उत्पादन बढ़ाने के सफल एवं सरल उपाय

फसल उत्पादन बढ़ाने के उपाय

देश की वर्तमान जनसंख्या (लगभग 102 करोड़) आगामी 20 वर्षो में लगभग 140 करोड़ और शताब्दी के मध्य तक बढ़कर लगभग 170 करोड़ हो जाने का अनुमान है। इस प्रकार निरन्तर बढ़ती जनसंख्या की खाद्यान्न की आवश्यकता पूर्ति हेतु हमें देश में खाद्यान्न की उत्पादन सन् 2025 तक 380 मि. टन और सन् 2050 तक 480 मि. टन तक बढ़ाना होगा। साथ ही बढ़ती आवश्यकता के अनुरूप ही तिलहन, चीनी, सब्जी-फल, चारा, रेशा,दूध, मांस-मछली आदि का उत्पादन भी बढ़ाना होगा, परन्तु समस्या यह है कि दिन-प्रतिदिन भूमि की उपलब्धता कम होती जा रही है। वर्ष 1999-2000 में प्रति व्यक्ति 0.15 हैक्टर भूमि उपलब्ध थी जो 2020 तक घटकर मात्र 0.05 हैक्टर प्रति व्यक्ति रह जायेगी। ऐसी स्थिति में इन फसलों के अंतर्गत अधिक क्षेत्र तो बढ़ाना असंभव है। साथ ही अधिक उत्पादन लेने के लिए संसाधनों का क्षमता से अधिक दोहन हो रहा है। खेती में उर्वरक और पीड़ंकनाशी रसायनों के बढ़ते प्रयोग से पर्यावरण-मृदा, जल और वायु के प्रदूषण की समस्या बढ़ रही है। इन सभी समस्याओ पर काबू पाने और उत्पादन बढ़ाने का एक ही उपाय है कि प्रति इकाई संसाधन फसल उत्पादकता बढ़ाई जाये और जनसंख्या के अनुरूप उत्पादन बढ़ाने तथा पर्यावरण को प्रदूषण से बचाने के लिए कृषि उत्पादन के टिकाऊपन पर ध्यान दिया जाये।

फसल उत्पादन के मुख्यतः दो प्रकार की लागतें लगाई जाती हैं:

1. खर्चीली लगातें जैसे कि बीज, खाद-उर्वरक, जल, पीड़कनाशी रसायन आदि और दूसरा बिना खर्च वाली लागतें जैसे कि किस्म का चुनाव, बुआई का समय और उर्वरक, पानी और पीड़कनाशी के प्रयोग का समय और ढंग।

खर्चीली लागत:

इनको जुटाने में किसान को नगद भुगतान करना पड़ता है। यदि इन लागतों का किफायत से उपयोग नहीं किया जाये तो लागत व्यर्थ जायेगी।

बिना खर्चीली लागतें:

इन लागतों पर किसान को कुछ खर्च नहीं करना पड़ता। मात्र सूझबूझ और समय के उपयोग करने पर ही खर्चीली लागतों की उपयोग क्षमता बढ़ाई जा सकती है।

किस्म का चुनाव:

किसान को अपने खेत की स्थिति सिंचित या बारानी और बुआई का समय अगेती, पछेती या समय से देखकर किस्म का चुनाव करना चाहिए। बीज कटा-फटा और रोगग्रस्त न हो।

बुआई:

बुआई के समय पंक्तियों के बीच दूरी, बीज से बीज या पौधे की दूरी, बीज डालने की गहराई और खेती में नमी आदि का ध्यान रखना चाहिए। बीज कम डालेंगे तो खेत में पर्याप्त पौधे नहीं रहेगें

और फसल संसाधनों का पूरा उपयोग नहीं कर पायेगी। इसी प्रकार आवश्यकता से अधिक पौधे होने पर पौधो में संसाधनों-प्रकाश, पोषक तत्व और नमी के लिए स्पर्धा बढ़ेगी फलस्वरूप उपज कम मिलेगी।

लागतों की उचित मात्रा, उचित ढंग से उपयुक्त समय पर दें:

खाद-उर्वरक, सिंचाई और पीड़कनाशी रसायनों का प्रयोग उचित मात्रा में उचित ढंग से उपयुक्त समय पर करने से ही कारगर सिद्ध होगा।

