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पर्वतीय क्षेत्रों में जैविक खेती

  • जैविक खेती प्रजातियाँ कर्षण एवं जैविक नाशाकजीवी प्रबन्धन सहित पारिस्थितिक दृष्टी से आधारित कृषि क्रियाओं पर निर्भर होती हैं
  • वस्तुत : इसके फसल उत्पादन में रसायनों संशलिष्ट रसायनों के प्रयोग को बाहर रखा गया है और पशुधन उत्पादन में प्रतिजैविकों एवं हार्मोनों के प्रयोग को प्रतिबंधित किया गया है।

जैविक उपज क्या है ?

  • जैविक उपज ऐसी उपज है, जो उर्वरकों एवं पेस्टीसाइडों का प्रयोग किए बिना उगाई जाती है।
  • जैविक उपज प्रामाणित करने के लिए खाद्य को रासायनिक उर्वरकों, एवं पेस्टीसाइडों, आनुवंशिक इंजीनियरिंग, वृध्दि हार्मोनों, विकिरण या प्रतिजैविकों के प्रयोग के बिना उत्पादित करना चाहिए।

सब्जी मटर की जैविक खेती

  • उत्तराखण्ड में भूमि मापन नाली के रूप में किया जाता है और एक नाली 200 वर्ग मीटर के बराबर होती है।

उत्तराखण्ड की पहाड़ियों में कुछ स्थानों पर सब्जी मटर जैविक रूप में उगाई जाती है। चरण- वार प्रक्रिया नीचे संक्षेप में दी गई है:

भूमि तैयारी:

  • भूमि ढ़ीली एवं भुरभुरी बनाने के लिए दो तीन बार हैरो चलाना चाहिए।
  • भूमि समतल बनाना और जल निकास की व्यवस्था की जानी चाहिए।
  • बीजों के समुचित अंकुरण के लिए पर्याप्त आर्द्रता होनी चाहिए।

उर्वरक मात्रा और उपचार:

  • फसल एवं भूमि की पोषक आवश्यकता पूरी करने के लिए भूमि तैयार करते समय मृदा में 30-40/हैक्टेयर (6-8 क्विंटल/नाली) अच्छी तरह से सड़ी हुई गोबर की खाद या 20-25 टन/हैक्टर (4-5 क्विंटल/नाली) वर्मी कम्पोस्ट अच्छी तरह से मिलाना चाहिए।
  • बोआई से 10-15 दिन पहले, 2.0 क्विंटल/हैक्टेयर (4-5 कि.ग्रा./नाली) अच्छी तरह से सड़ी हुई गाय के गोबर की खाद या कम्पोस्ट के साथ 2.5 कि.ग्रा./हैक्टेयर (50 ग्राम/नाली) ट्राइकोडर्मा पाउडर को मिश्रित करके समुचित वातन रखने वाली जूट की बोरियों में बंद कर लेना चाहिए। बोआई से पहले खेत में उपचारित खाद का छिड़काव करना चाहिए। ट्राइकोडर्मा के प्रयोग से कवक एवं उनसे संबंधित रोगों को रोकने में सहायता मिलती है।

प्रजातियों का वरण:

      विवेकानन्द पर्वतीय कृषि अनुसंधान संस्थान ने जैविक खेती के लिए सब्जी मटर की निम्नलिखित प्रजातियों की संस्तुति की गई है,

  • विवेक मटर 8
  • विवेक मटर 9
  • विवेक मटर 10
  • आर्किल
  • आजाद मटर 1

बोआई का समय:

  • निचले पर्वतीय क्षेत्रों के लिए (3,000 फुट तक): सितम्बर के अंत से लेकर मध्य अक्टूबर तक।
  • मध्यक उँचाई के पर्वतीय क्षेत्रों के लिए (3,000-5000 फुट): नवम्बर का पहला पखवारा।
  • अधिक उँचाइयों के लिए (5,000-7000 फुट) : अगस्त का दूसरा पखवारा या फरवरी के अंत में या मार्च - अप्रैल।

बीज दर:

  • अच्छी उपज प्राप्त करने के लिए 80-100 कि. ग्रा./हैक्टेयर (1.5-2.0 कि. ग्रा./नाली) पर्याप्त है।
  • अगस्त/सितम्बर के दौरान बोआई के दौरान बीज की मात्रा 10-20% तक बढ़ानी चाहिए।

बीज उपचार और बोआई की विधि:

बीज उपचार:

