Organic Farming

टमाटर किसान की आय हेतु महत्वपूर्ण फ़सल

जलवायु और मिट्टी

टमाटर गर्मी के मौसम की फ़सल है और पाला नहीं सहन कर सकती है. 12 डिग्री से०ग्रे० से 26 डिग्री से०ग्रे० के तापमान के बीच इसकी खेती सफलतापूर्वक की जा सकती है. रात का आदर्श तापमान 25 डिग्री से०ग्रे० से 20 डिग्री से०ग्रे० है. टमाटर की फ़सल पोषक तत्वों से युक्त दोमट मिट्टी में सबसे अच्छी होती है. लेकिन इसकी अगेती क़िस्मों के लिए बलुई तथा दोमट बलुई मिट्टी अधिक उपयुक्त है. इसके अलावा यदि जल निकास की व्यवस्था अच्छी हो तो इसे मटियार तथा तलहटी दोमट में भी उगाया जा सकता है.

बीज की मात्रा और बुआई

बीज दर

जैव उवर्रकों का फसलों/सब्जियों में उपयोग एवं लाभ

जैव उर्वरक क्या है ?

जैव उर्वरक विशिष्ट प्रकार के जीवाणुओं का एक विशेष प्रकार के माध्यम, चारकोल, मिट्टी या गोबर की खाद में ऐसा मिश्रण है, जो वायुमण्डलीय नत्रजन को साइकल द्वारा पौधों को उपलब्ध कराती है या मिट्टी में उपलब्ध अघुलनशील फास्फोरस को घुलनशील अवस्था मे परिवर्तित करके पौधों को उपलब्ध कराता है। इनके प्रयोग से रासायनिक उर्वरकों की 1/3 मात्रा तक की बचत हो जाती है।

जैव उर्वरकों का वर्गीकरण:

हरी खाद - प्रयोग की विधि व लाभ

मिटटी की उर्वरा शकित, जीवाणुओं की मात्रा एवं क्रियाशीलता पर निर्भर रहती है क्योकिं बहुत सी रसयानिक क्रियाओं के लिए सूक्ष्मजीवों की आवश्यकता रहती है। जीवित व सक्रिय मृदा वही कहलाती है जिसमें अधिक से अधिक जीवांश हो। जीवाणुओं का भोजन प्राय: कार्बनिक पदार्थ ही होते है। इनकी अधिकता से मृदा की उर्वरा शकित पर प्रभाव पड़ता है। केवल कार्बनिक खादों जैसे गोबर खाद, हरी खाद, जीवाणु खाद द्वारा ही स्थायी रूप से मृदा की क्रियाओं को बढ़ाया जा सकता है जिसमें हरी खाद प्रमुख है। इस क्रिया में अधिकांशत: हरे दलहनी पौधों के वानस्पतिक सामग्री को उसी खेत में उगाकर मिटटी में मिला देते है।

गर्मी में करें नींबू की उत्तम खेती

जलवायु एवं मिट्टी

नींबू जाति के फलों के लिए दोमट और बलुई दोमट मिट्टी उपयुक्त रहती है. इन फलों के लिए 6 - 6.5 पी.एच. वाली मिट्टी सबसे अच्छी रहती है. लवणीय या क्षारीय मिट्टियाँ तथा एसे क्षेत्र जहाँ पानी ठहर जाता हो, नींबू जाति के फलों के लिए उपयुक्त नहीं माने जाते. यह अवश्यक है की बाग़ लगाने से पहले मृदा जाँच अवश्य कराये .

मौसम्बी और चकोतरा

जैविक खेती : आधुनिक समय की मांग

भारत में कृषि की घटती जोत, संसाधनों की कमी, लगातार कम होती कार्यकुशलता और कृषि की बढ़ती लागत तथा साथ ही उर्वरक व कीटनाशकों के पर्यावरण पर बढ़ते कुप्रभाव को रोकने में निःसंदेह जैविक खेती एक वरदान साबित हो सकती है। जैविक खेती का सीधा संबंध जैविक खाद से है या यह कहें कि ये दोनों एक ही सिक्के के दो पहलू हैं। आज जबकि दूसरी हरित क्रांति की चर्चा जोरों पर है, वहीं हमें कृषि उत्पादन में मंदी के कारणों पर भी ध्यान केंद्रित करना होगा और कृषि उत्पादन बढ़ाने हेतु जल प्रबंधन, मिट्टी की गुणवत्ता बनाए रखने और फसलों को बीमारी से बचाने पर जोर देना होगा। यह कहना गलत न होगा कि जैविक खेती से तीनों समस्याओं का

: पोषक तत्व प्रबंधन का एक सस्ता एवं उत्तम स्रोत जीवाणु खाद

फसल उत्पादन मे पोषक तत्वों का महत्वपूर्ण स्थान है, इनकी आपूर्ति के लिए रासायनिक उर्वरक, देसी खाद, जीवाणु खाद, कम्पोस्ट आदि का उपयोग मुख्य रूप से किया जाता है ι उर्वरको की बढ़ती कीमतें, माँग एवं पूर्ति के बीच का अंतर, छोटे व सीमान्त किसानो की सीमित क्रय शक्ति एवं ऊर्जा की कमी

जैसे महत्वपूर्ण पहलुओं के कारण आवश्यक है कि पादप पोषण के कुछ ऐसे सार्थक एवं सस्ते वैकल्पिक स्त्रोत हो जो सस्ता होने के साथ-साथ पर्यावरण प्रदूषक भी न हो, ऐसे मे जीवाणु खाद को नकारा नहीं जा सकता है ι

जैविक खेती, प्राकृतिक ऊर्जा से खुशहाल होंगे गांव

खेती में रासायनिक खाद का प्रयोग बंद करना समय की मांग है, क्योंकि वह भूमि एवं मनुष्य दोनों के स्वास्थ्य के लिए हानिकारक है। रासायनिक खाद से उपजी चीजें खाने से साल भर में हम 100 मिलीग्राम तक रासायनिक जहर भोजन के साथ पचा जाते हैं। यही 100 मिलीग्राम जहर यदि एक साथ खा लें तो हम मर जाएं। थोड़ा-थोड़ा खाने के कारण हम तुरंत मरते तो नहीं हैं लेकिन इसके घातक प्रभाव शरीर और मन पर होकर ही रहते हैं।

व्यावसायिक लाभ देती है गुलाब की खेती

गुलाब की खेती व्यावसायिक स्तर पर करके काफी लाभ कमाया जा सकता है. फूल के हाट में गुलाब के गजरे खूब बिकते हैं. गुलाब की पंखुडियों और शक्कर से गुलकन्द बनाया जाता है. गुलाब जल और गुलाब इत्र के कुटीर उद्योग चलते है. उत्तर प्रदेश में कन्नौज, जौनपुर आदि में गुलाब के उत्पाद की उद्योगशाला चलती है. दक्षिण भारत में भी गुलाब के उत्पाद के उद्योग चलते हैं. दक्षिण भारत में गुलाब फूलों का खूब व्यापार होता है. मन्दिरों, मण्डपों, समारोहों, पूजा-स्थलों आदि स्थानों में गुलाब फूलों की भारी खपत होती है. यह अर्थिक लाभ का साधन है. वहाँ हजारों ग्रामीण युवा फूलो को अपनी आय का माध्यम बना लेते हैं.

जैविक खेती को बढ़ावा दे रही वनसर्ट एशिया

कृषि विभाग प्रयास कर रहा है. कोई भी किसान यदि जैविक खेती अपनाता है तो इसे रसायनिक से जैविक में तब्दील करने के लिए तीन वर्ष का समय लगता है. तीन वर्ष तक बिना रसायनों के जैविक खादों से फसलें उगाने के बाद किसान को इसका प्रमाण पत्र व लोगो दिया जाता है. इसका निरीक्षण वनसर्ट एशिया नामक एजेंसी करती है. किसान अभी ग्रुप बनाकर बाहरी राज्यों में उत्पादों की मार्केटिंग कर रहे हैं. आने वाले दिनों में किसानों को यहीं पर नीलामी की सुविधा मिलेगी.

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