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टमाटर को सहारा (स्टेकिंग) देना व फलो की तुड़ाई एवं भंडारण

टमाटर के फलो के उत्तम व आकर्षक रंग, उनको सड़ने से बचाने के लिये एवं फलो के उचित आकार के लिये खास तौर पर अनिर्धारित वृद्धि वाले किस्मो को सहारा देना आवश्यक होता है। चुंकि टमाटर का पौधा शाकीय होता है एवं लदे हुये फलो का भार सहन नही कर पाता इसलिये जमीन मे फल सहित इसकी शाखाएं गिर जाती है। यदि पौधे को सहारा नही दिया जाये तो जो फल नमी अवस्था मे मृदा के सम्पर्क मे आता है वह सड़ जाता है। अतः ऐसा फल बाजार मे बेचने योग्य नही रहता एवं एक अनुमान के अनुसार लगभग 40 प्रतिशत फलो का नुकसान हो जाता है। जब टमाटर का पौधा रोपाई के बाद 25-30 दिन का हो जाये तब सहारा देने का कार्य करना चाहिये।

सहारा देने की विधिः- यदि किसान इसकी खेती व्यवसायिक स्तर पर करते है तो सहारा देने के लिये टमाटर जिस कतार मे लगा है उस कतार मे 5 मीटर की अंतराल पर 1.5-2 मीटर ऊॅंचे-ऊॅंचे बांस गाड़ देते है एवं इन बांसों मे 3-4 तार इस प्रकार बांधते है कि पहला तार जमीन से लगभग 45-50 से.मी. ऊंचाई पर रहे एवं बाकी तार 30-30 से.मी. की ऊंचाई पर इस तरह से बांधते है कि एक मंडप नुमा आकृति बन जाये। इन तारो से सुतली या रस्सी बांधकर इस सुतली के नीचे जाने वाले छोर पर छोटी-छोटी खूंटी बांध कर उस खूंटी को पौधे के बगल मे गाड़ देते है, जिससे पौधे सुतली के सहारे चढ़ सके।

सहारा देने की अन्य विधियो मे अरहर, ढैंचा या अन्य लकड़ियो के टुकड़ो को 15-20 से.मी. के अंतराल पर भूमि मे गाड़ दिया जाता है एवं पौधो को सुतली की सहायता से इन गाड़े हुये लकड़ी के टुकड़ो से बांध दिया जाता है जिससे पौधे सीधे चढ़ सके।

सहारा देने की एक अन्य विधि मे कुछ स्थानो पर सूरजमुखी के बीजो को टमाटर के जड़ क्षेत्र मे टमाटर रोपाई के लगभग 20 दिन बाद बंुवाई कर दिया जाता है। जब टमाटर के पौधे मे रोपाई के 55-60 दिन बाद फल आने शुरू होते है उस अवस्था तक सुरजमुखी का पौधा टमाटर के पौधो को सहारा देने लायक हो जाता है। इस प्रकार इस विधि मे किसी प्रकार की अतिरिक्त सामाग्री जैसे लकड़ी, बांस, खूंटी आदि की आवश्यकता नही पड़ती एवं साथ ही साथ किसानो का श्रम, पैसा एवं समय की बचत हो जाता है। इसके साथ ही सुरजमुखी के पौधो से अतिरिक्त आमदनी भी प्राप्त होती है। इस प्रकार यह विधि सघन खेती का एक उदाहरण भी पेश करती है। ऐसा देखा गया है कि अन्य विधियो की अपेक्षा यह विधि सरल, सस्ता एवं पौधो को सीधे सहारा देने मे ज्यादा उपयुक्त है।

फलो की तुड़ाईः-

टमाटर की बाजार की मांग के अनुसार तोड़ाई की जाती है। अलग-अलग किस्मो के अनुसार फलो की तुड़ाई के बीच अंतर हो सकता है। सामान्यतः इसके फल रोपाई के लगभग 60-70 दिन बाद पहली तुड़ाई के लायक हो जाते है। चंूकि सभी फलो मे परिपक्वता एक साथ नही आती अतः नियमित अंतराल (4-5 दिन) पर तुड़ाई की जानी चाहिये इस प्रकार कुल लगभग 7-10 तुड़ाई एक मौसम मे की जा सकती है। सामान्यतः सुबह जल्दी एवं शाम के वक्त तुड़ाई करना चाहिये। दूरस्थ बाजारो के लिये फलो को परिपक्व हरी अवस्था मे तोड़ा जाता है ताकि फल बाजार मे बिक्री हेतु पहुचने तक गुलाबी/लाल अवस्था मे आ जाये। स्थानीय बाजारो के लिये फलो की गुलाबी अवस्था मे तुड़ाई की जानी चाहिये। बीज उत्पादन के लिये फलो को परिपक्व लाल अवस्था मे तोड़ना चाहिये एवं आचार, डिब्बा बंदी, साॅस, केचप आदि के लिये पूर्ण पकी लाल अवस्था मे तुड़ाई करनी चाहिये। बाजारो मे बेचने हेतु फलो को लकड़ी या बांस के बने बाक्स, प्लास्टिक कैरेट्स आदि मे पैकिंग करके भेजना चाहिये। कुछ रसायन जैसे जिबरेलिक अम्ल ( जी.ए.-3) के प्रयोग से फलो मे होने वाले रंग परिवर्तन को 1 सप्ताह तक रोका जा सकता है एवं फलो मे जल्दी परिपक्वता एवं पकने की क्रिया को बढ़ाने के लिये इथ्रेल को (1000 पी.पी.एम) का फलो के पकने की शुरूवाती अवस्था मे छिड़काव कर दिया जाता है।

भंडारणः-

परिपक्व हरे टमाटर को 8-10 डिग्री तापमान एवं 85-90 प्रतिशत सापेक्षिक आर्द्रता पर सामान्यतः 30 दिनो तक रखा जा सकता है। पूर्ण पके हुये टमाटर को 7-8 डिग्री तापमान एवं 85-90 प्रतिशत आर्द्रता पर 1 सप्ताह तक सुरक्षित रखा जा सकता है।

सीताराम देवांगन और घनश्याम दास साहू

उघानिकी विभाग, इंदिरा गांधी कृषि महाविघालय रायपुर 

जैविक खेती: