तरबूज और खरबूज की खेती में लगने वाले रोग

गर्मी बिन तरबूज और खरबूज के अधूरी सी लगाती है. तरबूज को जहाँ लोग उसके लाल रंग और मिठास के कारण तो वहीँ खरबूज को मिठास के आलावा उसके सुगन्ध के कारण भी पसन्द करते हैं और इसके बीजों की गिरी के बिना मिठाई सजी-सजाई नहीं लगती. खरबूज और तरबूज फलों के सेवन से लू दूर भागती हैं वहीँ इसके रस को नमक के साथ प्रयोग करने पर मुत्राशय में होने वाले रोगों से आराम मिलता है. इनकी 80 प्रतिशत खेती नदियों के किनारे होती है और इन्हें मुख्य रुप से उत्तर प्रदेश, पंजाब, राजस्थान, महाराष्ट्र, आन्ध्र प्रदेश, मध्य प्रदेश तथा बिहार में बड़े पैमाने पर उगाया जाता है. कहते हैं की हवा में अधिक नमी होने पर फल देरी से पकता हैं और फल पकते समय मौसम शुष्क रहे और पछुआ पवन बहे तो फलों की मिठास बढ़ जाती हैं. मैदानी क्षेत्रों में खरबूजा की बुआई 10-20 फरवरी के बीच में बो देते हैं और वह मई, जून, जुलाई तक इसके फसल की तुड़ाई होती है तथा पहाड़ी क्षेत्रों में अप्रैल से मई तक इसकी बोआई की जाती है. दक्षिण एवं मध्य भारत में इसकी बुआई अक्टूबर-नवम्बर में की जाती है. पके फलों की पहचान खरबूज और तरबूज जब पूरी तरह पक जायें तभी तुड़ाई करना चाहिए, 
पके फल के निम्नलिखित लक्षण पाये जाते हैं-
 खरबूज अन्तिम छोर से पकना प्रारम्भ करता है जिससे फल का रंग बदल जाता है और फल का छिलका मुलायम सा हो जाता है. तरबूज पकने पर जमीन से सटे हुए फल का रंग सफेद से मक्खनिया पीले रंग का हो जाता है.पके हुए खरबूज से कस्तुरी जैसी सुगन्ध आती है. पके हुए तरबूज को थपथपाने से धब-धब की आवाज आती है और फल को दबाने पर कुरमुरा एवं फटने जैसा अनुभव होता है.कभी-कभी दोनों फल पकने पर तने से पूर्णतया अलग हो जाते हैं.जब फल से जुड़ने वाला भाग पूर्णतया वृत्तीय घसाव को व्यक्त करने लगे, फल को पका हुआ समझना चाहिए. स्थानीय बाजारों में फसल को पहुचाने के लिए इसे फल पकाने पर तोड़ा जाना चाहिए. फल की तुड़ाई दिन की गर्मी बढ़ने से पहले करना चाहिए और फल को ठण्डे स्थान पर रखना चाहिए. गर्मी के दिनों में सामान्य तापमान पर खरबूजे को 2-3 दिनों तक तो तरबूजे को 10 दिनों तक आसानी से रखा जा सकता है. 

खरबूज और तरबूज में लगने वाले प्रमुख रोग एवं कीट प्रमुख रोग 
चूर्णी फफूँद (चूर्णील आसिता)- 
इस रोग के प्रथम लक्षण पत्तियों और तनों की सतह पर सफेद या धुंधले धुसर रंग के धब्बों के रुप में दिखाई देता है. कुछ दिनों के बाद ये धब्बे चूर्णयुक्त हो जाते हैं. सफेद चूर्णित पदार्थ अन्त में समूचे पौधे की सतह को ढँक लेता है. उग्र आक्रमण के कारण पौधे से पत्तियाँ गिर जाती है. इसके कारण फलों का आकार छोटा रह जाता है. 
रोकथाम 
इसके रोकथाम के लिए रोगी पौधों को खेत में इकट्ठा करके जला देना चाहिए. बोने के लिए रोगरोधी किस्म का चयन करना चाहिए. कैलिक्सीन 1 मि.ली. दवा एक लीटर पानी में घोल बनाकर सात दिन के अन्तराल पर या टोपाज 1 मि.ली. दवा 4 ली. पानी में घोलकर 1-2 छिड़काव 10 दिनके अन्तराल पर करें. 

मृदुरोमिल आसिता- 
यह रोग वर्षा ऋतु के उपरान्त जब तापमान 25 डिग्री से. उपर हो, तब तेजी से फैलता है. उत्तरी भारत में इस रोग का प्रकोप अधिक है. इस रोग से पत्तियों पर कोणीय धब्बे बनते हैं. ये पत्तियों के ऊपरी पृष्ठ पर पीले रंग के होते हैं. अधिक आर्द्रता होने पर पत्तियों के निचली सतह पर मृदुरोमिल कवक की वृध्दि दिखाई देती है. 

रोकथाम 
इसकी रोकथाम के लिए बीज का शोधन मेटलएक्सिल नाम कवकनाशी से 3 ग्राम प्रति किलोग्राम बीज की दर से उपचारित करें. खड़ी फसल में मैंकोजेब 2.5 ग्राम/लीटर पानी में घोल कर छिड़काव करें. पूरी तरह रोगग्रस्त लताओं को निकाल कर जला देना चाहिए. रोग रहित बीज उत्पादन के लिए केवल स्वस्थ्य फल से ही बीज लें. 

