Error message

  • Deprecated function: Using ${var} in strings is deprecated, use {$var} instead in include_once() (line 1065 of includes/theme.inc).
  • Deprecated function: Using ${var} in strings is deprecated, use {$var} instead in include_once() (line 1065 of includes/theme.inc).
  • Deprecated function: Using ${var} in strings is deprecated, use {$var} instead in include_once() (line 1065 of includes/theme.inc).
  • Deprecated function: Using ${var} in strings is deprecated, use {$var} instead in include_once() (line 1065 of includes/theme.inc).

व्यावसायिक लाभ देती है गुलाब की खेती

गुलाब की खेती व्यावसायिक स्तर पर करके काफी लाभ कमाया जा सकता है. फूल के हाट में गुलाब के गजरे खूब बिकते हैं. गुलाब की पंखुडियों और शक्कर से गुलकन्द बनाया जाता है. गुलाब जल और गुलाब इत्र के कुटीर उद्योग चलते है. उत्तर प्रदेश में कन्नौज, जौनपुर आदि में गुलाब के उत्पाद की उद्योगशाला चलती है. दक्षिण भारत में भी गुलाब के उत्पाद के उद्योग चलते हैं. दक्षिण भारत में गुलाब फूलों का खूब व्यापार होता है. मन्दिरों, मण्डपों, समारोहों, पूजा-स्थलों आदि स्थानों में गुलाब फूलों की भारी खपत होती है. यह अर्थिक लाभ का साधन है. वहाँ हजारों ग्रामीण युवा फूलो को अपनी आय का माध्यम बना लेते हैं.

गुलाब को घर पर गमले में खिड़की की मंजूषा में, रसोई बगीचे की क्यारी में, आँगन में उगाने के लिए पर्याप्त धूप का होना एक आवश्यक शर्त है. गुलाब को दिन में कम से कम छः से आठ घंटे की खुली धूप होना आवश्यक है. गुलाब के पौधों के लिए पर्याप्त जीवांशयुक्त मिट्टी अच्छी होती है. बहुत चिकनी मिट्टी इसके अनुकूल नहीं होती है. मिट्टी का जल निकास और वायुसंचार सुचारु होना चाहिए. भूमि में हल्की नमी बनी रहना चाहिए.

 

विश्वभर में पसंद : गुलाब को विश्वभर में पसंद किया जाता है. इस पर व्यापक अनुसंधान एवं विकास कार्य किए गए हैं. अंतरराष्ट्रीय स्तर पर गुलाब प्रेमियों के संगठन हैं, जो नई किस्मों के विकास, परिचिन्हन, मानकीकरण आदि करते हैं. इसके अनुसार पौधों की बनावट, ऊँचाई, फूलों के आकार आदि के आधार पर इन्हें निम्न वर्गों में बाँटा गया है.

गुलाब की किस्में

* हाइब्रिड टी (एचटी) : इस वर्ग के पौधे ब़ड़े, ऊँचे व तेजी से ब़ढ़ने वाले होते हैं. इस वर्ग की प्रमुख किस्में अर्जुन, जवाहर, रजनी, रक्तगंधा, सिद्धार्थ, सुकन्या आदि हैं. इनके पुष्प शाखा के सिरे पर ब़ड़े आकर्षक लगते हैं. एक शाखा के सिरे पर एक ही फूल आता है.

* फ्लोरीबंडा : इसके पौधे मध्यम लंबाई वाले होते हैं, इनमें फूल भी मध्यम आकार के और कई फूल एक साथ एक ही शाखा पर लगते हैं. इनके फूलों में पंखु़िड़यों की संख्या हाइब्रिड टी के फूलों की अपेक्षा कम होती हैं. इस वर्ग की प्रमुख किस्में बंजारन, आम्रपाली, ज्वाला, रांगोली, सुषमा आदि हैं.

* ग्रेन्डीफ्लोरा : यह उपरोक्त दोनों किस्मों के संयोग से तैयार किया गया है. गुलदानों में इस वर्ग के फूलों को अधिक पसंद किया जाता है. बड़े स्तर पर खेती के लिए इस वर्ग का अधिक उपयोग किया जाता है. गोल्ड स्पॉट, मांटेजुआ, क्वीन एलिजाबेथ इस वर्ग की प्रचलित किस्में हैं.

* पॉलिएन्था : इस वर्ग के पौधों को घरेलू बगीचों व गमलों में लगाने के लिए पसंद किया जाता है. क्योंकि इनमें मध्यम आकार के फूल अधिक संख्या में साल में अधिक समय तक आते रहते हैं. इस वर्ग की प्रमुख किस्में स्वाति, इको, अंजनी आदि हैं.

* मिनीएचर : जैसा कि इसके नाम से स्पष्ट है, ये कम लंबाई के छोटे बौने पौधे होते हैं. इनकी पत्तियों व फूलों का आकार छोटा होने के कारण इन्हें बेबी गुलाब भी कहते हैं. ये छोटे किंतु संख्या में बहुत अधिक लगते हैं. इन्हें ब़ड़े शहरों में बंगलों, फ्लैटों आदि में छोटे गमलों में लगाया जाना उपयुक्त रहता है, परंतु धूप की आवश्यकता अन्य गुलाबों के समान छः से आठ घंटे आवश्यक है. इस वर्ग की प्रमुख किस्में ड्वार्फ किंग, बेबी डार्लिंग, क्रीकी, रोज मेरिन, सिल्वर टिप्स आदि हैं.

* क्लाइंबर व रेम्बलर : ये गुलाब की बेल (लता) वाली किस्में हैं. इन्हें मेहराब या अन्य किसी सहारे के साथ चढ़ाया जा सकता है. इनमें फूल एक से तीन (क्लाइंबर) व गुच्छों (रेम्बलर) में लगते हैं. क्लाइंबर वर्ग की प्रचलित किस्में गोल्डन शावर, कॉकटेल, रायल गोल्ड और रेम्बलर वर्ग की एलवटाइन, एक्सेलसा, डोराथी पार्किंस आदि हैं.