मूंग और उड़द के प्रमुख रोग और उनकी रोकथाम

दलहनी फसलो में उड़द एंव मूंग खरीफ की मुख्य फसल है। कम अवधि की फसल होने के कराण यह अंतवर्तीय व बहुफसलीय पध्दति के लिए भी उपयुक्त है। सिंचाई की सुविधा होने पर इसे ग्रीष्म ऋतु में भी उगाया जाता है। उड़द एंव मूंग की औसत उपज बहुत कम है। अतः उचित कीट एंव रोग प्रबंधन तकनीक अपनाकर उड़द एंव मूंग की उत्पादकता को बढाया जा सकता है।. देश में मूंग और उड़द को प्रोटीन का सबसे अच्छा स्त्रोत माना जाता है. इसके साथ ही खनिज लवण समेत कई  विटामिन भी पाए जाते हैं. इन दालों का सेवन  कई बीमारियों से बचाकर रखता है. ऐसे में किसानों को इनकी खेती अच्छी देखभाल के साथ करना चाहिए. अगर इन रोगों की समय रहते रोकथाम न की जाए, तो किसानों को बाजार में इनका सही मूल्य नहीं मिल पाएगा. ऐसे में किसानों के लिए मूंग और उड़द के रोगों की पहचान और उनकी रोकथाम की जानकारी ज़रूर होनी चाहिए.

 कई बार मूंग और उड़द की फसल कई तरह के रोगों की चपेट में आ जाती है, जिसका फसल पर बहुत बुरा प्रभाव पड़ता है । ऐसे में इन रोगों से फसल को समय रहते बचा लेना चाहिए ।

 

पीला मोजेक रोग

नियंत्रण

  • रोग प्रतिरोधक किस्म जैसे मूंग की टी. जे. एम.-3, टी. एम.-7 तथा उड़द की टी. यू. -94-2, पी. यू.-30, पी. डी. यू. -1 आदि की बुवाई करें।
  • यह रोग सफेद मक्खी द्वारा फैलता है। अतः सफेद मक्खी नियंत्रण के लिए थायोमिथोक्साम 70 डब्ल्यू. एस. (क्रुजर) कीटनाशक दवा 3 ग्राम प्रति किलोग्राम बीज की दर से बीज उपचारित कर बुवाई करें।
  • बुवाई के 10 और 45 दिन की अवस्था पर इमिडाक्लोप्रिड 100-125 मि. ली. दवा साथ मे साडा वीर फंगस फाईटर 300 से 500 ग्राम प्रति हे. की दर छिड़काव करें।

 

भभूतिया रोग

इस रोग को बुकनी रोग के नाम से भी जाना जाता है। यह रोग फसल की प्रारंम्भिक अवस्था (10-15 दिन) से फल्लीयाॅ लगने तक कभी भी देखा जा सकता है। यदि रोग फसल की प्रारंम्भिक अपस्था पर आता है, तब रोग ग्रसित पौधे पूरी तरह सूख जाते हैं। इस रोग मे पत्तियों, शाखाओं एंव फल्लियों पर सफेद चूर्ण सा दिखाई देता है।

नियत्रण:

  • रोग प्रतिरोधक किस्म की बुवाई करें। जैसे उड़द की एल.बी.जी.-17
  • घुलनशील गधंक 3 ग्राम प्रति लीटर पानी या कार्बेन्डाजिम 1 ग्राम प्रति लीटर पानी या प्रति एकड़ 200 ग्राम की दर से साडावीर फंगस फाईटर छिड़काव करें।

 

मेक्रोफोमिना ब्लाइट रोग

उड़द, मुॅग में यह रोग मेक्रोफोमिना फेजियोलिना नामक फंफूद से होता है। इस फंफूद से पौध सड़न भी होता है । प्रारम्भ में भूरे रंग के धब्बे पत्तियों के निचले भाग में बनते है, जो बाद में ऊपर भी दिखाई देने लगते है। अनुकूल वातावरण जैसे अत्यधिक नमी और बरसते पानी में धब्बे आकार में बढ़ते जाते हैं तथा दूसरे पौधो पर भी फैलते हैं। फसल धब्बों से इतनी बुरी तरह रोग ग्रस्त हो जाती है, कि ऐसा लगता है मानो सारे पौधे झुलस गये हो।

नियंत्रण:

    इसके बचाब के लिये बुबाई के समय 80% सल्फ़र3किलो एकड़ और साडावीर 1 से 2 किलो एकड़ लगाना श्रेष्ठ होता है।
  • इसके नियत्रं ण के लिए कार्बन्डाजिम 1 ग्राम दवा प्रति लीटर पानी और 2 ग्राम साडावीर फंगस फ़ाइटर से की दर से छिड़काव करें
  • सरकोस्पोरा पत्र बुंदकी रोग

    यह मूंग और उड़द की फसल में लगने वाला प्रमुख रोग है. इससे फसल की  पैदावार में काफी नुकसान होता है. इस रोग में पत्तियों पर भूरे गहरे रंग के धब्बे दिखाई देते हैं.

    रोकथाम

    इस रोग से फसल को बचाने के लिए बुवाई से पहले कैप्टन या थिरम कवकनाशी से या साडावीर फंगस फाईटर से बीज को उपचारित कर लेना चाहिए.
    बुबाई में साडावीर 1 से 2किलो एकड़ का प्रयोग करने से इस बीमारी के आने की संभावना समाप्त हो जाती है।

  • पीला चितेरी रोग

    इस रोग को विषाणु जनित माना जाता है. इस रोग में पत्तियों पर पीले धब्बे पड़ जाते हैं, जो तेजी से फैलने लगते हैं. इसमें पत्तियां पूरी तरह से पीली दिखाई देती हैं.

    रोकथाम

    मूंग और उड़द की फसल में यह रोग सफेद मक्खी द्वारा फैलता है.  इसकी रोकथाम के लिए खेत में आवश्यकतानुसार आक्सीडेमेटान मेथाइल प्रतिशत या डायमेथोएट को पानी में घोलकर छिड़क देना चाहिए.

    झुर्रीदार पत्ती रोग

    यह एक मुख्य विषाणु रोग है, जो अधिकतर उड़द की फसल में लगता है. इस रोग में पत्तियां अधिक मोटी और खुरदरी दिखाई देती हैं.  

    रोकथाम

    फसल को बचाने के लिए रोगग्रस्त पौधों को उखाड़कर जला देना चाहिए. बता दें कि फसल में कीटनाशी दवा का छिड़काव करने से इस रोग का खतरा कम हो जाता है.

    चूर्णी फफूंद

    यह रोग गर्म या शुष्क वातावरण में ज्यादा फैलता है. इसमें निचली पत्तियों पर गहरे धब्बे पड़ जाते हैं. इसके बाद छोटे-छोटे सफेद बिंदु दिखाई देने लगते हैं, जो कि एक बड़ा सफेद धब्बा बन जाते हैं.

     

    रोकथाम

    फसल को बचाने के लिए घुलनशील गंधक को छिड़कना चाहिए. इसके अलावा आवश्यकतानुसार कार्बेन्डाजिम या केराथेन कवकनाशी या 200 ग्राम प्रति एकड़ साडावीर फंगस फ़ाइटर का पानी में घोलकर छिड़क देना चाहिए.

    मोजेक रोग

    इस रोग में पत्तियां सिकुड़ने लगती हैं. इसके साथ ही पत्तियों पर फफोले पड़ जाते हैं. इस रोग में पौधों का विकास नहीं हो पाता है.

    रोकथाम

    फसल को बचाने के लिए केवल प्रमाणित बीज की बुवाई करें. इसके साथ ही रोगी पौधों को उखाड़कर नष्ट कर दें. फसल में कीटनाशी दवा का छिड़काव कर सकते हैं फसल में साडा वीर 4G और साडावीर फंगस फ़ाइटर का छिड़काव करें.

    पर्ण संकुचन

    यह रोग मूंग और उड़द की उपज को कम कर देता है. इसको पीली चितेरी रोग के बाद दूसरा महत्वपूर्ण विषाणु रोग माना जाता है. इस रोग में पत्तियों का विकास अच्छी तरह नहीं हो पाता है. इस रोग के लगने से पत्तियों को पोषक तत्व नहीं मिल पाते हैं.

    रोकथाम

    इस रोग से फसल को बचाने के लिए बीजों को इमिडाक्रोपिरिड से 5 ग्राम उपचारित कर लेना चाहिए. इसके अलावा बुबाई के 15 दिन बाद कीटनाशी दवा का छिड़काव कर देना चाहिए. इस तरह रोग का प्रकोप कम हो जाता है.

organic farming: 
जैविक खेती: