पाला

आमतौर पर शीतकाल की लंबी राते ज्यादा ठंडी होती है और कईं बार तापमान हिमांक freezing point पर या इस से भी नीचे चला जता है ऐसी स्थिति में जलवाष्प बिना द्रव रूप में परिवर्तित हुए सीधे ही सुक्ष्म हिमकणों में परिवर्तित हो जाते है इसे पाला कहते है पाला फसलों और वनस्पतियों के लिए बहुत हानिकारक होता है |
उत्तर भारत में दिसम्बर से फरवरी महीने पाला पड़ने वाले दिन है ऐसे में यहाँ के किसान फसलों के छोटे पौधों को बचाने के लिए फसलों की सिंचाई कर देते है खेतों में पानी दिये जाने से आद्रता बढ़ जाने से जल वाष्प अपने में संचित उष्मा से वायु और धरातल को ज्यादा ठंढा नहीं होने देती |

फसलों को पाले से बचाने के लिए करें लगातार करें सिंचाई

फसलों को पाले से बचाने के लिए करें लगातार करें सिंचाई

गत दिनों से मौसम में अचानक परिवर्तन होने की स्थिति को देखते हुए किसान ऐसी स्थिति में लगातार सिंचाई करें। अभी कुछ दिनों से मौसम में अचानक कभी उतार तो कभी चढ़ाव महसूस हो रहा है। इसका फसलों पर भी गहरा प्रभाव पड़ता है। इसको पाला कह सकतें है।

पारा गिरानें से आई किसानों के चेहरों की मुस्कान

पारा गिरानें से आई किसानों के चेहरों की मुस्कान

लगातार दो बार कमज़ोर मानसून की मार झेलने के बाद और इस बार अधिक ठंड ना पड़ने के कारण परेशान किसानों ने लगता है उम्मीद का दमन छोड़ा नहीं है। मौजूदा समय में लगातार तापमान बढ़ने से किसानों को रबी की फसल को लेकर चिंता सताने लगी थी लेकिन जब तापमान में गिरावट आई और ठिठुरन बढ़ी तो उनके चेहरों पर रौनक लौट आई है। गौरतलब है कि गेहूं जैसी मुख्य फसलों के लिए ज्यादा सर्दी की जरूरत होती है। माना ये जाता है कि सर्दी जितनी अधिक होगी, गेहूं की पैदावार उतनी ही बेहतर होती है।