Organic Farming

केंचुआ खाद बनाना वर्मी कम्पोस्टिंग

 वर्मी कम्पोस्ट को मिट्टी में मिलाने से मिट्टी की उर्वरा शक्ति तो बढ़ती ही है, साथ ही साथ फसलों की पैदावार व गुणवत्ता में भी बढ़ोत्तरी होती है। रासायनिक उर्वरकों के अत्यधिक इस्तेमाल से मृदा पर होने वाले दुष्प्रभावों का वर्मी कम्पोस्ट के उपयोग से सुधार होता है। इस प्रकार वर्मी कम्पोस्ट भूमि की भौतिक, रासायनिक व जैविक दशा में सुधार कर मिट्टी की उपजाऊ शक्ति को टिकाऊ करने में भी महत्वपूर्ण योगदान देता है। अनुमानत: 1 कि.ग्रा.

कचरे से तैयार करें उत्तम खाद

अधिकांश किसानों के बाड़ी या प्रक्षेत्र में स्वनिर्मित खाद के गड्ढे होते हैं। कृषक इस गड्ढे का उपयोग खाद बनाने में करते हैं। यहां घर के अपशिष्ट और फार्म के कचरे का इस्तेमाल खाद बनाने में करते हैं। ठीक प्रकार से न सड़ने के कारण उसमें खरपतवार के बीज और निमेटोड पाए जाते हैं, जो फसलों के लिए नुकसानदेह हैं। खाद बनाते समय इसे खुला छोड़ दिया जाता है और अत्यधिक गर्मी और बारिश से बचाव की सुविधा नहीं होती है। इन कचरों का उपयोग व्यवस्थित और वैज्ञानिक रीति से न होने के कारण खाद की गुणवत्ता निम्न स्तर की होती है, जिसमें जीवांश और पोषक तत्वों की मात्रा कम होती है। किसान बहुत कम खर्चे में स्वयं जैविक खादों

कीटनाशक के छिड़काव से फसलों को नुकसान

रासायनिक कीटनाशकों के अंधाधुंध व असंतुलित प्रयोग से पर्यावरणीय असंतुलन व प्रदूषण की समस्या उत्पन्न होने के साथ ही खेतों में पाये जाने वाले मित्र कीट भी अनजाने में मारे जाते हैं। मित्र कीट फसल की शत्रु कीटों से रक्षा करते हैं। किसान आमतौर पर यह जानते हैं कि फसलों को कीट नुकसान पहुंचाते हैं। लेकिन बहुत कम किसानों को यह जानकारी है कि खेतों में मित्र कीट भी होते हैं और रासायनिक कीट नाशक का छिड़काव करने से वे मर जाते हैं। मित्र कीट फसल के लिए काफी लाभदायक होते हैं। अगर मित्र कीटों को संरक्षित किया जाए तो फसलों में हानिकारक कीटों की रोकथाम पर होने वाले खर्च में काफी कमी आ सकती है। कृषि विभाग भी ए

भूमि प्रदूषण

सामान्य स्थिति में भूमि मूल जीवनदायी है, किंतु प्रदूषण की स्थिति में भूमि में हानिकारक अवांछनीय पदार्थों की मात्रा बढ़ जाती है। प्रदूषित जल एवं कचरा इसके प्रमुख कारण हैं।
 

भूमि प्रदूषण के कारण-

1. औद्योगिक कचरा,
2. घरेलू कचरा,
3. कीटनाशक, खरपतवार नाशक,
4. नाभिकीय परीक्षण/ परमाणु विस्फोट।
 

प्रभाव

1. भूमि की ऊर्वरता कम या नष्ट हो जाती है।
2. उत्पन्न पौधे, औषधियां विषाक्त हो जाती हैं।
3. भूमि पर प्रवाहित जल एवं उसके द्वारा भू-गर्भ तक पहुंचने वाला जल भी प्रदूषित हो जाता है।

