Organic Farming

: पोषक तत्व प्रबंधन का एक सस्ता एवं उत्तम स्रोत जीवाणु खाद

फसल उत्पादन मे पोषक तत्वों का महत्वपूर्ण स्थान है, इनकी आपूर्ति के लिए रासायनिक उर्वरक, देसी खाद, जीवाणु खाद, कम्पोस्ट आदि का उपयोग मुख्य रूप से किया जाता है ι उर्वरको की बढ़ती कीमतें, माँग एवं पूर्ति के बीच का अंतर, छोटे व सीमान्त किसानो की सीमित क्रय शक्ति एवं ऊर्जा की कमी

जैसे महत्वपूर्ण पहलुओं के कारण आवश्यक है कि पादप पोषण के कुछ ऐसे सार्थक एवं सस्ते वैकल्पिक स्त्रोत हो जो सस्ता होने के साथ-साथ पर्यावरण प्रदूषक भी न हो, ऐसे मे जीवाणु खाद को नकारा नहीं जा सकता है ι

जैविक खेती, प्राकृतिक ऊर्जा से खुशहाल होंगे गांव

खेती में रासायनिक खाद का प्रयोग बंद करना समय की मांग है, क्योंकि वह भूमि एवं मनुष्य दोनों के स्वास्थ्य के लिए हानिकारक है। रासायनिक खाद से उपजी चीजें खाने से साल भर में हम 100 मिलीग्राम तक रासायनिक जहर भोजन के साथ पचा जाते हैं। यही 100 मिलीग्राम जहर यदि एक साथ खा लें तो हम मर जाएं। थोड़ा-थोड़ा खाने के कारण हम तुरंत मरते तो नहीं हैं लेकिन इसके घातक प्रभाव शरीर और मन पर होकर ही रहते हैं।

व्यावसायिक लाभ देती है गुलाब की खेती

गुलाब की खेती व्यावसायिक स्तर पर करके काफी लाभ कमाया जा सकता है. फूल के हाट में गुलाब के गजरे खूब बिकते हैं. गुलाब की पंखुडियों और शक्कर से गुलकन्द बनाया जाता है. गुलाब जल और गुलाब इत्र के कुटीर उद्योग चलते है. उत्तर प्रदेश में कन्नौज, जौनपुर आदि में गुलाब के उत्पाद की उद्योगशाला चलती है. दक्षिण भारत में भी गुलाब के उत्पाद के उद्योग चलते हैं. दक्षिण भारत में गुलाब फूलों का खूब व्यापार होता है. मन्दिरों, मण्डपों, समारोहों, पूजा-स्थलों आदि स्थानों में गुलाब फूलों की भारी खपत होती है. यह अर्थिक लाभ का साधन है. वहाँ हजारों ग्रामीण युवा फूलो को अपनी आय का माध्यम बना लेते हैं.

जैविक खेती को बढ़ावा दे रही वनसर्ट एशिया

कृषि विभाग प्रयास कर रहा है. कोई भी किसान यदि जैविक खेती अपनाता है तो इसे रसायनिक से जैविक में तब्दील करने के लिए तीन वर्ष का समय लगता है. तीन वर्ष तक बिना रसायनों के जैविक खादों से फसलें उगाने के बाद किसान को इसका प्रमाण पत्र व लोगो दिया जाता है. इसका निरीक्षण वनसर्ट एशिया नामक एजेंसी करती है. किसान अभी ग्रुप बनाकर बाहरी राज्यों में उत्पादों की मार्केटिंग कर रहे हैं. आने वाले दिनों में किसानों को यहीं पर नीलामी की सुविधा मिलेगी.

छतों पर उगाइए सब्ज़ियाँ

शहरों में जहाँ घरों में आँगन नहीं होते वे लोग अपने घरों की छत पर पर्याप्त मात्रा में टमाटर, सेम और सलाद पत्ते उगा सकते हैं. छतों पर सब्जियां उगाने के कई फायदे हैं. इससे कृषि के लिए आवश्यक क्षेत्र को कम किया जा सकता है, परिवहन पर खर्च होने वाले पैसे को बचाया जा सकता है और सब्जियों को ज्यादा ताजा रखा जा सकता है.

इससे पानी की खपत भी कम होती है. आत्म-निहित प्रणाली के तहत पौधे के लिए इस्तेमाल किए गए पानी को दोबारा साफ कर उपयोग किया जा सकता है. पौधों के लिए पोषक तत्वों को भी वर्षा के पानी और अपशिष्ट जल से छाना जा सकता है.

एक ऐसा फूल जिसे खा भी सकते हैं और कमा भी सकते है

फूलगोभी अत्यन्त ही स्वादिष्ट तथा लोकपिय सब्जी है. उत्त्पति स्थान साइप्रस या इटली का भूमध्यसागरीय क्षेत्र माना जाता है. भारत में इसका प्रादुर्भाव मुगल काल से हुआ था. भारत में इसका क्षेत्रफल 9,3000 हेक्टर है, जिससे 6,85,000 टन उत्पादन होता है. उत्त्तरप्रदेश तथा अन्य शीतल स्थानों मेंइसका उत्पादन व्यपाक पैमाने पर किया जाता है. वर्तमान में इसे सभी स्थानों पर उगाया जाता है. फूलगोभी, जिसे हम सब्जी के रूप में उपयोग करते है, पुष्प छोटे तथा घने हो जाते हैं और एक कोमल ठोस रूप निर्मित करते हैं. फूल गोभी में प्रोटीन, कैल्शियम, फास्फोरस, विटामिन ए, सी तथा निकोटीनिक एसिड पोषक तत्व होते है.

मिश्रित फायदे देती मिश्रित खेती

मिश्रित खेती से मतलब एक साथ खेत में कई फसलें उगाना है. आज यह आवश्यक है कि हमारे किसान मिश्रित खेती करें. मिश्रित खेती में मनुष्य, पशु, वृक्ष और भूमि सभी एक सूत्र में बंध जाते हैं. सिंचाई की सहायता से भूमि, मनुष्य और पशुओं के लाभ के लिए, फसलें और वृक्ष पैदा करती है और इसके बदले में मनुष्य और पशु खाद द्वारा भूमि को उर्वरक बनाते हैं. इस प्रकार की कृषि-व्यवस्था में प्रत्येक परिवार एक या दो गाय या भैंस, बैलों की जोड़ी और, यदि सम्भव हो तो, कुछ मुर्गियां भी पाल सकता है.

जैव उर्वकों से बढ़ती है फसल की गुणवत्ता

पर्यावरण के संरक्षण, भूमि की संरचना तथा उर्वरता को बचाए रखते हुए अधिक उत्पादन के लिए कृषि वैज्ञानिकों ने ऐसे जीवाणुओं के उर्वरक तैयार किये हैं जो वायुमण्डल में उपलब्ध नत्रजन को पौधो को उपलब्ध कराते है तथा भूमि में पहले से मौजूद फास्फोरस आदि पोषक तत्वों को घुलनशील बनाकर पौधों को उपलब्ध कराते हैं।
यह जीवाणु प्राकृतिक हैं, रासायनिक नहीं इसलिए इनके प्रयोग से भूमि की उर्वरा शक्ति बढ़ती है और पर्यावरण पर विपरीत असर नहीं पड़ता। जैव उर्वरक रासायनिक उर्वरक का विकल्प नहीं है। इन्हें रासायनिक उर्वरकों के पूरक के रूप में प्रयोग करने से हम बेहतर परिणाम प्राप्त कर सकते है।

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