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महाराष्ट्र

महाराष्ट्र भारत का एक राज्य है जो भारत के दक्षिण मध्य में स्थित है। इसकी गिनती भारत के सबसे धनी राज्यों में सी की जाती है। इसकी राजधानी मुंबई है जो भारत का सबसे बडा शहर और देश की आर्थिक राजधानी के रुप में भी जानी जाती है। और यहा का पुणे शहर भी भारत के बडे महानगरो मे गिना जाता है। यहा का पुणे शहर भारत का छटवां सबसे बडा शहर है।

महाराष्ट्र की जनसंख्या सन २००१ में ९६,७५२,२४७ थी, विश्व में सिर्फ़ ग्यारह ऐसे देश हैं जिनकी जनसंख्या महाराष्ट्र से ज़्यादा है। इस राज्य का निर्माण १ मई, १९६०को मराठी भाषी लोगों की माँग पर की गयी थी। मराठी ज्यादा बोली जाती है। पुणे,औरंगाबाद, कोल्हापूर, नाशिक और नागपुर महाराष्ट्र के अन्य मुख्य शहर हैं।
महाराष्ट्र का अधिकतम भाग बेसाल्ट खडकों का बना हुआ है। इसके पश्चिमी सीमा से अरब सागर है। इसके पड़ोसी राज्य गोवा, कर्नाटक, तेलंगना, छत्तीसगढ़, मध्य प्रदेश, गुजरात है
भौगोलिक संरचना महाराष्ट्र भारत के उत्तर में बसा हुआ है और भौगोलिक दृष्टि से यह राज्‍य मुख्‍यत: पठारी है। महाराष्ट्र पठारों का पठार है। इसके उठे हुए पश्चिमी किनारे सह्याद्रि पहाड़ियों का निर्माण करते है और समुद्र तट के समानांतर हैं तथा इसकी ढलान पूर्व तथा दक्षिण पूर्व की ओर धीरे धीरे बढ़ती है। राज्‍य के उत्तरी भाग में सतपुड़ा की पहाड़ियाँ है, जबकि अजंता तथा सतमाला पहाड़ियां राज्‍य के मध्‍य भाग से होकर जाती है। अरब सागर महाराष्ट्र की पश्चिमी सीमा का प्रहरी है, जबकि गुजरात और मध्‍य प्रदेश इसके उत्तर में हैं। राज्‍य की पूर्वी सीमा पर छत्तीसगढ़ है और कर्नाटक तथा आंध्र प्रदेश इसके दक्षिण में है। भूमि भू-आकृति व अपावाह देखें:भारत एक झलक तेलंगाना आंध्र प्रदेश अरुणाचल प्रदेश असम बिहार छत्तीसगढ़ राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र दिल्ली गोवा गुजरात हरियाणा हिमाचल प्रदेश जम्मू और कश्मीर झारखण्ड कर्नाटक केरल मध्य प्रदेश महाराष्ट्र मणिपुर मेघालय मिज़ोरम नागालैंड उड़ीसा पंजाब राजस्थान सिक्किम तमिलनाडु त्रिपुरा उत्तराखंड उत्तर प्रदेश पश्चिम बंगाल अंडमान एवं निकोबार द्वीपसमूह चण्‍डीगढ़ दादरा तथा नगर हवेली दमन और दीव लक्षद्वीप पुदुचेरी महाराष्ट्र में कई प्रकार की आकर्षक भू- आकृतियां हैं। नर्मदा नदी, जो विभ्रंश घाटी से होकर बहती हुई अरब सागर में गिरती है, राज्य की उत्तरी सीमा के एक हिस्से का निर्माण करती है। अरब सागर में ही मिलने वाली ताप्ती नदी की विभ्रंश घाटी इसकी उत्तरी सीमा के दूसरे हिस्से को चिह्नित करती है। ये दो नदी घाटियाँ सतपुड़ा शृंखला नामक उत्खंड से विभक्त होती हैं। ताप्ती घाटी के दक्षिण में अरब सागर के किनारे कोंकण का तटीय क्षेत्र है, जिसके पूर्व में पश्चिमी घाट या सह्याद्रि पहाड़ियों के नाम से विख्यात कगार स्थित है। सह्याद्रि पहाड़ियों की तराई कोंकण