कुदरती खेती के मूल सिद्धान्त

कुदरती खेती के कुछ मूल सिद्धान्त हैं। मिट्टी में जीवाणुओं की मात्रा, भूमि की उत्पादकता का सब से महत्वपूर्ण अंग है। ये जीवाणु मिट्टी, हवा और कृषि-अवशेषों/बायोमास में प्राकृतिक रूप से उपलब्ध पोषक तत्त्वों को पौधों के प्रयोग लायक बनाते हैं। इस लिये मुख्यधारा के कृषि-वैज्ञानिक भी मिट्टी में जीवाणुओं की घटती संख्या से चिन्तित है। कीटनाशक फसल के लिये हानिकारक कीटों के साथ-साथ मित्र जीवों को भी मारते हैं। रासायनिक खादें भी मिट्टी में जीवाणओं के पनपने में बाधा पैदा करती हैं इसलिये सब से पहला काम है मिट्टी में जीवाणुओं की संख्या बढ़ाना। इस के लिए जरूरी है कि कीटनाशकों तथा अन्य रसायनों का प्रयोग न किया जाए।

 

दूसरा मूल सिद्धान्त यह है कि बिक्री और खाने में प्रयोग होने वाली सामग्री को छोड़ कर खेत में पैदा होने वाली किसी भी सामग्री/बायोमास को छूत की बीमारी वाले पौधों को छोड़ कर), खरपतवार को भी, खेत से बाहर नहीं जाने देना चाहिए। जलाना तो बिल्कुल भी नहीं चाहिये। उसका वहीं पर भूमि को ढ़कने के लिये (इसे आच्छादन या मल्चिंग करना कहते हैं) और खाद के रूप में प्रयोग किया जाना चाहिए। शुरू में पड़ौसी किसान से कृषिअवशेष और गौशाला से गोबर लिया जा सकता है। बाद में मिट्टी में जीवाणु बढ़ने और अपने ही खेत में कृषि-अवशेष बढ़ने से, बाहरी सामग्री और गोबर की भी जरूरत नहीं पड़ती।

खेत में अगर बायोमास की 2-4 इंच की परत बन जाये तो बहुत अच्छा है। यह परत कई काम करती है। वाष्पीकरण कम कर के पानी बचाती है, बारिश और तेज हवा/आंधी में मिट्टी को बचाती है। खरपतवार की रोकथाम करती है। तापमान नियंत्रित कर के ज्यादा गर्मी-सर्दी में भी मिट्टी के जीवाणुओं के लिये उपयुक्त माहौल बनाती है और उन का भोजन बनती है। और आखिर में गल-सड़ कर मिट्टी की उपजाऊ शक्ति बढ़ाती है। जमीन ढकने के लिये बायोमास के छोटे टुकड़े कर के डालना बेहतर रहता है। बायोमास के तौर पर चौड़े पत्ते और मोटी टहनी का प्रयोग नहीं करना चाहिये।

तीसरा सिद्धान्त यह है कि खेत में जैव-विविधता होनी चाहिये, यानी कि केवल एक किस्म की फसल न बो कर खेत में एक ही समय पर कई किस्म की फसल बोनी चाहियें। जैव-विवधता या मिश्रित खेती मिट्टी की उत्पादकता बढ़ाने और कीटों का नियन्त्रण करने, दोनों में सहायक सिद्ध होती है। जहाँ तक सम्भव हो सके हर खेत में फली वाली या दलहनी (दो दाने वाली) एवं कपास, गेहूँ, या चावल जैसी एक दाने वाली फसलों को मिला कर बोएँ। दलहनी या फली वाली फसलें नाइट्रोजन की पूर्ति में सहायक होती हैं। एक ही फसल यानी कि कपास इत्यादि की भी एक ही किस्म को न बो कर भिन्न-भिन्न किस्मों का प्रयोग करना चाहिए। फसल-चक्र में भी समय-समय पर बदलाव करना चाहिये। एक ही तरह की फसल बार-बार लेने से मिट्टी से कुछ तत्त्व खत्म हो जाते हैं एवं कुछ विशेष कीटों और खरपतवारों को लगातार पनपने का मौका मिलता है। एक-दो फसल अपनाने के कारण ही आज किसान भी अपने खेत में हो सकने वाली चीज़ भी बाजार से खरीद कर खा रहा है, जिस के चलते किसान परिवार को भी स्वस्थ्य भोजन नहीं मिलता।