Author: स्वराज तिवारी

मृदा समूह या मृदा प्रकार

मिट्टी के बृहत् वर्ग जिनके आंतरिक लक्षणों में समानता पायी जाती है। विश्व स्तर पर मिट्टी को तीन बृहत् समूहों में विभक्त किया जाता है- कटिबंधीय मिट्टी (zonal soil), कटिबंधांतरिक मिट्टी (intrazonal soil), तथा अपार्शिक मिट्टी (azonal soil)। 

पुदीना (मेंथा) उगायें अधिक लाभ कमायें

दीना लेमिएसी कुल से संबंधित एक बारह मासी खुशबुदार अत: भुस्वारी प्रकार का पौधा है। पुदीने की खेती मुख्यत: उनकी हरी, ताजा खुशबूदार पत्तिायों के लिये की जाती है। गांव-घरों में पनियारी के पास जहां पानी नियमित रूप से लगता है पुदीना लगाया जा सकता है। शहरों मेें लोग अपनी छतों पर पुदीनें को गमलों में लगाकर रखते हैं तो कहीं महानगरों में कई लोग अपनी खिड़कियों तथा रोशनदानों में पुदीना लगे गमले रखते है जिससे उनकी पुदीनें की हरी ताजी पत्तिायां भी मिल जातीहै। तथा घरों में हवा के साथ पुदीने की भिनी -भिनी खुशबू भी फैल जाती है।

पोषक तत्वों से भरपूर जैविक खाद : वर्मीकम्पोस्ट

वर्मीकम्पोस्ट (vermicompost) एक ऐसी खाद हैं, जिसमें विशेष प्रजाति के केंचुओं द्वारा बनाई जाती है। केंचुओं द्वारा गोबर एंव कचरे को खा कर, मल द्वारा जो चाय की पत्ती जैसा पदार्थ बनता हैं। यही वर्मीकम्पोस्ट हैं। 

कीटनाशकों के बिना खेती

हरित क्रांति के बाद से ही किसानों को सलाह दी जाती रही है कि कीटों को दूर भगाने के लिए रासायनिक कीटनाशकों का इस्तेमाल करें। पिछले 40 साल से हम किसानों को समझा रहे हैं कि कीटनाशक अनिवार्य हैं। जबकि, अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर अब स्वीकार कर लिया गया है कि धान में कीटनाशकों की जरूरत ही नहीं होती। ‘भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद’ को अब भी इस जमीनी सच्चाई स्वीकार करना बाकी है।

जैविक खेती-आय में वृद्धि-गाँव की समृद्धि

हमारे देश में जैविक खेती का इतिहास लग-भग ५००० साल से भी अधिक पुराना है. यह सजीव जैविक खेती ही थी,जिसने इतने लम्बे समय तक अनवरत अन्न उत्पादन के साथ मिटटी की उर्वरा शक्ति को बनाये रखा जिससे खाद्य सुरक्षा एवं पोषणीय सुरक्षा संभव हो सकती है.

जैविक खादों के गुण-

टमाटर किसान की आय हेतु महत्वपूर्ण फ़सल

जलवायु और मिट्टी

टमाटर गर्मी के मौसम की फ़सल है और पाला नहीं सहन कर सकती है. 12 डिग्री से०ग्रे० से 26 डिग्री से०ग्रे० के तापमान के बीच इसकी खेती सफलतापूर्वक की जा सकती है. रात का आदर्श तापमान 25 डिग्री से०ग्रे० से 20 डिग्री से०ग्रे० है. टमाटर की फ़सल पोषक तत्वों से युक्त दोमट मिट्टी में सबसे अच्छी होती है. लेकिन इसकी अगेती क़िस्मों के लिए बलुई तथा दोमट बलुई मिट्टी अधिक उपयुक्त है. इसके अलावा यदि जल निकास की व्यवस्था अच्छी हो तो इसे मटियार तथा तलहटी दोमट में भी उगाया जा सकता है.

बीज की मात्रा और बुआई

बीज दर

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