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विभिन्न महीनों में पशुपालन से सम्बन्धित कार्य

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विभिन्न महीनों में पशुपालन से सम्बन्धित कार्य

 पशुपालन कार्य
वर्ष के विभिन्न महीनों में पशुपालन से सम्बन्धित कार्य (पशुपालन कलेण्डर) इस प्रकार हैं-

अप्रैल (चैत्र)
*1. खुरपका-मुँहपका रोग से बचाव का टीका लगवायें। 
*2. जायद के हरे चारे की बुआई करें, बरसीम चारा बीज उत्पादन हेतु कटाई कार्य करें। 
*3. अधिक आय के लिए स्वच्छ दुग्ध उत्पादन करें। 
*4. अन्तः एवं बाह्य परजीवी का बचाव दवा स्नान/दवा पान से करें।

करोड़पति बनना है तो गाय पालन करें

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करोड़पति बनना है तो  गाय पालन करें

गाय का यूं तो पूरी दुनिया में ही काफी महत्व है, लेकिन भारत के संदर्भ में बात की जाए तो प्राचीन काल से यह भारत की अर्थव्यवस्था की रीढ़ रही है। चाहे वह दूध का मामला हो या फिर खेती के काम में आने वाले बैलों का। वैदिक काल में गायों की संख्‍या व्यक्ति की समृद्धि का मानक हुआ करती थी। दुधारू पशु होने के कारण यह बहुत उपयोगी घरेलू पशु है। गाय पालन ,दूध उत्पादन व्यवसाय या डेयरी फार्मिंग छोटे व बड़े स्तर दोनों पर सबसे ज्यादा विस्तार में फैला हुआ व्यवसाय है। गाय पालन व्यवसाय, व्यवसायिक या छोटे स्तर पर दूध उत्पादन किसानों की कुल दूध उत्पादन में मदद करता है और उनकी आर्थिक वृद्धि को बढ़ाता है। इसमें कोई स

पशु में फैलती महामारियां

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पशु में फैलती महामारियां

हो सकता है बरसों पहले इंग्लैंड में फैला मैडकाउ रोग आपको याद हो। इस बीमारी (बीएसई) ने गायों के मानसिक संतुलन को पागलपन की हद तक बिगाड़ दिया था, इसलिये इसे पागल गाय रोग कहा गया है। इस रोग की वजह से लाखों गाय-बछड़ों का बेरहमी से मार डाला गया था। माना जाता है कि यह रोग इसलिए फैला कि गायों को उन्हीं की हड्डियों, खून और अन्य अवशेषों का बना हुआ आहार खिलाया गया। आधुनिक बूचडख़ानों में गायों आदि को काटने के बाद मांस को तो पैक करके बेच दिया जाता किन्तु बड़े पैमाने पर हड्डियां, अंतडिय़ां, खून आदि का जो कचरा बचा, उसको ठिकाने लगाना एक समस्या हो गया।  इस समस्या से निपटने का एक तरीका यह निकाला गया है कि इस क

खुश रहेगी गाय तो दूध होगा ज्यादा पौष्टिक

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खुश रहेगी गाय तो दूध होगा ज्यादा पौष्टिक

अगर आप चाहते हैं कि आप की गाय ज्यादा दूध दे और उसका दूध पौष्टिक भी रहे तो जरूरी है कि गाय स्वस्थ और खुश रहे। एक अध्ययन में यह रोचक खुलासा किया गया है कि गाय जब खुश होती है तो कहीं अधिक पौष्टिक दूध देती है और उसके दूध में कैल्शियम का स्तर अधिक होता है।

अमेरिका के विस्कॉन्सिन-मेडिसन विश्वविद्यालय की शोधकर्ता लौरा हर्नांडीज़ के नेतृत्व में अनुसंधानकर्ताओं की टीम ने प्रसन्नता के अनुभव के लिए जिम्मेदार रसायन ‘सेरोटोनिन’ के सेवन का गायों के रक्त और दूध में कैल्शियम के स्तर से संबंधों की जांच की। 

भैंस के प्रसूतिकाल के रोग एवं उपचार

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भैंस के प्रसूतिकाल के रोग एवं उपचार

भैंस का प्रसूतिकाल प्रसव के बाद का वह समय है जिसमें मादा जननांग विशेष रूप से बच्चेदानी, शारीरिक व क्रियात्मक रूप से अपनी अगर्भित अवस्था में वापस आ जाती है। इसमें लगभग 45 दिन का समय लगता है। भैंस के प्रसूतिकाल के रोग  इस प्रकार है।