कभी भी बीज और उर्वरक मिलाकर न डालें। उर्वरक बीज के नीचे नमी में डालें। सूखी मिट्टी में या बिखेर कर डाला गया उर्वरक फसल काम में नहीं ला पायेगी। नाइट्रोजनधारी उर्वरकों को दो-तीन बार में थोड़ी-थोड़ी मात्रा में दें क्यों इनका हृास बहुत तेजी से होता है। फाॅस्फोरस और पोटाशधारी उर्वरक बुआई के समय बीज के नीचे परन्तु गंधकधारी पदार्थ बुआई से 15-20 दिन पहले खेत में डालें। इसी प्रकार गोबर की खाद, कम्पोस्ट, फसल अवशेष हरी खाद आदि पर्याप्त समय पहले खेत में मिला दें। सिंचाई में जल महत्वपूर्ण लागत है। इसीलिए हम प्रति बूंद अधिक उत्पादकता की ओर ध्यान देते हैं। बारानी क्षेत्रो में वर्षा के जल को व्यर्थ न जाने दें। यथा समय संरक्षण और एकत्र करने के उपाय करें। सिंचित क्षेत्रों में फसल की मांग के अनुसार पानी दें। छोटी-छोटी क्यारी बनाकर या नाली-डौली पद्धति से सिंचाई करना अधिक उपयोगी रहता है। खरपतवारों का समय से नियंत्रण करें और पीड़कनाशी रसायनों का उचित मात्रा में उपयुक्त समय पर प्रयोग करें। पर्यावरण के प्रदूषण की समस्या से छुटकारा पाने के लिए हमें लागतों के समेकित प्रयोग कर ध् यान देना चाहिए।

 

समेकित पोषण प्रबंधन:

फसलों की पोषण की आवश्यकता पूर्ति हेतु उर्वरकों के साथ जैविक खाद जैव-उर्वरक, फसल अवशेष और पत्तीदार फसलों का प्रयोग करना आधुनिक युग की आवश्यकता हो गयी है। खरपतवारांे और अन्य पीड़क जीवों के नियंत्रण हेतु रसायनों के प्रयोग से पहले पीड़क जीवों के फैलने से रोकने के उपाय करने चाहिए। इसमें ग्रीष्मकालीन जुताई, खेत में पानी भरना, समय से बुआई, फसल चक्र अपनाना आदि क्रियाओं को सम्मिलित किया जाये ताकि पीड़कजीवों के प्रकोप को कम किया जा सकंे। रसायनों के प्रयोग के समय उसकी मात्रा, छिड़काव का समय और विधि का ध्यान रखना चाहिए। ध्यान में रखते हुए अब यह आवश्यक हो गया है कि ये अनाज अब गरीब जनता को अधिक मात्रा में उपलब्ध हों। इसके लिये प्रति हैक्टर उत्पादन बढ़ाना होगा जिसके फलस्वरूप इन अनाजों का प्रतिवर्ष उत्पादन बढ़ाया जा सकें। इनकी गुणवत्ता को और सुधारना होगा, विशेषकर इनके रंग में परिवर्तन लाना होगा, जिससे जनता इन्हें सहर्ष स्वीकार कर सकें। जबसे बाजरा की सफेद रंग की किस्में विकसित हुई हैं तब से आम जनता बाजरा को चाहने लगी है। सर्दी के दिनों में कम लागत पर अधित शारीरिक ऊर्जा केवल इन्हीं मोटे अनाजों से प्राप्त हो सकती है। भविष्य में सुधार की कुछ योजनायें निम्नलिखित होगी-

  • अधिक उपज देने वाली, बीमारी रहित और कम समय में पकने वाली किस्मों का विकास।भीषण सूखा की स्थिति के लिए उपयुक्त किस्मों का विकास। कम उर्वरक लागत पर अधिक उपज देने वाली किस्मों का विकास।

·        स उपयुक्त फसल चक्र और अंतः फसलीकरण के लिये इन मोटे अनाजों की किस्मों का विकास और चयन।

·        द्विउद्देश्य किस्मों का विकास जिससे मनुष्य और जानवरों का जीवानोपार्जन सुचारू रूप से हो सकें।

·        ऐसी किस्मों का विकास करना जो रेह युक्त भूमि में भी अधिकतम उपज दे सकें।

·        तटीय क्षेत्रों के लिये मोटे अनाजों की ऐसी किस्मों का विकास जो समुद्र के पानी द्वारा आसानी से उगाई जा सकें।

·        लंबे समय तक भंडारण की क्षमता रखने वाली किस्मों का विकास।

  • आकर्षक रंग के दानों वाली किस्मों का विकास।
  • आनुवंशिक एवं जैव-प्रौद्योगिकी विधि द्वारा फसलों की गुणवत्ता में बढ़ोतरी।
  • समेकित पोषक तत्व प्रबंध द्वारा फसलों की पोषक तत्वों की आवश्यकताओं की पूर्ति करना, जिसमें जैव-उर्वरक आदि का अधिक से अधिक उपयोग।
  • ऐसी कृषि-तकनीकी का विकास जिससे फसल उन क्षेत्रों में उगाई जा सकें जहां अभी तक इनकी खेती नहीं होती है।
  • विकसित किस्मों के बीज को किसानों को उपलब्ध कराना। अगर उन्नत बीज किसानों को उपलब्ध हो गये तो ये मोटे अनाज सभी उपयुक्त स्थानों पर आसानी से उगाये जा सकते है। ऐसा होने से प्रति एकड़ उपज अधिक होगी तथा वार्षिक उत्पादन उच्च शिखर पर पहुंच सकता है।