  • बोआई से 2-3 घंटे पहले बीजों का राइजोबियम या पी एस बी संवर्ध (बायोफर्टिलाइजर) से उपचारित कीजिए।
  • 1.5-2.0 कि.ग्रा. बीज (एक नाली के लिए) लीजिए और इसे हलका - सा गीला कीजिए।
  • 15-20 ग्राम राइजोबियम या 15-20 ग्राम पी एस बी मिश्रित कीजिए और प्रत्येक बीज पर सूक्ष्मजीवीय उर्वरकों की परत लगाइए।
  • छाया में उपचारित बीजों को सुखाइए।

बोआई की विधि:

  • बोआई के समय पर पर्याप्त नमी होनी चाहिए।
  • प्रात:कालीन घंटो में या सायंकाल बीजों की बोआई लाभदायक होती है।
  • बीजों की बोआई खूड में हल से या पंक्तियों में बोआई की जानी चाहिए।
  • खूड से खूड के बीच या पंक्ति से पंक्ति के बीच दूरी 30 से.मी. (एक फुट) होनी चाहिए।
  • बीज से बीज की दूरी 4-5 से. मी. होनी चाहिए।
  • बोआई की गहराई 3-4 से. मी. होनी चाहिए अन्यथा बीज उचित ढंग से अंकुरित नहीं होंगे।
  • बोआई की छिटकवाँ विधि में बीज उचित रीति से वितरित नहीं होते है और मृदा के ऊपरी सतह पर बने रहते हैं, इसलिए अंकुरण अच्छा नहीं होता है।

सिंचाई:

    यदि पर्याप्त पानी उपलब्ध है, तो पहली सिंचाई पुष्पन के समय पर और दूसरी हलकी सिंचाई फली भराव अवस्था पर की जानी चाहिए।

   सिंचाई की छिड़काव पध्दति मटर में काफी महत्वपूर्ण है, इस पध्दति द्वारा पानी की मात्रा की बचत होती है तथा पौधों में पानी की अधिकता से होने वाले दुष्प्रभाव भी कम हो जाते हैं।

  • फसल खरपतवारों से मुक्त रखनी चाहिए।
  • समुचित निराई - गुड़ाई कार्य।
  • पहली निराई - गुड़ाई बीज बोआई के 20-25 दिन बाद और आवश्यकता पड़ने पर, दूसरी निराई 20-30 दिनों के अंतराल पर की जानी चाहिए।
  • उन्नत प्रौद्योगिकियों, जैसे पहियेदार हो का प्रयोग कीजिए और हत्थीदार हो कुदाल की अपेक्षा अच्छा होता है।

रोग प्रबन्ध:

 पर्वतीय क्षेत्रों में सब्जी मटरों को प्रमाणित करने वाले कुछ रोग बीज/मूल विगलन, म्लानि, चूर्णिल फफूँदी, सफेद स्क्लेरोटिनिया विगलन हैं।

1. म्लानि रोग

  • प्रभावित पौधे का ऊपरी हिस्सा पीला पड़ जाता है।
  • निचली पत्तियाँ पीली पड़ जाती है और वे गिरनी शुरू हो जाती हैं।
  • पौधे का पिछला हिस्सा सिकुड़ जाता है और पत्तियों के पीला पड़ने के बाद पौधा सूख जाता है।

2. बीज/मूल निगलन

  • प्रारंभिक अवस्थाओं में या बीज अंकुरण के बाद बीज मृदा मे सड़ जाते हैं।
  • बढ़ते हुए पौधे में पौधे की वृध्दि रूक जाती है और पौधा सड़ना शुरू हो जाता है।
  • ऐसी भारी मृदाएं, जहाँ समुचित जल निकास सुविधा नहीं होती है, में रोगों की प्राप्ति के अधिक अवसर होते है।

3. सफेद/स्क्लेरोटिनिया विगलन

  • यह रोग पुष्पन अवस्था पर फरवरी में गंभीर हो जाती है।
  • मृदा के अधिक निकटवर्ती पौधे के निचले हिस्सों पर सफेद कपास की भांति कवक वृध्दि दिखाई देने लगती है।
  • प्रभावित पौधों के तनों के भीतरी एवं बाहरी हिस्सों पर गोल काली चित्तियाँ दिखाई देती है जो बाद की फसलों को प्रभावित करती हैं।

 4. चूर्णिल फफूंदी :

