सूखा

अकाल भोजन का एक व्यापक अभाव है जो किसी भी पशुवर्गीय प्रजाति पर लागू हो सकता है। इस घटना के साथ या इसके बाद आम तौर पर क्षेत्रीय कुपोषण, भुखमरी, महामारी और मृत्यु दर में वृद्धि हो जाती है। जब किसी क्षेत्र में लम्बे समय तक (कई महीने या कई वर्ष तक) वर्षा कम होती है या नहीं होती है तो इसे सूखा या अकाल कहा जाता है। सूखे के कारण प्रभावित क्षेत्र की कृषि एवं वहाँ के पर्यावरण पर अत्यन्त प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है। इससे स्थानीय अर्थव्यवस्था डगमगा जाती है। इतिहास में कुछ अकाल बहुत ही कुख्यात रहे हैं जिसमें करोंड़ों लोगों की जाने गयीं हैं।

अकाल राहत के आपातकालीन उपायों में मुख्य रूप से क्षतिपूरक सूक्ष्म पोषक तत्व जैसे कि विटामिन और खनिज पदार्थ देना शामिल है जिन्हें फोर्टीफाइड शैसे पाउडरों के माध्यम से या सीधे तौर पर पूरकों के जरिये दिया जाता है। सहायता समूहों ने दाता देशों से खाद्य पदार्थ खरीदने की बजाय स्थानीय किसानों को भुगतान के लिए नगद राशि देना या भूखों को नगद वाउचर देने पर आधारित अकाल राहत मॉडल का प्रयोग करना शुरू कर दिया है क्योंकि दाता देश स्थानीय खाद्य पदार्थ बाजारों को नुकसान पहुंचाते हैं।

लंबी अवधि के उपायों में शामिल हैं आधुनिक कृषि तकनीकों जैसे कि उर्वरक और सिंचाई में निवेश, जिसने विकसित दुनिया में भुखमरी को काफी हद तक मिटा दिया है। विश्व बैंक की बाध्यताएं किसानों के लिए सरकारी अनुदानों को सीमित करते हैं और उर्वरकों के अधिक से अधिक उपयोग के अनापेक्षित परिणामों: जल आपूर्तियों और आवास पर प्रतिकूल प्रभावों के कारण कुछ पर्यावरण समूहों द्वारा इसका विरोध किया जाता है।

अकाल के कारण

1941 में डिसट्रोफिया से जूझ रहा एक भूखा वृद्ध.
अकाल की परिभाषाएं तीन अलग-अलग श्रेणियों पर आधारित हैं - खाद्य आपूर्ति के आधार पर, भोजन की खपत के आधार पर और मृत्यु दर के आधार पर. अकाल की कुछ परिभाषाएं हैं:

ब्लिक्स - खाद्य पदार्थों की व्यापक कमी जिसके कारण क्षेत्रीय मृत्यु दरों में उल्लेखनीय वृद्धि हो जाती है।
ब्राउन और एखोलम - खाद्य आपूर्ति में अचानक, तीव्रता से होने वाली कमी जिसके परिणाम स्वरूप व्यापक भुखमरी पैदा हो जाती है।
स्क्रिमशॉ - बड़ी संख्या में लोगों की भोजन की खपत के स्तर में अचानक गिरावट. 
रैवेलियन - किसी आबादी के कुछ खंडों में भोजन ग्रहण करने पर असामान्य रूप से गंभीर खतरे के साथ असामान्य रूप से उच्च मृत्यु दर.
क्यूनी - परिस्थितियों का एक ऐसा सेट जो उस समय उत्पन्न होता है जब किसी क्षेत्र में बड़ी संख्या में लोग पर्याप्त मात्रा में भोजन प्राप्त नहीं कर पाते हैं जिसके परिणाम स्वरूप एक बड़े पैमाने पर तीव्रता से कुपोषण फ़ैल जाता है।
किसी आबादी में खाद्य पदार्थों की कमी या तो भोजन की कमी या फिर भोजन के वितरण में कठिनाइयों के कारण होता है; यह स्थिति प्राकृतिक जलवायु के उतार-चढ़ावों और दमनकारी सरकार या युद्ध से संबंधित चरम राजनीतिक परिस्थितियों के कारण और भी बदतर हो सकती है। आयरलैंड का भीषण अकाल आनुपातिक रूप से सबसे बड़े ऐतिहासिक अकालों में से एक था। इसकी शुरुआत 1845 में आलू की बीमारी की वजह से हुई थी और यह इसलिए भी हुआ क्योंकि खाद्य पदार्थों को आयरलैंड से इंग्लैंड भेजा जा रहा था। केवल अंग्रेज ही उच्च मूल्यों का भुगतान करने में सक्षम थे। हाल ही में इतिहासकारों ने अपने उन आकलनों को संशोधित किया है जिसके अनुसार यह बताया गया था कि अकाल को कम करने में अंग्रेजों द्वारा कितना अधिक नियंत्रण का प्रयास किया जा सकता था, इसमें यह पाया गया कि आम तौर पर जितना समझा जाता था उन्होंने उससे कहीं अधिक मदद करने की कोशिश की थी। अकाल के कारण के लिए 1981 तक परंपरागत व्याख्या खाद्य पदार्थों की उपलब्धता में कमी (एफएडी) की परिकल्पना के रूप में थी। धारणा यह थी कि सभी अकालों की केंद्रीय वजह खाद्य पदार्थों की उपलब्धता में कमी थी।  हालांकि एफएडी यह नहीं समझा पाया कि क्यों आबादी का केवल एक ख़ास खंड जैसे कि खेतिहर मजदूर अकाल से प्रभावित थे जबकि अन्य अकाल से अछूते थे। हाल ही के कुछ अकालों के अध्ययन के आधार पर एफएडी की निर्णायक भूमिका पर सवाल उठाया गया है और यह सुझाव दिया गया है कि जल्द से जल्द भुखमरी की स्थिति लाने का कारण बनने वाली प्रणालियों में सिर्फ खाद्य पदार्थों की उपलब्धता में कमी के अलावा भी कई अन्य कारक शामिल हैं। इस दृष्टिकोण के अनुसार, अकाल अधिकारों का एक परिणाम है, इस प्रस्तावित सिद्धांत को "आदान-प्रदान के अधिकारों की विफलता" या एफईई कहा जाता है।  किसी व्यक्ति के पास विभिन्न प्रकार की वस्तुएं हो सकती हैं जिनकी अदला-बदली एक बाजार व्यवस्था में उसकी जरूरत की अन्य चीजों के बदलें में की जा सकती है। आदान-प्रदान व्यापार या उत्पादन या दोनों के संयोजन के माध्यम से किया जा सकता है। इन अधिकारों को व्यापार-आधारित या उत्पादन-आधारित अधिकार कहा जाता है। इस प्रस्तावित दृष्टिकोण के अनुसार अकाल की स्थिति व्यक्ति द्वारा अपने अधिकारों के आदान-प्रदान की क्षमता ख़त्म हो जाने के कारण आती है। एफईई के कारण होने वाले अकालों का एक उदाहरण किसी खेतिहर मजदूर द्वारा अपने प्रमुख अधिकारों का आदान-प्रदान करने की अक्षमता है, जैसे कि चावल का मजदूर जब उसके रोजगार की स्थिति डावांडोल या पूरी तरह से समाप्त हो जाती है।

कुछ तत्व एक विशेष क्षेत्र को अकाल के लिए अत्यधिक संवेदनशील बना देते हैं। इनमें शामिल हैं:

गरीबी
अनुपयुक्त भौतिक अवसंरचना
अनुपयुक्त सामाजिक ढांचा
एक दमनकारी राजनीतिक व्यवस्था
एक कमजोर या पहले से तैयार नहीं रहने वाली सरकार
कुछ मामलों में, जैसे कि चीन में ग्रेट लीप फॉरवार्ड (जिसने पूर्ण संख्याओं में सबसे बड़ा अकाल पैदा किया था), 1990 के दशक के मध्य में उत्तर कोरिया में या सन 2000 की शुरुआत में जिम्बाब्वे में, अकाल की स्थिति सरकारी नीतियों के एक अनपेक्षित परिणाम के रूप में उत्पन्न हो सकती है। मलावी ने विश्व बैंक की बाध्यताओं के खिलाफ किसानों को अनुदान देकर अपने अकाल का खात्मा किया।  इथियोपिया में 1973 के वोल्लो अकाल के दौरान खाद्य पदार्थों को वोल्लो से बाहर राजधानी शहर अदीस अबाबा में भेजा जाता था जहां इनके लिए कहीं अधिक कीमतें मिल सकती थीं। 1970 के दशक के उत्तरार्द्ध और 1980 के दशक की शुरुआत में इथियोपिया और सूडान कीतानाशाहियों के निवासियों को भारी अकाल का सामना करना पड़ा, लेकिन जिम्बाब्वे और बोत्सवाना के लोकतंत्रों में राष्ट्रीय खाद्य उत्पादन में गंभीर कमी के बावजूद भी उन्होंने अपना बचाव किया। सोमालिया में अकाल एक विफल प्रशासन की वजह से आया।

कई अकाल बड़ी आबादी वाले देशों की तुलना में, जिनकी आबादी क्षेत्रीय वहन क्षमता से अधिक हो जाती है, खाद्य उत्पादन में असंतुलन के कारण पैदा होते हैं। ऐतिहासिक रूप से अकाल की स्थिति कृषि संबंधी समस्याओं जैसे कि सूखा, फसल की विफलता या महामारी की वजह से आयी है। मौसम के बदलते मिजाज, संकट, युद्ध और महामारी जनित बीमारियों जैसे कि काली मौत से निबटने में मध्य युगीन सरकारों की अप्रभावशीलता मध्य युगों के दौरान यूरोप में सैकड़ों अकालों को जन्म देने में सहायक सिद्ध हुई जिनमें ब्रिटेन में 95 और फ्रांस में 75 अकाल शामिल हैं। फ्रांस में सौ सालों के युद्ध, फसल की विफलताओं और महामारियों ने इसकी आबादी दो-तिहाई तक कम कर दी थी
फसल कटाई की विफलता या परिस्थितियों में बदलाव जैसे कि सूखा एक ऐसी स्थिति पैदा कर सकता है जिसके द्वारा एक बड़ी संख्या में लोग निरंतर वहां रह सखते हैं जहां जमीन की वहन क्षमता में मूलतः अस्थायी रूप से कमी आ गयी है। अकाल को अक्सर निर्वाह के लायक कृषि के साथ जोड़ा जाता है। एक आर्थिक रूप से मजबूत क्षेत्र में कृषि का कुल अभाव अकाल का कारण नहीं बनता है; एरिज़ोना और अन्य समृद्ध क्षेत्र अपने खाद्य पदार्थ के बहुत अधिक हिस्से का आयात करते हैं, क्योंकि इस तरह के क्षेत्र व्यापार के लिए पर्याप्त आर्थिक सामग्रियों का उत्पादन करते हैं।