चौथा, कोशिश यह रहे कि भूमि नंगी न रहे। इस के लिये उस में विभिन्न तरह की, लम्बी, चोटी, लेटने वाली और अलग-अलग समय पर बोई और काटे जाने वाली फसलें ली जायें। खेत में लगातार फसल बने रहने से सूरज की रोशनी, जो धरती पर भोजन और ऊर्जा का असली स्रोत है, और जिसे मुख्य तौर से पौधे ही पकड़ पाते हैं, का पूरा प्रयोग हो पाता है। इस के साथ ही इस से जमीन में नमी बनी रहती है और मिट्टी का तापमान नियंत्रित रहता है जिस से मिट्टी के जीवाणुओं को लगातार उपयुक्त वातावरण मिलता है, वरना वे ज्यादा गर्मी/सर्दी में मर जाते हैं।

पाँचवाँ, खेत में प्रति एकड़ कम से कम 5-7 भिन्न-भिन्न प्रकार के पेड़ जरूर होने चाहियें। खेत के बीच के पेड़ों को 7-8 फुट से ऊपर न जाने दें। उन की छटाई करते रहें। उन के नीचे ऐसी फसलें उगानी चाहियें जो कम धूप में भी उगती हैं। (ऐसी फसलों को बोना जैव-विवधता बनाने में भी सहायक होगा।) खेत के किनारों पर ऊँचे पेड़ हो सकते हैं। खेत में पेड़ होने से मिट्टी की पानी सोखने की क्षमता बढ़ती है, मिट्टी का क्षरण नहीं होता। सब से बड़ा फायदा यह है कि पेड़ की गहरी जड़े धरती की निचली परतों से आवश्यक तत्त्व लेती हैं और टूटे हुए पत्तों, फल-फूल के माध्यम से ये तत्त्व मिट्टी में मिल कर अन्य फसलों को मिल जाते हैं। उन पर बैठने वाले पक्षी कीट-नियन्त्रण में भी सहायक सिद्ध होते हैं। इस लिये केत में पक्षियों के बैठने के लिए “टी” आकार की व्यवस्था करना भी लाभदायक रहता है। (जानकार यह बताते हैं कि ज्यादातर पक्षी शाकाहारी नहीं होते। वे अन्न तभी खाते हैं जब उन्हें कीट खाने को न मिलें। इसलिए जहां कीट-नाशकों का प्रयोग होता है, वहाँ कीट न होने से ही पक्षी अन्न खाते हैं वरना तो ज्यादातर पक्षी कीट खाना पसन्द करते हैं।)

छठा तत्त्व है खेत में अधिक से अधिक बरसात का पानी इकट्ठा करना। अगर खेत से पानी बह कर बाहर जाता है तो उस के साथ उपजाऊ मिट्टी भी बह जाती है। इसलिये पानी बचाने से मिट्टी भी बचती है। दूसरी ओर जैस-जैसे मिट्टी में जीवाणुओं की संख्या बढ़ती है, मिट्टी की पानी सोखने की क्षमता भी बढ़ती है। यानी मिट्टी बचाने से पानी भी बचता है। इस के अलावा पानी बचाने के लिये बरसात से पहले मेढ़ों/डोलों की सम्भाल होनी चाहिये। खेत में ढलान वाले कोने में छोटे तालाबों और गड्ढ़ों का सहारा भी लिया जा सकता है।

सातवाँ, किसी भी फसल को, धान और गन्ने जैसी फसल को भी, पानी की नहीं बल्कि नमी की जरूरत होती है। बैड बना कर बीज बोने और नालियों से पानी देने से, या बिना बैड के भी बदल-बदल कर एक नाली छोड़ कर पानी देने से पानी की खपत काफी घट जाती है और जड़ें ज्यादा फैलती हैं। कम पानी वाली जगह या खराब पानी वाली जगह पर यह काफी फायदेमन्द रहता है। बैड ऐसा हो (3-4 फुट का) कि सब जगह नमीं भी पहुँच जाये और बाहर बैठ कर पूरे बैड से खरपतवार भी निकाला जा सके।

