कुंदरू की जैविक खेती

भूमि का चुनाव :-

इसे भारी भूमि छोड़कर किसी भी भूमि में उगाया जा सकता है किन्तु उचित जल निकास वाली जीवांशयुक्त रेतीली या दोमट भूमि इसके लिए सर्वोत्तम मानी गई है चूँकि इसकी लताएँ पानी के रुकाव को सह नहीं पाती है अत: उचे स्थानों पर जहां जल निकास की उचित व्यवस्था हो वहीँ पर इसकी खेती करनी चाहिए |

भूमि की तैयारी :-

यदि इसे ऊँची जमीन में लगाना है तो २-३ जुताइयां देशी हल से करके उसके बाद  पाटा लगा देना चाहिए १.५ मी.पंक्ति से पंक्ति की दुरी और १.५ मी. पौध से पौध की दुरी रखकर ३० से.मी. लम्बा और ३० से. मी. चौड़ा और ३० से.मी. गहरा गड्डा खोद लेना चाहिए मिटटी में ४-५ किलो ग्राम गोबर की खाद गड्डे में भर देना चाहिए |

जलवायु :-

कुंदरू को गर्म और आद्र जलवायु की आवश्यकता होती है पहले इसे प. बंगाल और उ,प्र. के  पूर्वी जिलों में उगाया जाता था किन्तु अब इसे नई विधिया अपनाकर हर सिंचित क्षेत्र में सुगमता से उगाया जा सकता है कुंदरू की खेती उन सभी क्षेत्रों में सफलता पूर्वक की जा सकती है जहां पर औसत वार्षिक वर्षा १००-१५० से.मि. तक होती है |

प्रजातियाँ :-

कुंदरू की अभी तक कोई विकसित प्रजाति नहीं है केवल स्थानीय किस्मे ही उगाई जाती है इनके फलों के आकार के आधार पर दो प्रकार की किस्मे है |

गोल या अंडाकार वाली किस्मे :-

इस प्रकार की किस्मों के फलों का आकार अंडाकार होता है तथा फल हलके एवं पीले रंग के होते है |

लम्बे आकार वाली किस्मे :-

इस किस्म के फल आकार में अपेक्षाकृत बड़े और लम्बे होते है |

बीज बुवाई :-

पौध सामग्री :-

कुंदरू का प्रसारण भी परवल की तरह लता की कलमे काटकर किया जाता है इसके लिए सामान्यत: जुलाई के महीने में ४-५ माह से एक वर्ष पुरानी लताओं की ५-७ गांठ की १५-२० से. मी. लम्बी और आधे से.मी. मोटाई की कलमे काट ली जाती है  इन कलमों को जमीन में या गोबर की सड़ी हुई खाद तथा मिटटी मिलाकर भरे हुए पालीथीन के थैलों में लगा देते है इन कलमों की समय से सिचाई तथा देखभाल करते रहने से  लगाने के लगभग ५०-६० दिनों बाद कलमों की अच्छी तरह जड़े विकसित हो जाती है और उनमे कल्ले निकल आते है |

पौधरोपण का समय एवं विधि :-

सितम्बर-अक्टूम्बर के महीने में इसकी कलमों का रोपण किया जाता है इसके लिए पहले से तैयार की गई कलमों के पालीथीन को हटाकर मिटटी सहित गड्डे में रोपण करना चाहिए परवल जैसे कुंदरू भी नर और मादा पौधे अलग-अलग होते है अत: हर एक १० मादा पौधों के बिच एक नर पौधे की कलम लगाना आवश्यक़ होता है यदि गृह वाटिका में १-२ पौधे भी कुंदरू के लगाए जाए तो उनमे फलत के लिए एक नर पौधा अवश्य लगाया जाए |