खीरा मोजैक वायरस- 

इस रोग का फैलाव, रस द्रव्य रोगी बीज का प्रयोग तथा एफीड कीट द्वारा होता है. इससे खरबूजे के पौधों की नई पत्तियों में छोटे, हल्के पीले धब्बों का विकास सामान्यत: शिराओं से शुरु होता है. पत्तियों में सिकुड़न शुरु हो जाती है. पौधे विकृत तथा छोटे रह जाते हैं. हल्के, पीले चित्तीदार लक्षण फलों पर भी उत्पन्न हो जाते हैं. 

रोकथाम 
इसकी रोकथाम के लिए विषाणु मुक्त बीज का प्रयोग करें तथा रोगी पौधों को खेत से निकालकर नष्ट कर दें. विषाणु वाहक कीट के नियंत्रण के लिए डाईमेथोएट 1 मि.ली. प्रति लीटर पानी में घोल बनाकर 10 दिन के अन्तराल पर छिड़काव करें. फल लगने के बाद रासायनिक दवा का प्रयोग नहीं करते हैं. 

तरबूज वड नेक्रोसिस विषाण–
 यह रोग थ्रिप्स कीट द्वारा फैलता है. रोग ग्रस्त पौधों के ऊपरी भाग में पत्तियों तथा डंठलों पर छोटे-छोटे धब्बे बनते हैं जो कि से ऊपर से सुखने लगते हैं. इसके अलावा पत्तियों पर काले तथा फलों पर छल्लेदार धब्बे बनते हैं. 

रोकथाम 
इस रोग से बचाव हेतु रोग रोधी किस्म की बुवाई करें तथा रोगी पौधों को उखाड़ कर जमीन में गाढ़ दें. क्योंकि यह रोग थ्रिप्स से फैलती है जो कि पत्तियों के निचली सतह पर बैठे रहते हैं. जब ये कीडे शिशु अवस्था में हल्के पीले रंग के हो तब कानफिडोर नामक अर्न्तवाही दवा की 3 मि.ली. मात्रा 10 लीटर पानी में घोल कर छिड़कते है. दवा छिड़काव के 8-10 दिन बाद ही फलों की तुड़ाई करते हैं. 
प्रमुख कीट 
कुम्हड़ा का लाल कीट– 
यह कीड़े जनवरी-मार्च तक बहुत सक्रिय होते हैं. अक्टूबर तक इस कीड़े का प्रकोप रहता है. पौधे जमने के तुरन्त बाद इस कीड़ों से ज्यादा नुकसान होता है. जिससे पौध सुख जाता है. प्रौढ़ कीट पत्तियों का अधिक नुकसान पहुँचाती है. तथा नए कीट पौधों की जड़ों को नुकसान पहुँचाते हैं जिससे पुराने एवं बड़े पौधे पीले पड़ जाते है और उनकी बढ़वार रुक जाती है. यह कीड़ा नवम्बर-फरवरी की अवधि को छोड़कर पूरे साल सक्रिय रहता है. 

रोकथाम 
सुबह के समय प्रौढ़ अधिक सक्रिय नहीं होता है. अत: प्रौढ़ को हाथ से पकड़कर मार देना चाहिए. सुबह ओस पड़ने के समय राख का बुरकाब करने से भी प्रौढ़ पौधा पर नहीं बैठता जिससे नुकसान कम होता है. यदि इससे भी नियंत्रित नहीं हो तो मैलाथियान चूर्ण (5 प्रतिशत) या कार्बारिल (5 प्रतिशत) के 25 किलोग्राम चूर्ण प्रति हे.की दर से राख में मिलाकर सुबह पौधों पर बुरकना चाहिए या मैलाथियान (50 ई.सी.) 2.5 मिली/लीटर या कार्बारिल (50 प्रतिशत घुलनशील चूर्ण) 2 ग्राम/ लीटर पानी का घोल बनाकर 15 दिन के अन्तराल पर छिड़काव करें. 

फल मक्खी- 
इस कीट का लार्वा फलों को हानि पहुँचाता है. फूल आने से पहले भूमि से सटे तने पर अण्डा देने से सड़न शुरु हो जाती है तथा पौधा सूख जाता है. यह कीट फल के जिस भाग पर छेद करके अण्डा देता है वहीँ से वह ख़राब होने लगता है. 

रोकथाम 
अंडे देने वाली मक्खी की रोकथाम करने के लिए खेत में प्रकाश प्रपंच या फेरो मोन ट्रैप को लगाना चाहिए या 1% मिथाइल इंजीनॉल या सिनट्रोनेला तेल या एसिटिक अम्ल या लेक्टिक असिड का घोल बनाकर रखा जाता है. अगर मक्खी का प्रकोप ज्यादा हो तो वाहन पर कार्बारिल 10 प्रतिशत पाउडर खेत में मिलाए. गर्मीं के दिनों में हल से गहरी जुताई कर भूमि के अन्दर मक्खी की सुप्त अवस्थाओं को नष्ट करना चाहिए.

organic farming: 
जैविक खेती: