पौधे

पेड़-पौधों या वनस्पतिलोक का अर्थ है, किसी क्षेत्र का वनस्पति जीवन या भूमि पर मौजूद पेड़-पौधे और इसका संबंध किसी विशिष्ट जाति, जीवन के ऱूप, रचना, स्थानिक प्रसार, या अन्य वानस्पतिक या भौगोलिक गुणों से नहीं है। यह शब्द फ्लोरा शब्द से कहीं अधिक बड़ा है जो विशेष रूप से जाति की संरचना से संबधित होता है। शायद सबसे करीबी पर्याय वनस्पति समाज है, लेकिन पेड़-पौधे शब्द स्थानिक पैमानों की विस्तृत श्रेणी से संबध रख सकता है, जिनमें समस्त विश्व की वनस्पति-संपदा समाविष्ट है। प्राचीन लाल लकड़ी के वन, तटीय सदाबहार वन, दलदल में जमने वाली काई, रेगिस्तानी मिट्टी की पर्तें, सड़क के किनारे उगने वाली घास, गेहूं के खेत, बाग-बगीचे-ये सभी पेड़-पौधों की परिभाषा में शामिल हैं।
पेड़-पौधे बायोस्फीयर के महत्वपूर्ण कार्यों में हर संभव स्थानिक पैमानों पर सहायक होते हैं। प्रथम, पेड़-पौधे अनेकानेक बायोजीयोकेमिकल, (बायोकेमेस्ट्री देखें) विशेषकर जल, कार्बन और नाइट्रोजन के चक्रों के प्रवाह को नियंत्रित करते हैं–इनका स्थानीय और विश्व ऊर्जा संतुलन में भी भारी महत्व होता है। ऐसे चक्र न केवल वनस्पति के वैश्विक, बल्कि जलवायु के भी स्वरूपों के लिये महत्वपूर्ण होते हैं। दूसरे, पेड़-पौधे मिट्टी के गुणों को भी प्रबल रूप से प्रभावित करते हैं, जिनमें मिट्टी का आयतन, रसायनिकता और बनावट शामिल हैं, जो बदले में उत्पादकता और रचना सहित विभिन्न वनस्पति गुणों को प्रभावित करती है। तीसरे, पेड़-पौधे इस ग्रह पर मौजूद जन्तुओं की विशाल सरणी(और अंततः उनके लिये जो आहार के लिये इन पर निर्भर हैं) के लिये वन्यजीवन आवास और ऊर्जा के स्रोत का काम करते हैं। संभवतः सबसे महत्वपूर्ण पर अकसर नजरअंदाज की जाने वाली बात यह है कि वैश्विक वनस्पति (शैवाल जाति सहित) वातावरण में आक्सीजन का प्रमुख स्रोत है, जो आक्सीजन पर निर्भर चयापचय तंत्रों के प्रादुर्भाव और कायम रहने में सहायक होती है।

राजस्थान में अब छाई रहेगी हरियाली

राजस्थान में अब छाई रहेगी हरियाली

राजस्थान में अब छाई रहेगी हरियाली , अब फसलों के साथ फल भी ले सकेंगे किसान, बढ़ेगा अतिरिक्त आय का जरिया  कड़ी मेहनत कर फसल उत्पादन करने वाले किसानों को अतिरिक्त आय का जरिया बढ़ाने के लिए दो योजनाएं शुरू की गई है। इसके तहत किसान आने वाले समय में फसलों के साथ खेत से फल भी ले सकेंगे। इससे उनकी आय में इजाफा होगा।