Organic Farming

सब्जी उत्पादन के नये आयाम

भारत एक प्रमुख सब्जी उत्पादक देश है. हमारे देश की जलवायु में काफी विभिन्नता होने के कारण देश के विभिन्न भागों में 60 से अधिक प्रकार की सब्जियां उगायी जाती है. वर्तमान में हमारे देश में लगभग 60 लाख हेक्टेयर क्षेत्र में सब्जियों की खेती की जाती है. जिसका सकल उत्पादन लगभग 8.4 करोड़ टन है. इस प्रकार भारत, चीन के बाद विश्व का सर्वाधिक सब्जी उत्पादक देश है. 

भूमि की उत्‍पादन क्षमता बढाने में जैव उर्वरकों का महत्‍व

रासायनिक उर्वरकों के प्रयोग से उपज में वृद्धि तो होती है परन्‍तू अधिक प्रयोग से मृदा की उर्वरता तथा संरचना पर भी प्रतिकूल प्रभाव पडता है इसलिए रासायनिक उर्वरकों (Chemical fertilizers) के साथ साथ जैव उर्वरकों (Bio-fertilizers) के प्रयोग की सम्‍भावनाएं बढ रही हैं।

जैव उर्वरकों के प्रयोग से फसल को पोषक तत्‍वों की आपूर्ति होने के साथ मृदा उर्वरता भी स्थिर बनी रहती है। जैव उर्वकों का प्रयोग रासायनिक उर्वरकों के साथ करने से रासायनिक उर्वकों की क्षमता बढती है जिससे उपज में वृद्धि होती है। 

पर्वतीय क्षेत्रों में जैविक खेती

  • जैविक खेती प्रजातियाँ कर्षण एवं जैविक नाशाकजीवी प्रबन्धन सहित पारिस्थितिक दृष्टी से आधारित कृषि क्रियाओं पर निर्भर होती हैं
  • वस्तुत : इसके फसल उत्पादन में रसायनों संशलिष्ट रसायनों के प्रयोग को बाहर रखा गया है और पशुधन उत्पादन में प्रतिजैविकों एवं हार्मोनों के प्रयोग को प्रतिबंधित किया गया है।

जैविक उपज क्या है ?

सब्जियों की पौध तैयार करने की प्‍लास्टिक प्‍लग ट्रे प्रौघोगिकी

इस तकनीक द्वारा सब्जियों की पौध को तैयार करने के लिए प्‍लास्टिक की खानेदार ट्रे (Multi celled plastic tray) का प्रयोग करते हैं ट्रे के खाने शंकू आकार के होने चाहिए क्‍योकि ऐसे खानो में पौधे की जडों का समुचित विकास होता है। टमाटर, बैंगन व समस्‍त बेल वाली सब्जियों के लिए 18-20 घन से.मी. आकार के खानो वाली ट्रे का प्रयोग होता है जबकि शिमला मिर्च, मिर्च, फूलगोभी वर्ग की सभी फसले व सलाद, सेलेरी, पारसले आदि सब्जियों को 8-10 घन से.मी. आकार के खानो वाली ट्रे उपयुक्‍त रहती है।

पोषक तत्वों से भरपूर जैविक खाद : वर्मीकम्पोस्ट

वर्मीकम्पोस्ट (vermicompost) एक ऐसी खाद हैं, जिसमें विशेष प्रजाति के केंचुओं द्वारा बनाई जाती है। केंचुओं द्वारा गोबर एंव कचरे को खा कर, मल द्वारा जो चाय की पत्ती जैसा पदार्थ बनता हैं। यही वर्मीकम्पोस्ट हैं। 

