हरी खाद एक वरदान

मृदा उर्वरकता एवं उत्पादकता बढ़ाने में का प्रयोग प्राचीन काल से चला आ रहा है। सधन कृषि पद्धति के विकास तथा नगदी फसलों के अन्तर्गत क्षेत्रफल बढ़ने के कारण हरी खाद के प्रयोग में निश्चिय ही कमी आई लेकिन बढ़ते ऊर्जा संकट, उर्वरकों के मूल्यों में बृद्धि तथा गोबर की खाद एवं अन्य कम्पोस्ट जैसे कार्बनिक स्रोतों की सीमित आपूर्ति से आज हरी खाद का महत्व और बढ़ गया है। 
दलहनी एवं गैर दलहनी फसलों को उनके वानस्पतिक बृद्धिकाल में बहुत समय पर मृदा उवर््ारकता एवं उत्पादकता बढ़ाने के लिए जुताई करके मिट्टी में अपघटन के लिए दवाना ही हरी खाद देना है। ये फसलें अपने जड़ ग्रन्थियों में उपस्थित सहजीवी जीवाणु द्वारा वातावरण में नाइट्रोजन का दोहन कर मिट्टी में स्थिर करती है।
हरी खाद के लाभः- 
1.    मृदा में जीवांश एवं नत्रजन का योगः- विभिन्न जलवायु परिस्थितियों 43.100 कि.ग्रा. नाइट्रोजन प्रति हे0 मृदा में बढाई जा सकती है। दलहनी फसलें मृदा में नत्रजन की जो मात्रा बढाते है उसका 1/3 हिस्सा वह अपनी बढ़वार के लिए भी उपयोग कर लेते है। 
2.    मृदा सतह में पोषक तत्वों का संरक्षण।
3.    मृदा सतह में पोषक तत्वों का एकत्रीकरण।
4.    पोषक तत्वों की उपलब्धता में बृद्धि।
5.    अधोसतह में सुधार।
6.    मृदा सतह का संरक्षण।
7.    जैविक प्रभावः- नत्रजन का स्थरीकरण।
8.    खरपतवार नियंत्रणः- 
9.    मृदा संरक्षण में सुधार।
10.    क्षारीय एवं लवणीय भूमियांे का सुधार।
11.    फसलों के उत्पादन में बृद्धि।
हरी खाद के लिए आवश्यक गुणः-
1. फसल कम समय में अधिक बृद्धि करती हो।
2. फसल की जडें अधिक गहराई तक पहुॅचती हो।
3. फसल की वानस्पतिक बृद्धि, शाखायें व पत्तियाँ हो।
4. फसल के वानस्पतिक अंग मुलायम हो।
5. फसल की जल मॉग कम हो 
6. पोषक तत्वों संबंधी मॉग कम हो। 
7. फसल जलवायु की विभिन्न परिस्थितियों जैसे अधिकताप, कम ताप  कम या अधिक वर्षा सहन करने वाली हो।
8. कीट पतंगों के आक्रमण को सहन करने वाली हो।
9. फसल विभिन्न प्रकार की मृदाओं में पैदा होने में समर्थ हो।
10. मृदा पर प्रभाव अच्छा छोड़ती हो।
11. फसल की बीज सस्ती दरों पर उपलब्ध हो। फसल कटाई के बाद षीघ्र बृद्धि करती हो।
12. फसल कई उद्देश्यों की पूर्ति करती हो? चारा, रेषा, हरी खाद, फसल की बीज उत्पादन क्षमता अधिक हांे।
हरी  खाद की सम्भावनायें:-
1.    मृदायें जीवांश पदार्थ के स्तर को बनायें रखने के लिए हरी खाद उगाना आवश्यक है।
2.    लबणीय भूमि के सुधार के लिए।
3.    वर्षात में भूमि को पत्ते एवं तने ढॅक लेते हैं। जिससे मृदा-क्षरण कम होती है।
हरी खाद की फसलें - सनई, ढैंचा, उर्द, लोविया, मॅूग, ग्वार इत्यादि।
हरी खाद की फसलों की उत्पादन क्षमता:-
विभिन्न हरी खाद वाली फसलों की उत्पादन क्षमता निम्न सारणी में दी गई ।
फसल का नाम     हरे पदार्थ की मात्रा (टन/हे0)    नाइट्रोजन का प्रतिशत    प्राप्त नाइट्रोजन  (कि.ग्रा./हे0)
सनई     20-30    0.43    86-129
ढैंचा    20-25    0.42    84-105
उर्द    10-12    0.41    41-49
मॅूग    8-10    0.48    38-48
ग्वार    20-25    0.34    68-85
लोविया    15-18    0.49    74-88

हरी खाद देने की विधियाँ-
1.    हरी खाद की स्थानिक विधि- इस विधि में हरी खाद की फसल को उसी खेत में उगाया जाता है। जिसमें हरी खाद का उपयोग करना होता है। यह विधि समुचित वर्षा अथवा सुनिश्चित सिंचाई वाले क्षेत्रों में अपनाई जाती है। इस विधि में फूल आने से पूर्व वानस्पतिक बृद्धिकाल (45-60 दिन) में मिट्टी में पलट दिया जाता है। मिश्रित रूप से बोई गई हरी खाद की फसल को उपयुक्त समय पर जुताई द्वारा खेत में दवा दिया जाता है। 
2.     हरी पत्तियों की हरी खादः- इस विधि में हरी खाद की फसलों की पत्तियों एवं कोमल शाखाओं को तोडकर खेत में फैलाकर जुताई द्वारा मृदा में दवाया जाता है। व मिट्टी में थोडी नमी होने पर भी सड़ जाती है। यह विधि कम वर्षा वाले क्षेत्रों में उपयोगी होती है। 

हरी खाद की गुणवत्ता बढ़ाने के उपायः-

1.    उपयुक्त फसल का चुनावः- जलवायु एवं मृदा दशाओं के आधार पर उपयुक्त फसल का चुनाव करना आवश्यक होता है। जलमग्न तथा क्षारीय एवं लवणीय मृदा में ढैंचा तथा सामान्य मृदाओं में सनई एवं ढैंचा दोनों फसलों से अच्छी गुणवत्ता वाली हरी खाद प्राप्त होती है।
2.    हरी खाद की खेत में पलटाई का समयः- अधिकतम हरा पदार्थ प्राप्त करने के लिए फसलों की पलटाई या जुताई, बुवाई के 6-8 सप्ताह बाद प्राप्त हांेती है। आयु बढ़ने से पौधों की शाखाओं में रेषें की मात्रा बढ़ जाती है। जिससे जैव पदार्थ के अपघटन में अधिक समय लगता है।
3.    हरी खाद के प्रयोग के बाद अगली फसल की बुवाई या रोपाई का समयः- जिन क्षेत्रों में धान की खेती होती है। वहाँ जलवायु नम तथा तापमान अधिक होने से अपघटन क्रिया तेज होंती है। अतः खेत में हरी खाद की फसल की आयु 40-45 दिन से अधिक नहीं होनी चाहिए।
4.    समुचित उर्वरक प्रबन्धः- कम उर्वरकता वाली मदाओं में नाइट्रोजनधारी उर्वरकों का 15-20 कि.ग्रा./हे0 का प्रयोग उपयोगी होती है, राइजोवियम कल्चर का प्रयोग करने से नाइट्रोजन स्थिरीकरण सहजीवी जीवाणुओं की क्रियाशीलता बढ़ जाती है।

 

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