  • जनननलिका, योनि अथवा भगोष्ठों की चोट
  • जेर रूकना / फंसना
  • गर्भाशय में मवाद पड़ना (गर्भाशय शोथ/मेट्राइटिस)
  • दुग्ध ज्वर (मिल्क फीवर)

जनननलिका, योनि अथवा भगोष्ठों की चोट

पशु आहार के तत्व एवं उनके स्रोत

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पशु आहार के तत्व एवं उनके स्रोत

पशु आहार के तत्व

रासायनिक संरचना के अनुसार कार्बोहाइड्रेट, वसा, प्रोटीन, विटामिन तथा खनिज लवण भोजन के प्रमुख तत्व हैं। डेयरी पशु शाकाहारी होते हैं अत: ये सभी तत्व उन्हें पेड़ पौधों से, हरे चारे या सूखे चारे अथवा दाने  से प्राप्त होते हैं।

कार्बोहाइड्रेट - 

कार्बोहाइड्रेट मुख्यत: शरीर को ऊर्जा प्रदान करते हैं। इसकी मात्रा पशुओं के चारे में सबसे अधिक होती है । यह हरा चाराभूसा, कड़वी तथा सभी अनाजों से प्राप्त होते हैं।

प्रोटीन - 

भैंस में मुंह खुर रोग

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भैंस में मुंह खुर रोग

भैंस में मुंह खुर रोग
यह विषाणु जनित तीव्र संक्रमण से फैलने वाला रोग मुख्यत: विभाजित खुर वाले पशुओं में होता है भैंस में यह रोग उत्पादन को प्रभावित करता है एवं इस रोग से संक्रमित भैंस यदि गलघोटू या सर्रा जैसे रोग से संक्रमित हो जाये तो पशु की मृत्यु भी हो सकती है I यह रोग एक साथ एक से अधिक पशुओं को अपनी चपेट में कर सकता है I 

संक्रमण   

भैंस में गलघोटू रोग लक्षण एवं बचाव

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भैंस में गलघोटू रोग लक्षण एवं बचाव

भारत में भैंस के स्वास्थ्य को प्रभावित करने वाला प्रमुख जीवाणु रोग, गलघोटू है जिससे ग्रसित पशु की मृत्यु होने की सम्भावना अधिक होती है I यह रोग "पास्चुरेला मल्टोसीडा" नामक जीवाणु के संक्रमण से होता है I सामान्य रूप से यह जीवाणु श्वास तंत्र के उपरी भाग में मौजूद होता है एवं प्रतिकूल परिस्थितियों के दबाव में जैसे की मौसम परिवर्तन, वर्षा ऋतु, सर्द ऋतु , कुपोषण, लम्बी यात्रा, मुंह खुर रोग की महामारी एवं कार्य की अधिकता से पशु को संक्रमण में जकड लेता है I  यह रोग अति तीव्र एवं तीव्र दोनों का प्रकार संक्रमण पैदा कर सकता है I  

पशु पालन में कुछ प्रभावी घरेलु उपचार

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पशु पालन में कुछ प्रभावी घरेलु उपचार

कृषि के साथ साथ पशु पालन किसानों की आय का प्राचीनतम आय का स्रोत रहा है पशु पालन के विना किसानों का खेती को लाभकारी व्यवसाय बना पाना दिवा स्वप्न होगा 

पशु पालन के समय पशुओं में कुछ बीमारियाँ आती है जिनका घरेलु उपचार निम्न प्रकार से है

फैट बढ़ाने का फार्मूला

पशु चारे के साथ सो ग्राम कैल्शियम व सो ग्राम सरसो का तेल तथा चुटकी भर काला नमक डालकर सात दिन तक खिलाने से दूध में फेट बढ़ जाएगी

बकरी में लगने वाले रोगों की पहचान एवं उपचार

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बकरी में लगने वाले रोगों  की पहचान एवं उपचार

फड़किया रोग- इस रोग से ग्रसित बकरियां अचानक सुस्त तथा कमजोर हो जाती हैं। उनका पेट फूल जाता हैं। और वे बेचैन होकर उनके शरीर में कंपन होते हैं वह फड़कने लगती है अत: इस रोग का नाम फड़किया रखा गया हैं। उन्हें बुखार होता हैं तथा उनको पेटदर्द होने से वह पैर पटकती रहती हैं। धीरे-धीरे वह सुस्त होकर उसकी मृत्यु हो जाती हैं। यह रोग इतनी तेजी से फैलता हैं कि इलाज के लिए वक्त नहीं मिलता और कई बकरियों की मृत्यु हो जाती हैं। टीकाकरण करना यही इस रोग का इलाज हैं।

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