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तुलसी की व्यावसायिक खेती

तुलसी एक दैवीय और पवित्र पौधा माना जाता है तुलसी का उपयोग भारत मे व्यापक रूप से पूजा में किया जाता है। भारतीय संस्कृति में तुलसी के पौधे का धार्मिक एवं औषधीय महत्व है। इसके उपयोग से त्वचा और बालों में सुधार होता हैं। यह रक्त शर्करा के स्तर को भी कम करती है और इसका चू्र्ण मुँह के छालों के लिए प्रयोग किया जाता है। इसकी पत्तियों के रस को बुखार, ब्रोकाइटिस, खांसी, पाचन संबंधी शिकायतों में देने से राहत मिलती है। कान के दर्द में भी तुलसी के तेल का उपयोग किया जाता है। यह मलेरिया और डेंगू बुखार को रोकने के लिए एक निरोधक के रूप में काम करता है। लोशन, शैम्पू, साबुन और इत्र में कास्मेटिक उघोग में तुलसी तेल का उपयोग किया जाता है। कुछ त्वचा के मलहम और मुँहासे के उपचार में भी इसका प्रयोग किया है। मधुमेह, मोटापा और तंत्रिका विकार के इलाज में इसका उपयोग किया जाता है। यह पेट में ऐंठन, गुर्दे की स्थिति और रक्त परिसंचरण को बढ़ावा देने में उपयोगी होता है। इसके बीज मूत्र की समस्याओं के इलाज में इस्तेमाल किये जाते है।
तुलसी की जातियां
ओसिमस बेसिलीकम, ओसिमस ग्रेटिसिमम, ओसिमस सेंक्टम, ओसिसम मिनीमम, ओसिमम अमेरिकेनम।
भौगोलिक विवरण
तुलसी भारत के सभी राज्यों में पाया जाने वाला पौधा है। तुलसी का पौधा 1800 मीटर की ऊँचाई तक पाया जाता है। यह भारत में उत्तराखण्ड, जम्मू कश्मीर, उत्तर प्रदेश एवं पश्चिमी बंगाल राज्यों में इसकी व्यावसायिक खेती की जाती है।
इसकी विभिन्न जातियों में रंगों में अंतर पाया जाता है। तुसली का पौधा को चार कोड़ीय, शुरूआती अवस्था में कोमल एवं बाद में कठोर हो जाता है। पत्तियाँ, सरल, व्यवस्थित, अण्डाकार एवं रोमयुक्त होती है। तुलसी के फूल बैंगनी, पीले अथवा हल्के गुलाबी रंग के होते हैं।
उन्नतशील प्रजातियाँ
आर. आर. एल. ओ. सी., यह तुलसी की एक विशेष जाति है। 150 से 160 सेमी. ऊँचे, त्रिकोणीय तने वाले, रोयेंदार, बहुशाखीय घने, लम्बे पत्तों युक्त और छोटे-छोटे हल्के पीले फूल चिरस्थायी होते हैं। इस किस्म में यूजीनॉल नाम एक सुगन्धित पदार्थ पाया जाता है। इसके तेल में लौंग के तेल के सभी गुण विद्यमान है। इसी कारण इसे लौंग की सुगंध वाली तुलसी भी कहते है। इस किस्म का तेल लौंग के तेल का एक विकल्प है। जिसका उपयोग सुरस, सुगंध, और औषधि उद्योग के अलावा खाद्य पदार्थों को सुगंधित करने एवं दंत चिकित्सा एवं दंत मंजन आदि में भी किया जाता है।
प्रवर्धन
तुलसी का प्रसारण दो विधियों से किया जाता है।