 
बेड पर खेतीआठवाँ, अगर बीजों पर कम्पनियों या बाजार का कब्जा रहा तो किसान स्वतंत्र हो ही नहीं सकता। इसलिये अपना बीज बनाना कुदरती कृषि का आधार है। अपने बाप-दादा के जमाने के अच्छे बीजों को ढूंढ कर इकट्ठा करें और उन्हें बढ़ाएँ, सुधारें और बाँटे, स्थानीय परन्तु सुधरे हुये बीजों और पशुओं की देसी लेकिन अच्छी नस्ल का प्रयोग किया जाना चाहिये।

बीजों के अंकुरण की जाँच और बोने से पहले उन का उपचार भी जरूरी है। बीज बोने के समय का बी कीट-नियन्त्रण और पैदावार में योगदान पाया गया है। बेमौसमी फसलें लेना ठीक नहीं है।

नौवाँ, बीजों के बीच की परस्पर दूरी कुदरती खेती में प्रचलित खेती के मुकाबले लगभग सवा से डेढ़ गुणा ज्यादा होती है। धान 1 फुट और ईंख 8-9 फुट (चारों तरफ) की दूरी पर भी बोया जा रहा है। इस से जड़ों को फैलने का पूरा मौका मिलता है। बीज कम लगता है परन्तु उत्पादन ज्यादा होता है।

दसवाँ, खरपतवार तभी नुकसान करती है जब वह फसल से ऊपर जाने लगे या उसमें फल या बीज बनने लगे। तभी उसे निकालने की जरूरत है। निकाल कर भी उसका खाद या भूमि ढकने में प्रयोग करना चाहिये। उसे खेत से बाहर फेंकने की जरूरत नहीं है। वैसे, इस तरह की खेती में खरपतवार की समस्या भी कम रहती है। एक तो इसलिये कि जुताई कम से कम की जाती है. दूसरा कारण या है कि रासायनिक खाद के प्रयोग से खरपतावर को सहज उपलब्ध पोषक तत्त्व एकदम से मिल जाते हैं जिस से वह तेजी से बढ़ती हैं। परन्तु कुदरती खेती में खरपतवार को इस तरह से यूरिया जैसा सहज उपलब्ध पोषक तत्त्व (जैसे मरीज को ग्लूकोस) नहीं मिलता इसलिये खरपतवार की समस्या कम रहती है।

ग्यारहवाँ, जरूरत पड़ने पर बीमारी या कीटों की रोकथाम के लिये देसी दवाई, जो किसान खुद बना सकता है, का प्रयोग किया जाना चाहिये। वैसे कुदरती खेती में मिट्टी स्वस्थ होने के कारण और जैव विविधता के कारण कीड़ा और बीमारी कम लगते हैं। लगते भी हैं तो कम घातक होते हैं। यह ध्यान रहे कि सभी कीट हमें नुकसान नहीं पहुँचाते। ज्यादातर तो बहुत लाभदायक हैं।

बारहवाँ, किसान की नकेल बाहरी और खास तौर से चन्द बड़ी कम्पनियों के हाथ में न जाए, इसलिए जहाँ तक हो सके बाहरी संसाधनों का प्रयोग नहीं किया जाना चाहिये। बाजार में जैविक कीट-नियन्त्रक, केंचुआ खाद या अन्य सहायक सामग्री भी उपलब्ध हैं। इन में से कुछ अच्छी भी हो सकती हैं परन्तु अपनी बनाई खाद और कीटनाशक इत्यादि का प्रयोग ही लम्बे दौर में ज्यादा फायदेमंद रहता है।

तेरहवां, इस प्रकार की खेती में पशुपालन खेती का जरूरी हिस्सा होना चाहिए। केवल 1-2 फसलों पर आधारित खेती कुदरती खेती हो ही नहीं सकती। कुदरती खेती तो पशुपालन और पेड़ मिश्रित बहुफसली खेती ही हो सकती है।

अंत में, कुदरती या वैकल्पिक खेती केवल खेती का या ज्यादा मुनाफा कमाने का एक नया तरीका नहीं है बल्कि कुदरत और अन्य जीवों, और इंसानों के साथ, मिल-जुल कर, उनको मार कर नहीं, जीने का एक तरीका है। यह ऐसे समाज की नींव बन सकती है जिस में हस इंसान की बुनियादी जरूरतें पूरी हो, हर एक सम्मान और न्याय मिले, पर्याप्त भोजन भी मिले और प्यार भी मिले। और यह सब टिकाऊ हो। कुदरती खेती, ऐसी जीवन पद्धति का अंग बने तभी पूरा फायदा मिलेगा।