गैहूं फसल में खीरा-ककड़ी वर्गीय सब्जियों की अंतर-रिले फसल उगाने की तकनीक

सब्जियों का भारतीय कृषि में महत्वपूर्ण स्थान है। ये बहुत सी दूसरी फसलों की तुलना में प्रति ईकाई क्षेत्र में अधिक पैदावार देती है और कम समय में तैयार हो जाती है। भारत में खीरा-ककड़ी वर्गीय कुल की लगभग 20 प्रकार की सब्जियों की खेती की जाती है। इनमें धीया/लौकी, तोरी, करेला, खीरा, तरबूज, खरबूज, ककड़ी, कद्दू /सीताफल, चप्पनकद्दृ, टिण्डा, परवल आदि मुख्य है। ये सभी बेलवाली फसलें होती हैं जो कम कैलोरी व सरलता से पचने वाली होने के साथ-साथ विटामिन्स, अमीनो अम्ल एवं खनिज लवणों का अच्छा स्त्रोत है ।

ये सब्जियां उत्तर भारत के मैदानी भागों में फरवरी से जून तथा जुलाई से नवबंर तक उगाई जाती है।

हरे चारे को संरक्षित करने की विधियाँ

पशुओं से अधिकतम दुग्धउत्पादन प्राप्त करने के लिए उन्हें प्रर्याप्त मात्रा में पौषिटक चारे की आवश्यकता होती है। इन चारों को पशुपालक या तो स्वयं उगाता हैं या फिर कहीं और से खरीद कर लाता है। चारे को अधिकांशत: हरी अवस्था में पशुओं को खिलाया जाता है तथा इसकी अतिरिक्त मात्रा को सुखाकर भविष्य में प्रयोग करने के लिए भंडारण कर लिया जाता है। ताकि चारे की कमी के समय उसका प्रयोग पशुओं को खिलाने के लिए किया जा सके। इस तरह से भंडारण करने से उसमें पोषक तत्व बहुत कम रह जाते है। इसी चारे का भंडा़रण यदि वैज्ञानिक तरीके से किया जाये तो उसकी पौषिटकता में कोर्इ कमी नहीं आती तथा कुछ खास तरीकों से इस चारे को उपचा

जैविक खेती-आय में वृद्धि-गाँव की समृद्धि

लम्बे समय तक अनवरत अन्न उत्पादन के साथ मिटटी की उर्वरा शक्ति को बनाये रखा जिससे खाद्य सुरक्षा एवं पोषणीय सुरक्षा संभव हो सकती है.

जैविक खादों के गुण-

खेत का पानी खेत में

‘खेत का पानी खेत में’ रहे, उस हेतु नाली, कुण्डी, पोखर इत्यादि को बनाने के कम प्रयास किए गये है। ‘खेत का पानी खेत में’ रहने पर खेत की मिट्टी व जीवांश-पौध पोषण भी खेत में रहने पर फसल सूखे के प्रभाव से प्रायः बच निकलती है। 
 

नाली बनाएं –

सिंचाई में लवणीय जल की समस्या एवं प्रबंधन

नहरी क्षेत्रों में कई स्थानों पर मिट्टी सदैव नम (तैलीय) सी दिखाई देती है। ऐसी जमीन में फस्ल नहीं होती। ऐसी मिट्टी जब दिखाई दे तो समझ लेना चाहिए कि मिट्टी भूमि ऊसर या सेम की समस्या से ग्रसित हो चुकी है। अतः बिना ऊसरता को समाप्त किए इस जमीन में कोई भी फसल लेना आर्थिक रूप से उपादेय नहीं होगा। तेलिया या सोडिक जल से सिंचाई करने से मिट्टी की भौतिक दशा खराब हो जाती है। अतः इसको सुधारने हेतु कैल्शियम युक्त रासायनिक सुधारक, जैसे कि जिप्सम मिट्टी में डाला जाए तो सोडिक जल का दुष्प्रभाव कम हो जाता है। जिप्सम का उपचार करने से मिट्टी में वर्षा के पानी तथा सिंचाई के जल का रिसाव बढ़ जाता है और मिट्ट

Pages