बीज द्वारा: तुलसी का प्रसारण बड़े पैमाने पर बीज द्वारा ही किया जाता है। सितम्बर-अक्टूबर में तुलसी में फूल आते हैं और नवम्बर से दिसम्बर माह में फल पक जाते हैं। एक फल में औसतन 18 बीज पाये जाते हैं, लेकिन इसकी अंकुरण काफी कम होती है। बीजों में 8-12 सप्ताह की सुषुप्तावस्था होती है। तुलसी के पके फलों को एकत्रित करके बीज को निकालकर भली-भाँति सुखा लेना चाहिए फिर उन्हें रंगीन बोतलों में भरकर 8-12 सप्ताह तक नमीरहित स्थान में रखना चाहिए। नर्सरी की भूमि की अच्छी तैयारी करनी चाहिये, 5 गुणा 1 मीटर आकार 8-10 क्यारियाँ एक हेक्टेयर की पौध तैयार करने के लिए पर्याप्त होती है। क्यारियों को जमीन से 75 सेमी. ऊँचा बनाना चाहिए, दो क्यारियों के बीच 30 सेमी. जगह खाली रखनी चाहिए जिससे इसमें खरपतवार निकाले या पौध संरक्षण कार्य भलीभाँति किया जा सके। तैयार क्यारियों में 15 सेमी. की दूरी पर हल्की-हल्की कतारें बना कर उनमें बीज बोना चाहिये, एक कतार में लगभग 100 बीज बोये जाते है। एक हेक्टेयर क्षेत्र की पौध तैयार करने के लिए 200-300 ग्राम बीज पर्याप्त होता है। तुलसी का बीज बारीक होता है। अत: उचित दूरी रखने के लिए उसमें बालू रेत मिला लेते है। बोआई के पश्चात कतारों को धीरे-धीरे मिट्टी से ढक देना चाहिये, पूरी क्यारी को सूखी घास की परत से मल्चिंग कर देना चाहिये तदोपरान्त सुबह-शाम हजारे से पानी देना चाहिये। बीज बोने के 8-10 बाद अंकुरण प्रारम्भ हो जाता है जो 12 दिन में पूरा हो जाता हे। जमाव के बाद घास की परत को सावधानी पुर्वक हटा देना चाहिए। आवश्यकतानुसार सिंचाई, निराई-गुड़ाई करना चाहिये। पौधों की लम्बाई जब 10-15 सेमी. होने पर इन्हें रोपाई के लिए प्रयोग किया जाता है।
शाखाओं द्वारा : तुलसी का प्रसारण शाखाओं को काटकर भी किया जा सकता है। 10-15 ऐसी लम्बी शाखायें काटकर उन्हें छाया में रखकर सुबह-शाम हजारे से पानी देते रहें। एक महीने में इन शाखाओं से जड़ें विकसित हो जाती हैं। और पत्तियाँ विकसित होने लगती हैं। जब शाखायें 5-10 सेमी की हो जायें तो इसके बाद इनकी रोपाई की जा सकती है।
पौध रोपाई
जब पौधे तैयार हो जायें तब उन्हें 45 गुणा 45 सेमी की दूरी पर उनकी रोपाई कर दें। रोपाई का सर्वोंत्तम समय जुलाई का प्रथम सप्ताह है। रोपाई के उपरान्त हल्की सिंचाई कर देनी चाहिए। रोपाई के लिए स्वस्थ पौधे ही चुनें। आर.आर.एल.ओ.सी. 12 नामक किस्म में रोपाई 50 गुणा 50 सेमी की दूरी पर करनी चाहिए, जबकि आर.आर.एल.ओ.सी. 14 नामक किस्म में यह दूरी 50 गुणा 50 सेमी. रखनी चाहिए।
खाद एवं उर्वरक
पौधों की अच्छी वृद्धि एवं तेल की अधिक उपज लेने के लिए यह आवश्यक है कि भूमि में संतुलित मात्रा में खाद एवं उर्वरक का उपयोग करना चाहिए। 200-250 क्विंटल गोबर की खाद या कम्पोस्ट खाद प्रथम जुताई से पूर्व खेत में समान रूप से बखेर देनी चाहिए। बुबाई के दौरान ५० किलो गोबर की खाद में 1 किलो ट्राईकोडरमा मिला कर बुबाई करनी चाहिए 

रासायनिक दशा में  अन्तिम जुताई के समय 100 किलोग्राम यूरिया, 500 किलोग्राम सुपर फॉस्फेट और 125 किलोग्राम म्यूरेट ऑफ पोटाश प्रति हेक्टेयर की दर से मिला देना चाहिए। रोपाई के 20 दिन बाद और पहली, दूसरी, व तीसरी कटाई के तुरन्त बाद 50 किलोग्राम यूरिया प्रत्येक बार फसल में समान रूप से देनी चाहिए। लेकिन यह ध्यान रखना अति आवश्यक है कि यूरिया पत्तियों पर न पड़े और खेत में प्र्याप्त नमी होनी चाहिए।
