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अगर देश बचना है तो छोटे किसानों को बचाना ही होगा

अगर देश बचना है तो छोटे  किसानों  को बचाना ही होगा

एक बार फिर बिन मौसम बारिश और दिल्ली में सार्वजनिक तौर पर हुई आत्महत्या ने भारत में लंबे समय से उपेक्षित पड़े कृषि और गांव के मुद्दे को फिर से चर्चा में ला दिया. स्वतंत्रता के बाद शहरीकरण विकास की पूर्व शर्त बन गया. यह माना गया की बिना शहरीकरण हुए गाँवों का विकास नहीं हो सकता. इससे पलायन बढ़ा और गांव हाशिये पर चले गए. शहरों का विस्तार होता गया और वे गाँवों में घुस कर उसे शहर बनाने लगे. उपजाऊ जमींन बिचने लगी और कंक्रीट का फैलाव होता गया. महंगे बीज, उर्वरक और कीटनाशक, गिरता भूजल स्तर, बढ़ती मजदूरी के कारण खेती की लागत में बेतहाशा बढ़ोतरी हो चुकी है. ऐसे में बिना कर्ज लिए खेती संभव नहीं रह गई है. गांवों में आज गरीबी की निशानी कच्चा घर बन गया है. सभी दल ग्रामीण इलाकों के हितों के नारे लगाते हैं और गांवों, ग्रामीणों और खेती को प्रोत्साहित करने की बात करते हैं.

यह विडंबना ही है कि जिस देश में दो तिहाई लोग खेती पर आश्रित हैं और गांवों में रहते हैं, उस किसान को सिर्फ वोट की नजर से देखा जाता है. राष्ट्रीय नमूना सर्वेक्षण संगठन (एनएसएसओ) की 2003 की रिपोर्ट कहती है कि यदि कृषि से अलग अन्य कोई स्थाई रोजगार मिले तो देश के 40 फीसदी किसान खेती छोड़ने को तैयार हैं. फिर इन परिस्थितियों में भारत के समक्ष खेती और खाद्य सुरक्षा का सबसे बड़ा खतरा उत्पन्न होना है. विषय का पूर्व संदर्भ और मूल कारणों को जाने बिना ग्रामीण और कृषि अर्थशास्त्र के संकट की भयावहता को समझ पाना दुष्कर है. वास्तव में ईमानदारी से सब बातों को समझने की आवश्यकता है.

भारत में ग्रामीण जीवन को कृषि से अलग किया ही नहीं जा सकता. भारत में कृषि का भविष्य गांवों पर आधारित है. यदि भारत में गांव नहीं रहे तो खेती समाप्त हो जाएगी. भारत में खेती के लिए गांव इसलिए जरूरी हैं क्योंकि छोटे और सीमांत किसान जिनके पास पांच एकड़ से कम भूमि है, वे खेती पर आश्रित जनसंख्या का 85 प्रतिशत हैं. वे केवल गांवों में ही रहते हैं. उनके बिना भारतीय खेती मर जाएगी. वर्ष 2050 में भारत की जनसंख्या यदि 160 करोड़ रही तो ग्रामीण जनसंख्या इसकी आधी होगी. दस साल पहले भारत में लघु और सीमांत किसान परिवारों की संख्या 9.80 करोड़ थी जो अब 11.70 करोड़ हो गई है.

कृषि जनसंख्या के आंकड़ों के मुताबिक लघु और सीमांत किसान परिवार घरों की संख्या, कुल 13.80 करोड़ किसान परिवार घरों का 85 फीसदी है. उल्लेखनीय है कि 1961 में इनकी संख्या 62 फीसदी, 1991 में 78 फीसदी, 2001 में 81 फीसदी और 2011 में 85 फीसदी हो गई.

मजेदार तथ्य यह भी है कि लघु और सीमांत किसान बड़े खेतों वाले किसानों के मुकाबले कम क्षमतावान हों, ऐसा बिल्कुल भी नहीं है बल्कि ये अपेक्षाकृत अधिक उत्पादक हैं. ये 46 फीसदी खेती योग्य भूमि कृषि के काम लेते हैं और 52 फीसद अनाज, 70 फीसदी सब्जियां और 55 फीसदी फलों की पैदावार के साथ 69 फीसदी दूध भी संकलित करते हैं.

रूस में घरेलू पारिवारिक खेती करने वालों के पास तीन फीसदी कृषि योग्य भूमि है लेकिन रूस के लोगों द्वारा खाई जाने वाले सामग्री का 50 फीसदी पैदा करते हैं.

1950-51 में देश के जीडीपी में कृषि क्षेत्र का योगदान 55% था जो कि आज 15% से भी कम रह गया है जबकि इस दौरान कृषि पर निर्भर लोगों की तादाद 24 करोड़ से बढ़कर 72 करोड़ हो गई है. यही कारण है कि खेती पर निर्भर लोगों की आमदनी घटती जा रही है. कृषि क्षेत्र में कम आमदनी के कारण ही गांवों से शहरों की ओर पलायन शुरू हो गया है. इसकी पुष्टि 2011 की जनगणना के आंकड़ों से होती है जिसके मुताबिक पिछले एक दशक में किसानों की कुल तादाद में 90 लाख की कमी आई है, अर्थात हर रोज 2460 किसान खेती छोड़ रहे हैं. सच्चाई यह है कि छोटे किसान (लघु किसान और सीमांत किसान) मजदूर बन रहे हैं. उन्हें देश के किसी भी महानगर के दड़बेनुमा कमरों में देखा जा सकता है.

भारत में लघु किसान और सीमांत किसान अधिकतर अपने इस्तेमाल के लिए ही खेती करते हैं. यूएनडीपी की 2009 की रिपोर्ट के मुताबिक खाद्य पैदावार के कुल बाजार अधिशेष में इनकी हिस्सेदारी 20 फीसदी है. भारत की खाद्य सुरक्षा उन्हीं पर निर्भर रहती है. खाद्य एवं कृषि संगठन के मुताबिक भारत की कृषि अर्थव्यवस्था इन लघु व सीमांत किसानों पर ही बहुत अधिक निर्भर है.

जाहिर है की भारत में खाद्य सुरक्षा और कृषि अर्थव्यवस्था के लिए लघु किसान और लघु खेती का जीवित रहना आवश्यक है? लघु किसान अपने खेतों पर नहीं, वे इनके आसपास ही रहते हैं. उन्हें खेतों से अलग नहीं किया जा सकता. वे कस्बों और शहरों में रहकर खेती का प्रबंधन नहीं कर सकते. उन्हें गांवों में ही रहना पड़ेगा. उन्हें रहने के लिए गांवों की आवश्यकता है. समीकरण बिलकुल स्पष्ट है.

भारत में लघु और सीमांत किसानों के बिना कृषि की कल्पना नहीं की जा सकती और गांवों के बिना कोई लघु और सीमांत किसान नहीं रह सकता. वे भारत के कृषि के लिए महत्वपूर्ण संपत्ति हैं. यह सामाजिक तौर पर देश के हित में है कि इन छोटी जोत वाले किसानों (लघु किसान और सीमांत किसान)  की संख्या में बढ़ोतरी होती रहे. राष्ट्र को इन किसानों की उपज की उत्पादकता बढ़ाने में सहयोग देना चाहिए. इन्हें अधिक से अधिक साधन-संपन्न बनाना चाहिए.

यह भी सही है की छोटे  किसान (लघु किसान और सीमांत किसान)  यदि अपना सादा जीवन फिर अपना सके, खेतों को फिर से रसायनों से मुक्त कर जैविक बना सके और शहर के दिखावा को छोड़ सके तो न तो कर्ज की नौबत आएगी और न आत्महत्या की.

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