आर्गनिक खाद :-

एक वर्ष का लगाया गया कुंदरू की लता २-३ वर्ष तक फलत में रहती है इसकी लताएँ ठण्ड के दिन में सुषुप्ता अवस्था में चली जाती है और बाद में फ़रवरी - मार्च के महीने में  इनसे नई शाखाएँ निकलती है इस समय प्रति थाला में १-२ किलो ग्राम गोबर की अच्छे तरीके से सड़ी हुयी खाद, १ किलो ग्राम भू-पावर , १ किलो ग्राम माइक्रो फर्टी सिटी कम्पोस्ट, १ किलो ग्राम माइक्रो नीम , १ किलो ग्राम सुपर गोल्ड कैल्सी फर्ट , १ किलो ग्राम माइक्रो भू-पावर और १-२ किलो ग्राम अरंडी की खली इन सब खादों को अच्छी तरह मिलाकर मिटटी के साथ मिलाकर प्रति थाला में भर देना चाहिए |

सिचाई :-

कलमों का थाले में रोपण करने के बाद सिचाई की जाती है तथा बाद में आवश्यकता अनुसार सिचाई करते है ठण्ड के दिन में जब पौधे सुषुप्त अवस्था में रहते है तब सिचाई की विशेष आवश्यकता नही रहती है गर्मी के दिनों में ५-६ दिन के अन्तराल पर सिचाई की जानी चाहिए बरसात के दिनों में पौधों के पास पानी नहीं रुकना चाहिए अन्यथा पौधे सड़ना शुरू कर देते है |

 खरपतवार नियंत्रम :-

पौधों की अच्छी बढ़वार के लिए समय-समय पर निराई करना आवश्यक होता है थाले में जब भी खरपतवार उगे उन्हें खुरपी की सहायता से निकाल देना चाहिए पौधों के पास हलकी गुड़ाई करने से वायु संचार अच्छा होता है जिससे लताओं की बढ़वार शीघ्र और तेज होती है |

कीट नियंत्रण :-

कुंदरू  की फसल को बहुत से कीड़े-मकोड़े सताते है किन्तु फल की मक्खी और फली भ्रंग विशेष रूप से हानी पहुंचाते है |
फल की मक्खी :-

यह मक्खी फलों में छिद्र करती है और उनमे अंडे देती है जिसके कारण फल सड़ जाते है कभी -कभी यह मक्खी फूलों को हानी पहुंचाती है |

रोकथाम :-

इसकी रोकथाम के लिए नीम का काढ़ा या गौमूत्र को माइक्रो झाइम के साथ मिलाकर अच्छी तरह से मिश्रण तैयार कर इसको २५० मि.ली.के साथ प्रति पम्प में डालकर फसल में तर-बतर कर छिडकाव करें |

फली भ्रंग :-

यह धूसर रंग का गुबरैला होता है जो पतियों में छेद करके उन्हें हानी पहुंचाता है |

 

रोकथाम :-

इसकी रोकथाम के लिए नीम का काढ़ा या गौमूत्र को माइक्रो झाइम के साथ मिलाकर अच्छी तरह से मिश्रण तैयार कर इसको २५० मि.ली.के साथ प्रति पम्प में डालकर फसल में तर-बतर कर छिडकाव करें |

रोग नियंत्रण :-

कुंदरू में विशेष प्रकार से चूर्णी फफूंदी नामक रोग अधिक लगता है -

चूर्णी फफूंदी :-

यह रोग एक प्रकार की फफूंदी के कारण होता है जिसके कारण पत्तियों और तनों पर आटे के समान   फफूंदी जम जाती है और पत्तियां पीली पड़कर व मुरझाकर मर जाती है |

रोकथाम :-

इसकी रोकथाम के लिए नीम का काढ़ा या गौमूत्र को माइक्रो झाइम के साथ मिलाकर अच्छी तरह से मिश्रण तैयार कर इसको २५० मि.ली.के साथ प्रति पम्प में डालकर फसल में तर-बतर कर छिडकाव करें |

तुड़ाई :-

पहले पौधे मार्च-अप्रैल के महीने में फल आना शुरू होता है और मई से उपज मिलने लगती है जो अक्टूम्बर तक चलती है कुंदरू के पूर्ण रूप से विकसित होने पर कच्ची अवस्था में ही फलों की तुड़ाई करने पर फल सख्त हो जाते है और अन्दर का गुदा लाल हो जाता है जो सब्जी के लिए उपयुक्त नहीं माना जाता है |

उपज :-

कुंदरू  की उपज इसकी प्रजातियों के अनुसार भिन्न-भिन्न होती है लेकिन इसकी औसत उपज २४० क्विंटल प्रति हे. है |

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