सिंचाई
रोपण के तुरन्त बाद सिंचाई करनी चाहिए। फिर प्रति सप्ताह या आवश्यकतानुसार सिंचाई करनी चाहिए। ग्रीष्म ऋतु में 12-15 दिन के अन्तराल पर सिंचाई करें। पहली कटाई के तुरन्त बाद सिंचाई अवश्य करनी चाहिए, परन्तु कटाई के 10 दिन पहले सिंचाई बंद कर देनी चाहिए।
निराई-गुड़ाई एवं खरपतवार नियन्त्रण
तुलसी की फसल में विभिन्न प्रकार के खरपतवार उग आते हैं। जो फसल से नमी, पोषक तत्व, धूप स्थान आदि के लिए प्रतिस्पद्र्धा करते हैं। साथ ही उपज में भी भारी कमी हो जाती है। अत: रोपाई 15-20 दिन बाद और 50 दिन बाद खरपतवार निराई-गुड़ाई करनी चाहिए, यदि फसल की एक ही कटाई लेनी हो तो एक या दो बार और यदि तीन बार कटाई लेनी हो तो कटाई के लिए 6-10 दिन बाद खरपतवार निकालना चाहिए।
फसल की कटाई एवं प्रबंधन
तुलसी की कटाई किस समय की जाए, यह एक अत्यन्त महत्वपूर्ण प्रश्न है। क्योंकि तुलसी के पौधों की कटाई का प्रभाव तेल की मात्रा पर पड़ता है। अत: समय पर कटाई करना अति आवश्यक है। जब पौधों की पत्तियों का रंग हरा होना शुरू हो जाए तभी कटाई करनी चाहिए। कटाई जमीन की सतह से 15-20 मी ऊँचाई पर की जानी चाहिए जिससे शीघ्र ही नयी शाखाएं निकलनी शुरू हो जायें। कटाई का कार्य दराँती से किया जाना चाहिए। कटाई के समय यह ध्यान रखना चाहिए पत्तियाँ तने पर छोडऩी भी पड़े तो उन्हें रहने दें। तेल और यूनीनोल की मात्रा फूल आने के मात्रा कम हो जाती है। अत: जैसे ही फूल आने शुरू हो, प्रथम कटाई शुरू कर देनी चाहिए। आर.आर.एल.ओ.पी. 14 नामक किस्म की कटाई तीन बार ली जाती हे। जून सितम्बर और नवम्बर में जैसे ही पौधों पर फूल आयें, पौधे को जमीन से 30 सेमी. ऊपर से छोड़कर काटना चाहिये।
आसवन
आसवन विधि द्वारा तुलसी से तेल निकाला जाता है, लेकिन बड़े पैमाने पर बड़े टैंकों के माध्यम से तेल निकाला जाता है। आसवन ताजी अवस्था में ही करना चाहिए। अन्यथा तेल की मात्रा एवं गुणवत्ता दोनों में कमी आने की सम्भावना बनी रहती है। आर.आर.एल.ओ.सी. 14 नामक किस्म की कटी हुई फसल को आवन यंत्रों में भरकर उसे 3.50 घण्टे वाष्प देने से 0.5-0.6 प्रतिशत तेल निकल आता है। जिसमें 80-85 प्रतिषत यूजीनोल होता है। आर.आर.एल.ओ.सी. 12 नामक किस्म की कटी हुई फसल को 2-3 घण्टे वाष्प देने से 165-170 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर तेल निकलता है। तेल की हरी फसल के वजन के 0.45 प्रतिशत य इससे अधिक प्राप्त हो सकती है। इसमें 75-80 प्रतिशत मिथाइल सिनामेट होता है। उत्पादन प्रथम वर्ष में लगभग 400 क्विंटल शाकीय उत्पादन होता है। और बाद के वर्षों में शाकीय 700 क्विंटल प्रति हेक्टेयर होते है। आसवन के पश्चात् बची हुई पत्तियाँ खाद बनाने के काम आ सकती है। इससे हार्डबोर्ड बनाये जाते है, इसे सुखाकर ईधन के रूप में भी काम में लाया जा सकता है।

organic farming: 
जैविक खेती: