।

सब्जी बगीचा

एक उत्तम कोटि का खाद कृमि खाद

अपशिष्ट या कूड़ा-करकट का मतलब है इधर-उधर बिखरे हुए संसाधन। बड़ी संख्या में कार्बनिक पदार्थ कृषि गतिविधियों, डेयरी फार्म और पशुओं से प्राप्त होते हैं जिसे घर के बाहर एक कोने में जमा किया जाता है। जहाँ वह सड़-गल कर दुर्गंध फैलाता है। इस महत्वपूर्ण संसाधन को मूल्य आधारित तैयार माल के रूप में अर्थात् खाद के रूप में परिवर्तित कर उपयोग में लाया जा सकता है। कार्बनिक अपशिष्ट का खाद के रूप में परिवर्तन का मुख्य उद्देश्य केवल ठोस अपशिष्ट का निपटान करना ही नहीं अपितु एक उत्तम कोटि का खाद भी तैयार करना है जो हमारे खेत को उचित पोषक तत्व प्रदान करें।
 

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