में अरब सागर से 6.4 किमी की दूरी तक पहुँचती है, कोंकण का तटीय किनारा संकरा है। इसके बीच-बीच में सह्याद्रि पहाड़ियों के पर्वतीय स्कंध हैं और इस क्षेत्र को कई पश्चिमवर्ती द्रुतगामी नदियाँ अपवाहित करती हैं: उत्तर में स्थित उल्हास इनमें सबसे बड़ी है। सह्याद्रि पहाड़ियाँ उत्तर-दक्षिण दिशा में दीवार की तरह लगभग 640 किमी. तक लगातार स्थित हैं। लेकिन इससे गुज़रने वाले कई दर्रे तटीय भूमि और भीतरी क्षेत्र के बीच महत्त्वपूर्ण सड़क और रेल संपर्क उपलब्ध कराते हैं। सह्याद्रि की पूर्वी ढलान का उतार दक्कन के पठार की ओर क्रमिक है, जो पूर्व की ओर ढलान वाली गोदावरी, भीमा और कृष्णा नदी की घाटियों द्वारा निर्मित हैं। इन नदियों के अंत:प्रवाह से महादेव, अजंता, बालाघाट और अन्य प्रर्वत शृंखलाओं को आकार मिला है। महाराष्ट्र में स्थित ये पर्वत शृंखलाएँ और घाटियाँ रूके हूए लावे से निर्मित हैं। जिनकी मोटाई कई स्थानों पर 3,050 मीटर है। कई पहाड़ियों में लावे के विभिन्न प्रकार के अपरदन के कारण पठारी समतल जैसे ऊपरी हिस्से से युक्त सीढ़ीनुमा कगार की विशेष संरचनाएँ बन गई हैं। पूर्व में नागपुर के बाद यह पाशित चट्टानी क्षेत्र समाप्त हो जाता है और प्राचीन रवेदार चट्टानों से बनी भू-आकृति शुरू हो जाती है। महादेव पहाड़ियों और मैकाल श्रेणी से आगे पूर्व की ओर गोदावरी नदी की कई महत्त्वपूर्ण सहायक धारांए दक्षिण-पूर्व दिशा में बहती हैं, जिनमे वर्धा, वेनगंगा और पेनगंगा सर्वप्रमुख हैं। इस क्षेत्र में कई झीलें हैं। सुदूर पूर्व में इस क्षेत्र में कई वनाच्छादित पर्वत है, जो अपेक्षाकृत दुर्गम हैं। जलवायु मुम्बई तट पर दक्षिण-पश्चिम मॉनसून की पहली बारिश जून के पहले सप्ताह में होती है और यह सितम्बर तक चलती है। इस दौरान यहाँ वार्षिक वर्षा का 80 प्रतिशत दर्ज किया जाता है। सामान्यतः चार मौसम हैं: मार्च-मई (गर्म व शुष्क) जून-सितम्बर (गर्म व नम) अक्टूबर-नवंबर (उष्ण व शुष्क) दिसंबर-फ़रवरी (ठंडा व शुष्क) सह्याद्रि तथा उत्तरी शृंखलाएँ पर्वतीय अवरोध की भूमिका निभाती हैं और अत्यंत नम वातावरण को कोंकण तट की पवनमुखी दिशा तक सीमित रखती हैं। पवनमुखी दिशा में भीतरी पठार अपेक्षाकृत शुष्क रहता है। कोंकण में औसत वर्षा 2,540 मिमी है और सह्माद्रि समेत कुछ अत्यधिक वर्षा वाले क्षेत्रों में 6,350 मिमी तक वर्षा होती है। पश्चिमी घाट के पूर्व में कोंकण की वर्षा का मात्र पाँचावां हिस्सा ही वर्षा होती है। पहाड़ियों के अनुकूल पूर्वी क्षेत्रों में वर्षा दर बढ़ती चली जाती है, यहाँ 1,016 से 2,032 मिमी तक वर्षा दर्ज की गई है। तटीय क्षेत्रों में तापमान समरूप रहता है और मुम्बई में यह लगभग 27° से. से कुछ कम या ज़्यादा रहता है। पुणे (भूतपूर्व पूना) के पठार क्षेत्र में लगभग साल भर ठंडा मौसम रहता है। महाराष्ट्र के मध्यवर्ती और पूर्वी हिस्से में गर्मी के मौसम में औसत तापमान 43° से. और शीत ऋतु में लगभग 