Organic Farming

प्राकृतिक हलवाहा केंचुआ

कहा जाता है कि मनुष्य धरती पर ईष्वर की सबसे खूबसूरत रचना है। डार्विन के ‘योग्यतम की उत्तरजीविता’ सिद्धांत के अनुसार मनुष्य सभी प्रजातियों में श्रेष्ठ प्रजाति है। लेकिन जीव विज्ञानी क्रिस्टोलर लाॅयड ने अपनी पुस्तक ‘व्हाट आॅन अर्थ इवाॅल्व्ड’ में पृथ्वी पर मौजूद 100 सफल प्रजातियों की सूची में केंचुए को सबसे ऊपर रखा है। उनके अनुसार केंचुआ धरती पर लगभग 60 करोड़ वर्षों से मौजूद है। जबकि मानव प्रजाति धरती पर लगभग 16 लाख वर्ष पूर्व से उपस्थित है। 

मृदा उर्वरता बनाए रखने के लिए हरी खाद का उपयोग

हरी खाद की प्रक्रिया पर लंबे समय से चल रहे प्रयोगों व शोध कार्यों से सिद्ध हो चुका है कि हरी खाद का प्रयोग अच्छे व निरोगी फसल उत्पादन के लिए बहुत उपकारी है। भारत में हरी खाद के अंतर्गत 49.5 लाख हेक्टेयर क्षेत्रफल है। हरी खाद के लिए मुख्य रूप से दलहली फसलें उगाई जाती हैं। इसकी जड़ों में गांठें होती हैं। इन ग्रंथियों में विशेष प्रकार के सहजीवी जीवाणु रहते हैं जो वायुमंडल में पाई जाने वाली नाइट्रोजन का यौगिकीकरण करके मृदा में नाइट्रोजन की पूर्ति करते हैं। इस प्रकार से स्पष्ट है कि दलहनी फसलें मृदा की भौतिक दशा को सुधारने के अलावा उसमें जीवांश पदार्थ एवं नाइट्रोजन की मात्रा भी बढ़ाती हैं। दलहनी

टमाटर को सहारा (स्टेकिंग) देना व फलो की तुड़ाई एवं भंडारण

टमाटर के फलो के उत्तम व आकर्षक रंग, उनको सड़ने से बचाने के लिये एवं फलो के उचित आकार के लिये खास तौर पर अनिर्धारित वृद्धि वाले किस्मो को सहारा देना आवश्यक होता है। चुंकि टमाटर का पौधा शाकीय होता है एवं लदे हुये फलो का भार सहन नही कर पाता इसलिये जमीन मे फल सहित इसकी शाखाएं गिर जाती है। यदि पौधे को सहारा नही दिया जाये तो जो फल नमी अवस्था मे मृदा के सम्पर्क मे आता है वह सड़ जाता है। अतः ऐसा फल बाजार मे बेचने योग्य नही रहता एवं एक अनुमान के अनुसार लगभग 40 प्रतिशत फलो का नुकसान हो जाता है। जब टमाटर का पौधा रोपाई के बाद 25-30 दिन का हो जाये तब सहारा देने का कार्य करना चाहिये।

प्रायोजित कृषि विनाश या प्राकृतिक आपदा ?

पिछले अनेक वर्षों से हम देख रहे हैं कि आंधी, वर्षा, तूफ़ान, ओलावृष्टि बड़े नपे-तुले समय पर होती है.जब  वृक्षों-फसलों में फूल, फल बनने का समय होता है तभी आंधी, ओले, तूफ़ान, वर्षा बड़े नियम के साथ अपनी विनाश लीला दिखा देते हैं. जब फसलें पकने व काटने का समय होता है तब भी प्रकृति का कहर बरसने लगता है. कभी-कभी नहीं, बार-बार यही होता जा रहा है. क्या यह स्वाभाविक है ? क्या प्रकृति को किसानों के साथ कोई दुश्मनी है ? आखिर बड़े नियम के साथ ये कहर बरपता क्यों है ? कौनसा नियम, कौनसा सिद्धांत इसके पीछे काम कर रहा है?

भगवान के डाकियों को लीलते कीटनाशक…

बढ़ते कीटनाशको के उपयोग ने पक्षियों के जीवन को बहुत नुकसान पहुंचाया है. किसानों के मित्र समझे जाने वाले पक्षियों की प्रजातियों में दिन-प्रतिदिन भारी कमी होती जा रही है. हालात ये हैं कि कुछ समय से तो कुछेक प्रजातियों के पक्षी नजर ही नहीं आ रहे हैं. विशेष बात तो यह है कि इनके अचानक गायब होने का मुख्य कारण किसानों द्वारा परंपरागत तकनीक को छोडक़र मशीनों द्वारा खेती करने के साथ-साथ बड़े पैमाने पर कीटनाशक दवाइयों का अंधाधुंध प्रयोग करना जिसके चलते पक्षियों पर इसका गहरा दुष्प्रभाव पड़ा है.