  • रोग प्रतिरोधी या रोग सहिष्णु प्रजातियों का प्रयोग कीजिए।
  • ट्राइकोडर्मा जातियों से बीज उपचारित कीजिए।
  • रोग की प्रारंभिक अवस्था में 10 ग्राम/लीटर जल की दर पर स्यूडोमोनास फ्लुओरेसेन्स का छिड़काव कीजिए।
  • खड़ी फसल में निराई - गुड़ाई कार्यों द्वारा मृदा का समुचित वातन सुनिश्चित कीजिए।
  • समुचित फसल - चक्र अपनाइए।
  • उचित रीति से रोगग्रस्त पौधों को नष्ट कर दीजिए।
  • चूर्णिल फफूंदी के नियंत्रण के लिए रोग के लक्षण दिखाई देते ही निलंबनशील गंधक (2 ग्राम/लीटर जल) का छिड़काव कीजिए।

हानिकारक कीट प्रबंध:

 पर्वतीय क्षेत्रों में सब्जी मटर को गंभीर रूप से प्रभावित करने वाले कीट तना वेधक और पर्ण सुरंग है।

  • इस कीट के डिंभक पत्तियों में सुरंग बनाकर उन्हें खाती हैं। दिसम्बर के दौरान आक्रमण गंभीर होता है।
  • छोटी सूंडियाँ फलियों के पृष्ठ पर खाना शुरू करती है, उनका वेधन करती है और बीजों को खाती हैं। वे फलियों को उपयोग के लिए अनुपयुक्त बनाती हैं।

नियंत्रण के उपाय :

  • कीट प्रतिरोधी/ सहिष्णुबीज वाली प्रजातियों का प्रयोग कीजिए।
  • मि. ली. / लीटर में एजेडेरेक्टिन (0.15%का छिड़काव कीजिए।
  • फली वेधक के नियंत्रक के लिए पुष्पन अवस्था के दौरान 8-10 दिनों के अंतराल पर 3-4 बार 50,000/हैक्टेयर की दर पर ट्राइकोडर्मा काइलोनिकस कीटों का प्रयोग कीजिए।
  • कि. ग्रा./हैक्टेयर की दर पर बैसिलस थुरिन्जिएन्सिस का छिड़काव कीजिए।

पादप उपज द्वारा हानिकारक कीट प्रबंध की परंपरागत विधि:

1-  बिच्छू घास : 5-6 ग्राम ताजी बिच्छू घास की पत्तियाँ काट लीजिए और उन्हें 5 लीटर पानी में भिगोइए/ इसमें 1-1.5 लीटर ताजा गाय के मूत्र मिलाइए। 72 घंटों के बाद इसे कपड़े से छान लीजिए।

2-  अखरोट :  5-8 कि. ग्रा. अखरोट की पत्तियां तोड़िए और इसे 5-7 लीटर पानी  में  भिगोइए। इसमें 1 लीटर ताजा गाय का मूत्र मिलाइए। 72 घंटों के बाद इसे कपड़े से छान लीजिए।

3-  पाती (आर्टिमिशिया) : 5-8 कि. ग्रा. आर्टिमिशिया (पाती) की पत्तियां 4-5 लीटर पानी में भिगोइए। इसमें 2 लीटर गाय का मूत्र मिलाइए। 96 घंटों के बाद इसे कपड़े से छान लीजिए।

पादप निष्कर्षों का प्रयोग एवं भंडारण में बरती जाने वाली सावधानियाँ

  • एक सप्ताह से 10 दिनों के भीतर बिच्छू घास के निष्कर्ष का प्रयोग कीजिए।
  • पादप निष्कर्षों के छिड़काव के एक सप्ताह बाद फलियों की चुनाई कीजिए।
  • पुष्पन एंव फली भराव अवस्था पर छिड़काव फसल को अधिक निवारण क्षमता प्रदान करता है।
  • तैयार करने के एक महीने के भीतर निष्कर्ष का प्रयोग करना चाहिए।
  • उपलब्ध पौधों के आधार पर न्यूनतम आवश्यक मात्रा में निष्कर्ष तैयार करना चाहिए।
  • प्रात:काल एवं सायंकाल के दौरान निष्कर्ष का छिड़काव करना चाहिए (अपरान्ह् में छिड़काव मत कीजिए)।

सब्जी मटर उत्पादन में फसल सुरक्षा की देसी तकनीके

  • प्रात:काल (पत्तियों पर ओस होने तक) खड़ी फसल पर उपले की राख का छिड़काव कवक रोगों एवं हानिकारक कीटों से सुरक्षा प्रदान करता है।
  • मटर के साथ (किनारों पर) पालक की बोआई अर्थात् अंतरासस्यन से पक्षियों से हानि की रोकथाम से सहायता मिलती है।

फलियों की चुनाई

  • फलियों की चुनाई (तुड़ाई) के दौरान पौधों की सुरक्षा के बारे में सतर्क रहना चाहिए।
  • 8-10 दिनों के अंतराल पर 3-4 बार चुनाई की जानी चाहिए।