20° से. होता है। महाराष्ट्र में वर्षा की दर प्रत्येक साल भिन्न होती है, जिससे निपटने के लिए, 20वीं शताब्दी के उत्तरार्द्ध में सिंचाई के साधनों का विकास किया गया, ताकि फ़सलों को नष्ट होने से बचाया जा सके। अर्थव्यवस्था बॉम्बे उच्च न्यायालय निजी और सार्वजनिक उद्यमों के माध्यम से महाराष्ट्र भारत का एक सुविकसित और समृद्ध राज्य बन गया है। विद्युत उत्पादन इस दिशा में सबसे महत्त्वपूर्ण सहायक कारकों में से एक है। महाराष्ट्र में पश्चिमी घाट स्थित जलप्रपातों के ज़रिये पनबिजली उत्पादन किया जाता है। पूर्वी क्षेत्रों में ताप- विद्युत उत्पादन की प्रधानता है। नागपुर और चंद्रपुर में बड़े ताप विद्युत गृह स्थित हैं। भारत का पहला परमाणु बिजली संयंत्र मुंबई से 113 किलोमीटर उत्तर में स्थित है। बिजली की बढ़ती हुई मांग को पूरा करने के लिए नए विद्युत संयंत्र लगाए जा रहे हैं। महाराष्ट्र के खनिज संसाधनों में मैंगनीज, कोयला, चूना- पत्थर, लौह अयस्क, तांबा, बॉक्साइट और सिलिकायुक्त रेत शामिल है। इनमें से अधिकांश खनिज पदार्थ, भंडारा, नागपुर और चंद्रपुर ज़िलों में पाए जाते हैं और दक्षिण कोंकण में भी कुछ भंडार हैं। सह्याद्रि क्षेत्र के कई हिस्सों में बॉक्साइट भी पाया जाता है। बॉम्बे हाई में हाइड्रोकार्बन का उत्पादन भी बढ़ रहा है। कृषि महाराष्ट्र के लगभग 65 प्रतिशत श्रमिक कृषि तथा संबंधित गतिविधियों पर निर्भर है। यहाँ की प्रमुख फ़सलें हैं- धान, ज्‍वार, बाजरा, गेहूँ, तूर (अरहर), उडद, चना और दलहन। यह राज्‍य तिलहनों का प्रमुख उत्‍पादक है और मूँगफली, सूरजमुखी, सोयाबीन प्रमुख तिलहन फ़सलें है। महत्‍वपूर्ण नकदी फ़सलें है कपास, गन्ना, हल्दी और सब्जियाँ। राज्‍य में 12.90 लाख हेक्‍टेयर क्षेत्र में विभिन्‍न प्रकार के फल, जैसे आम, केला, संतरा, अंगूर आदि की फ़सलें उगाई जाती है। महाराष्ट्र के दो- तिहाई निवासी कृषक हैं। फ़सल उत्पादन सुनिश्चित करने के लिए विद्युतीकरण, उन्नत बीजों का उपयोग, व्यापक खेती और किसानों को सुविधा प्रदान करने जैसे उपाय किए जा रहे हैं। अपर्याप्त तथा असमान वर्षा से निपटने के लिए कई सिंचाई परियोजनाएं बनाई गई हैं और कई परियोजनाएं निर्माणधीन हैं। फ़सलों में बाजरा, ज्वार और दलहन प्रमुख है। 1,016 मिलीमीटर से अधिक वर्षा वाले क्षेत्रों में चावल की खेती होती है। नमी धारण करने की क्षमता वाले खेतों में शीत ऋतु में गेहूँ की फ़सल उगाई जाती है। 610-990 मिलीमीटर वर्षा वाले क्षेत्रों में कपास, तंबाकू और मूंगफली प्रमुख फ़सलें हैं। आजकल बाग़वानी पर भी ज़ोर दिया जा रहा है। फलों की खेती में अंगूर, आम, केला और काजू ज़्यादा लोकप्रिय हैं। सिंचाई की सुविधा ने महाराष्ट्र भारत का सबसे बड़ा गन्ना और चीनी उत्पादक क्षेत्र बना दिया गया है। चीनी ने कृषि- औद्योगिक क्षेत्रों को बढ़ावा दिया है। उद्योग महाराष्ट्र को पूरे देश का औद्योगिक क्षमता का केंद्र माना जाता है