·        इन मोटे अनाजों में से कुछ ऐसे अनाज हैं जो उनकी गुणवत्ता के आधार पर फास्ट-फूड के रूप में प्रयोग में लाये जा सकते हैं। भविष्य में इस पर विशेष ध्यान देना होगा। भविष्य में उपरोक्त कार्यनीति को अगर गंभीरता से कार्यान्वित किया गया तो यह निश्चित है कि अभी तक भूले-बिसरे बने ये मोटे अनाज मुख्य अनाजों की गिनती में आ जायेंगे तथा देश के कुल अन्न उत्पादन में एक बहुत बड़ा योगदान दे सकते है। भारत की गरीब जनता जिन्हें चावल और गेहूं उपलब्ध होने में कठिनाई होती है वहीं वे बड़ी आसानी से कम लागत पर पैदा होने वाले मोटे अनाजों को ग्रहण कर सकेंगे। भावी चुनौतियां यह संभावना है कि वर्ष 2020 तक देश की जनंसख्या लगभग 1.3 अरब हो जाएगी और जनसंख्या तथा खाद्यान्न उत्पादन के बीच की खाई चैड़ी होगी। इस समय हमारे पास अन्न का प्रचुर भण्डार भले ही हो लेकिन इसके बावजद 30 प्रतिशत से भी अधिक देशवासी गरीबी की रेखा से नीचे जीवन यादप कर रहे हैं। हमें अनेक चुनौतियों जैसे कम हो रहे भू-संसाधन, जैविक तथा अजैविक बाधाओं मं वृद्धि, उत्पादकता में गिरावट, जैव-विविधता के लुप्त होने के खतरे, प्राकृतिक संसाधनों के अपघटन व उनक कम होते जाने, जलवायु परिवर्तन, व्यापार के उदारीकरण और भूमंडलीकरण् आदि को विचाराधीन रखते हुए कृषि विज्ञान में प्रगति के लिए अग्रसर होना होगा। वर्तमान में हमारा प्रयास निम्नलिखित कुछ मुख्य बिन्दुओं पर केन्द्रित है:नई संकल्पनाओं, परिकल्पनाओं तथा प्रौद्योगिकियों के विकास के द्वारा कृषि अनुसंधान व प्रसार के क्षेत्र में राष्ट्रीय नेतृत्व प्रदान करना।

·        कृषि को प्रतिस्पर्धात्मक बनाने के लिए किसानों के बीच जागरूकता उत्पन्न करना।

·        पर्यावरण संरक्षण; सब्जियों, फलों और फूलों के माध्यम से फसलों का विविधिकरण; ड्रिप और स्प्रिंकलर सिंचाई पर बल देते हुए समेकित मृदा- जल-पोषण प्रबन्धन; जैविक और अजैविक प्रतिकूल स्थितियों का एकीकृत प्रबंध; गुणवत्तापूर्ण बीजों का उत्पादन और उनकी आपूर्ति; जैविक कृषि को प्रोत्साहन; मशीनीकृत खेती; कृषि यन्त्रों व भण्डारण संरचनाओं का दक्ष उपयोग और शहरों के आस-पास खेती के लिए रणनीतियों का निर्धारण आदि।

·        फसलों के सुधार, कीट और रोग प्रबन्धन तथा निदानकारी जांच के विकास के लिए जैव-प्रौद्योगिकी का उपयोग।

·        कृषि जैव-विविधता, पादप किस्मों का संरक्षण, पादप प्रजनक अधिकार कृषक अधिकार, बौद्धिक सम्पदा अधिकार, जैव-प्रौद्योगिकी तथा जैव सुरक्षा आदि पर नीतिगत अनुसंधान को सुदृढ़ बनाना;

·        कृषि प्रसंस्करण उत्पाद विकास और मूल्यवर्धन; कृषि के वाणिज्यीकरण के लिए सार्वजनिक तथा निजी क्षेत्रों के बीच पारम्परिक सम्पर्क बढ़ाना,

·        बेरोजगार ग्रामीण युवकों और महिलाओं को मधुमक्खी पालन, गृह वाटिका तैयार करने और मशरूम की खेती वर्मीकल्चर आदि में प्रशिक्षित कर उन्हें संशक्त करना।