अकाल की स्थिति ज्वालामुखीय घटना के कारण भी उत्पन्न हुई है। 1885 में इंडोनेशिया में माउंट तंबोरा ज्वालामुखी में विस्फोट के कारण दुनिया भर में फसल नष्ट हो गए थे और अकाल की स्थितियां पैदा हो गयी थीं जिसके कारण 19वीं सदी का भीषण अकाल पड़ा था। वैज्ञानिक समुदाय की मौजूदा सर्वसम्मति यह है कि ऊपरी वायुमंडल में निकलने वाले एयरोसोल और धूलकण सूर्य की ऊर्जा को जमीन तक पहुंचने से रोककर तापमान को ठंडा कर देते हैं। यही प्रणाली सैद्धांतिक रूप से अत्यंत विशाल उल्का-पिंडों के कारण बड़े पैमाने पर विलुप्तियों की हद तक पड़ने वाले प्रभावों पर लागू होती है।

अच्छे मानसून के बावजूद देश के एक तिहाई हिस्सों में कम बारिश

अच्छे मानसून के बावजूद देश के एक तिहाई हिस्सों में कम बारिश

लगातार दो सूखों के बाद देश में इस साल जाकर सामन्य वर्षा हुई है। हालांकि, सामान्य वर्षा के बाद भी देश का एक तिहाई भाग कम या अल्प वर्षा का सामना कर रहा है।

भारतीय मौसम विज्ञान विभाग (IMD) के अनुसार जून से सितम्बर चलने वाले चार महीने के दक्षिण-पश्चिम मानसून के दौरान अगस्त 2016 तक तीन महीनों में देश के 200 से ज्यादा ज़िलों में कम या बहुत कम बारिश हुई।

मौसम विभाग ने कहा, इस साल सामान्य या अत्यधिक बारिश होगी

मौसम विभाग ने कहा, इस साल सामान्य या अत्यधिक बारिश होगी

कम मॉनसून की संभावना से इनकार करते हुए भारतीय मौसम विभाग (आईएमडी) ने बुधवार को कहा कि इस बात की 96 फीसदी संभावना है कि इस साल सामान्य या अत्यधिक बारिश होगी।

दूसरा दीर्घावधि का अनुमान जारी करते हुए मौसम विभाग के महानिदेशक लक्ष्मण सिंह राठौर ने कहा कि पश्चिमोत्तर भारत में दीर्घकालिक औसत की 108 फीसदी बारिश होगी, जबकि मध्य भारत और दक्षिणी प्रायद्वीप में एलपीए की 113 फीसदी वर्षा होगी। पूर्वोत्तर क्षेत्र में 94 फीसदी वर्षा होगी, जो सामान्य से कम है।

सूखा प्रभावित भारत को करना पड़ सकता है चीनी का आयात

सूखा प्रभावित भारत को करना पड़ सकता है चीनी का आयात

गत दो मॉनसूनों में बारिश की कमी के चलते बीते 4 वर्षों में पहली बार भारत को चीनी का आयात करना पड़ सकता है। पिछले दो वर्षों में कमजोर मॉनसून के कारण देश को सूखे का सामना करना पड़ा जिससे अनेक जलाशय सूख गए सिंचाई के श्रोतों में पानी की कमी हो गई। सूखे के चलते महाराष्ट्र में गन्ने की फसल पर काफी बुरा असर पड़ा है। परिणामतः राज्य में गन्ने के उत्पादन में 40 फीसदी तक की गिरावट हो सकती है।

किसान सिर्फ वोट नीति तक ही सीमित

किसान सिर्फ वोट नीति तक ही सीमित

देश के किसानों के साथ आज तक की सरकारों ने धोखा किया है चाहें वह की राज्य की हो या केंद्र सरकार दोनों ने किसानों को केवल वोट की ही नज़र से देखा है किसानों के बारे में बड़े बड़े वायदे किये चुनावी मुद्दा बनाया लेकिन किसानों को उनका अधिकार किसी भी सरकार ने नही दिया ! हमारे माननीय प्रधान मंत्री जी ने कहा कि २०२२ तक देश के किसानों की आय दोगनी होगी देश अपनी आज़ादी की 75 वीं वर्षगांठ मनायेगा तब तक देश देश में से किसान नाम की प्रजाति समाप्त हो चुकी होगी !

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