Organic Farming

एक ऐसा फूल जिसे खा भी सकते हैं और कमा भी सकते है

फूलगोभी अत्यन्त ही स्वादिष्ट तथा लोकपिय सब्जी है. उत्त्पति स्थान साइप्रस या इटली का भूमध्यसागरीय क्षेत्र माना जाता है. भारत में इसका प्रादुर्भाव मुगल काल से हुआ था. भारत में इसका क्षेत्रफल 9,3000 हेक्टर है, जिससे 6,85,000 टन उत्पादन होता है. उत्त्तरप्रदेश तथा अन्य शीतल स्थानों मेंइसका उत्पादन व्यपाक पैमाने पर किया जाता है. वर्तमान में इसे सभी स्थानों पर उगाया जाता है. फूलगोभी, जिसे हम सब्जी के रूप में उपयोग करते है, पुष्प छोटे तथा घने हो जाते हैं और एक कोमल ठोस रूप निर्मित करते हैं. फूल गोभी में प्रोटीन, कैल्शियम, फास्फोरस, विटामिन ए, सी तथा निकोटीनिक एसिड पोषक तत्व होते है.

मिश्रित फायदे देती मिश्रित खेती

मिश्रित खेती से मतलब एक साथ खेत में कई फसलें उगाना है. आज यह आवश्यक है कि हमारे किसान मिश्रित खेती करें. मिश्रित खेती में मनुष्य, पशु, वृक्ष और भूमि सभी एक सूत्र में बंध जाते हैं. सिंचाई की सहायता से भूमि, मनुष्य और पशुओं के लाभ के लिए, फसलें और वृक्ष पैदा करती है और इसके बदले में मनुष्य और पशु खाद द्वारा भूमि को उर्वरक बनाते हैं. इस प्रकार की कृषि-व्यवस्था में प्रत्येक परिवार एक या दो गाय या भैंस, बैलों की जोड़ी और, यदि सम्भव हो तो, कुछ मुर्गियां भी पाल सकता है.

जैव उर्वकों से बढ़ती है फसल की गुणवत्ता

पर्यावरण के संरक्षण, भूमि की संरचना तथा उर्वरता को बचाए रखते हुए अधिक उत्पादन के लिए कृषि वैज्ञानिकों ने ऐसे जीवाणुओं के उर्वरक तैयार किये हैं जो वायुमण्डल में उपलब्ध नत्रजन को पौधो को उपलब्ध कराते है तथा भूमि में पहले से मौजूद फास्फोरस आदि पोषक तत्वों को घुलनशील बनाकर पौधों को उपलब्ध कराते हैं।
यह जीवाणु प्राकृतिक हैं, रासायनिक नहीं इसलिए इनके प्रयोग से भूमि की उर्वरा शक्ति बढ़ती है और पर्यावरण पर विपरीत असर नहीं पड़ता। जैव उर्वरक रासायनिक उर्वरक का विकल्प नहीं है। इन्हें रासायनिक उर्वरकों के पूरक के रूप में प्रयोग करने से हम बेहतर परिणाम प्राप्त कर सकते है।

जैविक खेती देती है ज्यादा मुनाफा

जैविक खेती सस्ती तो है ही, जीवन और जमीन को बचाने के लिए भी जरूरी है। 1960 से 1990 तक कृषि उत्पादन को बढ़ाने के लिए जिस तेजी से और जिस तरह से रासायनिक खादों और कीटनाशकों का इस्तेमाल किया गया, उसने हमारे खेतों और जीवन दोनों को संकट में डाल दिया। तब पर्यावरण की अनदेखी की गई थी, जिसकी कीमत हम आज चुका रहे हैं। 1990 के बाद से जैविक खाद की ओर खेती को लौटाने का अभियान शुरू हुआ, जो अब भी जारी है। द्वितीय हरितक्रांति में जैविक खेती को बढ़ावा दिया जा रहा है और किसानों को इसके लिए तैयार किया जा रहा है। किसान भी जैविक खाद और कीटनाशक बनाने में अपने अनुभव से कृषि वैज्ञानिक तक को मात दे रहे हैं। जैविक खेती ह

आधुनिक तरीके से करें सब्जियों की खेती

 