अत्यधिक नाइट्रोजन से जमीन की उर्वरता पर असर

किसानों द्वारा इस्तेमाल किए गए नाइट्रोजन से पौधे मात्र 30 फीसदी एफ यूरिया का उपयोग करते हैं। फसल की माँग से अधिक उपयोग में लाया गया नाइट्रोजन वाष्पीकरण और निष्टालन के जरिये खत्म हो जाता है। नाइट्रोजन का अत्यधिक उपयोग जलवायु परिवर्तन और भूजल प्रदूषण को बढ़ावा देता है। यूरिया जमीन में रिस जाता है तथा नाइट्रोजन से मिलकर नाईट्रासोमाईन बनाता है जिससे दूषित पानी को पीने से कैंसर, रेड ब्लड कणों का कम होना और रसौलियाँ बनती हैं। मुख्य कृषि अधिकारी डॉ.

भिण्डी की फसल में कीटों से निपटने का जैविक तरीका

विभिन्न सब्जियों के बीच भिंडी बड़े पैमाने पर पैदा की जाती है। पिछले कुछ सालों से इसके उत्पादन में थोड़ी कमी आई है जिसका कारण फसल को नुकसान पहुंचाने वाले कीटों, रोगों और सूत्रकृमि में हो रही वृद्धि है। भिण्डी की नरम और कोमल प्रकृति तथा उच्च नमी के कारण इसकी खेती में कीटों व रोगों के हमले की संभावना अधिक रहती है। एक अनुमान के अनुसार कीटों व रोगों के प्रकोप से कम से कम 35 से 40 प्रतिशत उत्पादन का नुकसान हो सकता है

ऊसरीली भूमि पर करें धान की खेती

खरीफ की फसलें क्षारीयता को सह लेती हैं। धान की फसल भी क्षारीयता के प्रति सहनशील होती है इसलिए ऊसरीली भूमि में दो-तीन वर्षों तक खरीफ में सिर्फ धान की फसल लेनी चाहिए। ऐसा करने से जैविक क्रिया के फलस्वरूप एक प्रकार का कार्बनिक अम्ल बनता है जो क्षारीयता को कम करता है। साथ ही भूमि में सोडियम तत्व का अवशोषण अधिक मात्रा में होने से भूमि में विनिमयशील सोडियम की मात्रा कम हो जाती है  भूमि की भौतिक तथा रायायनिक गुणवत्ता में धीरे-धीरे सुधार हो जाता है।

मेंथा की नई तकनीक से मिलेगा कम समय में अधिक उत्पादन

कुछ कारक मेंथा की उत्पादकता पर विपरीत प्रभाव डालते हैं। जैसे- फसल उत्पादन के लिए समय का आभाव, दूसरी कटाई की कम सम्भावनाएं और कम उत्पादकता, फसल की अधिक पानी की आवश्यकता, खरपतवार की समस्या और नियंत्रण पर अधिक खर्च।
इन कारकों को दूर करने के लिए सीमैप (केन्द्रीय औषधीय एवं सगंध पौधा संस्थान) ने अगेती मिंट का विकास किया है, जिससे किसानों को कम समय में अधिक उत्पादन मिलता है।

पौधे में पोषक तत्‍व की कमी के लक्ष्‍ण एवं निदान

पौधे की बढवार एवं विकास के लिये सभी पोषक तत्‍व महत्‍वपूर्ण होते है,  जिनकी कमी को किसी अन्‍य तत्‍वों द्वारा पूरा नहीं किया जा सकता है। पौधों में पोषक तत्‍वों की कमी से जो रोग होते है उन्‍हें असंक्रमित रोगो की श्रेणी में रखा गया है। यह रोग कई कारणों से उत्‍पन्‍न हो सकते है जैसे: पर्यावरणीय बदलाव, मिटटी की संरचना एवं स्थिति आदि अत: इन्‍हे फिजियोलाजिकल डिसआर्डर कहा जाता है।

पोषक तत्‍वों की कमी के लक्ष्‍ण एवं उनका निदान निम्‍नलिखित प्रकार से किया जा सकता है।

1.  आलू का ब्‍लेक हर्ट-

लक्ष्‍ण -

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