और राज्‍य की राजधानी मुंबई देश की वित्‍तीय तथा वाणिज्यिक गतिविधियों का केंद्र है। राज्‍य की अर्थव्‍यवस्‍था में औद्योगिक क्षेत्र का महत्‍वपूर्ण स्‍थान है। खाद्य उत्‍पाद, तंबाकू और इससे बनी चीज़ें, सूती कपडा, कपड़े से बना सामान, काग़ज़ और इससे बनी चीज़ें, मुद्रण और प्रकाशन, रबड, प्‍लास्टिक, रसायन व रासायनिक उत्‍पाद, मशीनें बिजली की मशीन, यंत्र व उपकरण तथा परिवहन उपकरण और उनके कल पुर्जे आदि का राज्‍य के औद्योगिक उत्‍पादन में महत्‍वपूर्ण योगदान है। वर्ष 2005-06 में औद्योगिक उत्‍पादन (निर्माण) वर्ष 2004-05 के मुक़ाबले 8.9 प्रतिशत अधिक रहा। मुम्बई का टिफ़िन वाला मिट्टी अपरदन तथा कृषि उत्पादों के भंडारण, परिवहन और विपणन की समस्याओं के मामले में उल्लेखनीय सफलता मिली है। समुद्री मछली पकड़ने में महाराष्ट्र का स्थान केरल के बाद आता है। यहाँ के सबसे पुराने निर्माण कारख़ाने सूती वस्त्रों की मिलें है। हालांकि कुछ बीमार इकाइयाँ हैं, लेकिन इनमें से अधिकांश मुंबई और नागपुर के विशालतम आधुनिक उद्योगों का हिस्सा हैं। मुंबई-पुणे उद्योग क्षेत्र में इस राज्य के सबसे अधिक भारी और उच्च प्रौद्योगिकी वाले उद्योग केंद्रित हैं। 1976 में मुंबई के पास समुद्र में भारत के पहले समुद्री तेल कुएँ की स्थापना से पेट्रो रसायन उद्योग का भी काफ़ी तेज़ी से विकास हुआ है। तेल परिष्करण और कृषि उपकरण, परिवहन उपकरण, रबड़ उत्पाद, बिजली व तेल के पंप, ख़राद, कंप्रेसर, चीनी मिल की मशीनरी, टाइपराइटर, रेफ़्रिजरेटर, इलेक्ट्रॉनिक उपकरण, टेलीविजन और रेडियो सेट जैसी वस्तुओं का उत्पादन महत्त्वपूर्ण होता जा रहा है। यहाँ वाहन निर्माण उद्योग आरंभिक अवस्था में है। बंबई भारत के फ़िल्म उद्योग का राष्ट्रीय केंद्र है। पावरलूम से वस्त्रोत्पादन के लिए इचलकरंजी और मालेगांव प्रसिद्ध हैं। मुंबई, नागपुर, अकोला, अमरावती और सोलापुर में विभिन्न प्रकार के औद्योगिक उत्पादनों का तेज़ी से विकास हो रहा है। पारंपरिक कृषि उद्योग केंद्रों में जलगांव, धुले, कोल्हापुर, सांगली और मिराज शामिल हैं। नागपुर, भुसावल, महाबलेश्वर, रत्नागिरि और मुंबई में फलों को डिब्बाबंद करने का उद्योग आर्थिक दृष्टि से महत्त्वपूर्ण है। यहाँ के वनोत्पादों में इमारती लकड़ी, बांस, चंदन और तेंदू पत्ते (बीड़ी बनाने के काम आने वाले) शामिल हैं। बेकरी को भी महत्त्व मिल रहा है। सिंचाई और बिजली जून 2005 के अंत तक 32 बड़ी, 178 मंझोली और राज्‍य के क्षेत्र की 2,274 लघु सिंचाई परियोजनाएं पूरी हो चुकी थीं इसके अलावा 21 बडी 39 मंझोली सिंचाई परियोजनाओं का निर्माण कार्य जारी है। 2004 से 2005 में राज्‍य में कुल सिंचित क्षेत्र 36.36 लाख हेक्‍टेयर था। 2004-05 में महाराष्ट्र की कुल स्‍थापित विद्युत उत्‍पादन क्षमता 12,909 मेगावाट थी। राज्‍य में प्‍लांट लोड फैक्‍टर (पी.एल.एफ) 81.6 प्रतिशत था और बिजली उत्‍पादन 68,507 करोड किलोवाट घंटा था