ऐसे बनाएं सब्जी बगीचा

स्वच्छ जल के साथ रसोईघर एवं स्नानघर से निकले पानी का उपयोग कर घर के पिछवाड़े में उपयोगी साग-सब्जी उगाने की योजना बना सकते है। इससे एक तो एकित्रत अनुपयोगी जल का निष्पादन हो सकेगा और दूसरे उससे होने वाले प्रदूषण से भी मुक्ति मिल जाएगी। साथ ही, सीमित क्षेत्र में साग-सब्जी उगाने से घरेलू आवश्यकता की पूर्ति भी हो सकेगी। सबसे अहम बात यह कि सब्जी उत्पादन में रासायनिक पदार्थों का उपयोग करने की जरूरत भी नहीं होगी। यह एक सुरिक्षत पद्धति है तथा उत्पादित साग-सब्जी कीटनाशक दवाईयों से भी मुक्त होंगे।
 
पौधे लगाने के लिए खेत की तैयारी

भूमि की उपजाऊ शक्ति बढ़ाती है जैविक खाद

भारत में शताब्दियों से गोबर की खाद, कम्पोस्ट, हरी खाद व जैविक खाद का प्रयोग विभिन्न फसलों की उत्पादकता बढ़ाने के लिए किया जाता रहा है। इस समय ऐसी कृषि विधियों की आवश्यकता है जिससे अधिक से अधिक पैदावार मिले तथा मिट्टी की गुणवत्ता प्रभावित न हो, रासायनिक खादों के साथ-साथ जैविक खादों के उपयोग से मिट्टी की उत्पादन क्षमता को बनाए रखा जा सकता है। जिन क्षेत्रों में रासायनिक खादों का ज्यादा प्रयोग हो रहा है वहां इनका प्रयोग कम करके जैविक खादों का प्रयोग बढाने की आवश्यकता है। जैविक खेती के लिए जैविक खादों का प्रयोग अतिआवश्यक है, क्योंकि जैविक कृषि में रासायनिक खादों का प्रयोग वर्जित है। ऐसी स्थिति म

जैविक खेती एक विकल्प -

जैविक खेती एक ऐसी पद्धति है, जिसमें रासायनिक उर्वरकों, कीटनाशकों तथा खरपतवारनाशियों के स्थान पर जीवांश खाद पोषक तत्वों (गोबर की खाद कम्पोस्ट, हरी खाद, जीवणु कल्चर, जैविक खाद आदि) जैव नाशियों (बायो-पैस्टीसाईड) व बायो एजैन्ट जैसे क्राईसोपा आदि का उपयोग किया जाता है, जिससे न केवल भूमि की उर्वरा शक्ति लम्बे समय तक बनी रहती है, बल्कि पर्यावरण भी प्रदूषित नहीं होता तथा कृषि लागत घटने व उत्पाद की गुणवत्ता बढ़ने से कृषक को अधिक लाभ भी मिलता है । 

कीट आर्कषित फसल लगायें, फसलों को हानिकारक कीटों से बचायें

फसल उत्पादन को प्रभावित करने वाले कारकों में कीटों की भूमिका अहम रहती है। विभिन्न प्रकार के कीटों की जातिया जैसे- काटने चबाने वाले इल्ल्यिा, तनाछेदक, बीटल व चूसने वाले कीट जैसे-माहो, थ्रिप्स, लीफ हापर आदि अपने मुख के विभिन्न भागों से फलों, सब्जियों एवं खाघानों को चूसकर, कुतरकर, खाकर एवं उसमें घुसकर हानिकारक पदार्थ छोडतें है, जिससे फसल तो खराब होती ही है साथ ही उसकी गुणवत्ता व बाजार मूल्य कम हो जाती है जिससे किसानों को आर्थिक नुकसान उठाना पडता है।

लाभकारी है तरबूज की खेती

 तरबूज की खेती शुरू करने के लिए यह सही समय है। किसान तरावट देने वाले तरबूज की खेती से अच्छी कमाई कर सकते हैं। गर्मियों में इसकी मांग भी ज्य़ादा रहती है जिससे किसान बढिय़ा मुनाफा कमा सकता है।

भूमि एवं जलवायु

फसल को कीटों के प्रकोप से बचाएं

गेहूं की बाली बनने के समय पर सिंचाई का विशेष ध्यान रखें किसान

लखनऊ। सामान्य समय पर बोए गए गेहूं में अब बाली बनने का समय है ऐसे में किसान सिंचाई का विशेष ध्यान रखें। यह सुझाव उत्तर प्रदेश कृषि अनुसंधान संस्थान में आयोजित फसल मौसम सतर्कता समूह के में दिये गये। इनके सुझाव अनुसार दलहन में कीट प्रकोप के प्रति किसान सचेत रहें और लक्षण दिखने पर तुरंत उपचार करें।

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