सूखा प्रभावित भारत को करना पड़ सकता है चीनी का आयात

सूखा प्रभावित भारत को करना पड़ सकता है चीनी का आयात

गत दो मॉनसूनों में बारिश की कमी के चलते बीते 4 वर्षों में पहली बार भारत को चीनी का आयात करना पड़ सकता है। पिछले दो वर्षों में कमजोर मॉनसून के कारण देश को सूखे का सामना करना पड़ा जिससे अनेक जलाशय सूख गए सिंचाई के श्रोतों में पानी की कमी हो गई। सूखे के चलते महाराष्ट्र में गन्ने की फसल पर काफी बुरा असर पड़ा है। परिणामतः राज्य में गन्ने के उत्पादन में 40 फीसदी तक की गिरावट हो सकती है।

सूखे से निपटने के लिए आपदा राहत कोष बनाए केंद्र: उच्चतम न्यायाल

सूखे से निपटने के लिए आपदा राहत कोष बनाए केंद्र: उच्चतम न्यायाल

उच्चतम न्यायालय ने सूखे जैसी स्थिति से निपटने के लिए आज केंद्र को आपदा राहत कोष बनाने के लिए कहा और कृषि मंत्रालय को आदेश दिया कि स्थिति का आकलन करने के लिए वह बिहार, गुजरात और हरियाणा जैसे प्रभावित राज्यों के साथ एक सप्ताह के अंदर एक बैठक करे। न्यायमूर्ति एमबी लोकुर की अगुवाई वाली पीठ ने केंद्र को आदेश दिया कि वह आपदा प्रबंधन कानून के प्रावधानों का कार्यान्वयन करे और वैज्ञानिक आधारों पर सूखे की घोषणा करने के लिए एक समय सीमा तय करे। साथ ही न्यायालय ने आपदा से प्रभावित किसानों को कारगर राहत देने के लिए केंद्र को सूखा प्रबंधन नियमावली की समीक्षा करने और संकट से निपटने के लिए एक राष्ट्रीय योजन

सूखे से निपटने के लिए पर्याप्त कोष नहीं दे रहीं सरकारें

सूखे से निपटने के लिए पर्याप्त कोष नहीं दे रहीं सरकारें

राज्यसभा में सदस्यों ने महाराष्ट्र सहित 11 राज्यों में पीने के पानी के गंभीर संकट और किसानों की बढ़ती आत्महत्या पर चिंता जाहिर की। विपक्ष ने सरकार पर इन राज्यों के लिए पर्याप्त कोष जारी नहीं करने का आरोप लगाया। मौजूदा समय में पेयजल की समस्या बने रहने का उल्लेख करते हुए सदस्यों ने सरकार से देश भर में लंबित 312 सिंचाई परियोजनाओं को समयसीमा में पूरी करने को कहा। इन परियोजनाओं से पीने के लिए पानी की आपूर्ति और कृषि को फायदा होगा।

सूखे पड़े हैं देश के जलाशय, बचा है केवल 24% पानी

सूखे पड़े हैं देश के जलाशय, बचा है केवल 24% पानी

एक ताजा रिपोर्ट में बेहद चौंकाने और परेशान करने वाले आंकड़े सामने आए हैं। इस रिपोर्ट के मुताबिक देश के 91 बड़े जलाशयों में केवल 24 फीसदी पानी ही बचा है। मतलब यह कि इन जलाशयों में कुल 37.92 बिलियन क्यूबिक मीटर पानी ही बचा है। केंद्रीय जल आयोग ने अपनी ताजा रिपोर्ट में कहा कि सात अप्रैल के आंकड़ों के अनुसार इन जलाशयों में जितना पानी है वह पिछले साल से कम है। इस साल इन जलाशयों में पानी की कमी की वजह 2014 और 2015 में हुई कम बारिश है। क्योंकि इन जलाशयों का पानी सिंचाई के लिए होता है, ऐसे में आंकड़ों को देखते हुए लगता है कि इसका असर रबी की फसल के लिए पानी की सप्लाई पर भी पड़ेगा। हालांकि मौसम विभाग

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