पशुओं में वाह्य परजीवी की समस्या और उनकी रोकथाम

मानव ने सभ्यता के प्रारंभ में सर्वप्रथम पशुओं को पालतू बनाकर पालना प्रारंभ किया और उसने पाया की पशुओं से बेहतर उत्पादन प्राप्त करने के लिए उनका समुचित प्रबंधन आवश्यक है। प्रारंभ काल में उसने देखा कि कुछ अन्य जीव जो उनके पालतू पशुओं पर भोजन तथा आवास के लिए आश्रित हैं, जैसे: जोंक, किलनी तथा जुयें इत्यादि और ये जीव परजीवी जन्तु कहलाये। क्योंकि ये जीव पशु शरीर के बहार ही अपने भोजन तथा आवास के लिए आश्रित हैं अतः ये वाह्य परजीवी कहे जाते हैं। वाह्य परजीवियों में प्रमुख हैं जोंक, किलनी, जुयें, माइट्स (कुट्की या चिचड़ी), पिस्सू आदि। वर्षाऋतु, अस्वच्छता, सूर्य का प्रकाश व हवा की कमी होने की दशा में इनका प्रकोप अधिक हो जाता है। ज्यादातर पशुपालक जानकारी के अभाव में पशुओं में परजीवियों से होने वाले रोगों तथा समस्याओं पर ध्यान नहीं देते है, जिससे आगे चलकर उनको काफी नुकसान उठाना पड़ता है।

जोंक:

जोंक एक वाह्य परजीवी है जो एनिलिडा संघ का जन्तु है। यह उभयलिंगी होता है तथा स्वच्छ जलाशयों और हरे घास के मैदानों में मिलता है। जलीय जोंक मछलियों, उभयचर, पक्षियों, और स्तनधारियों के रक्त पर निर्भर रहते हैं तथा वे घोंघे, कीट लार्वा और कीड़े खा सकते हैं। जबकि भूमि पर रहने वाले जोंक केवल स्तनधारियों के रक्त पर निर्भर रहते हैं। जोंक काले, चमकीले या मटमैला रंग की होती हैं। इनका शरीर लम्बा, चपटा एवं खंडों में विभक्त रहता है। इनके शरीर के दोनों सिरों पर पशुओं की चमड़ी से चिपकने के लिए चूषक पाये जाते हैं। इसके अगले हिस्से के चूषक के मध्य में तिकोना मुखछिद्र होता है जो तीखे दांतों वाले तीन जबड़े मांस में वाई के आकार का चीरा बनाते हैं। इसके पिछले सिरे पर गोल चूसक मुख होता है। जोंक की लार में ऐसे पदार्थ होते हैं जो घाव वाले स्थान को स्थानिक बेहोशी करते हैं तथा इसमे हिरुडिन नमक रसायन होता है जो रक्त वाहिकाओं को रक्त के प्रवाह को बढ़ाने के लिए पतला करते हैं और रक्त का थक्का बनने से रोकता है। सामान्य रूप से जोंक लगभग 20 मिनट में अपने वजन से 10 गुने मात्रा में खून चूस सकता है और जैसे ही इसका पेट भर जाता है ये शरीर से अलग हो जाता है। कभी-कभी ये शरीर के छिद्रों यथा; नासिका, कान या योनि से भीतर चले जाते हैं और लंबे समय तक बने रहते हैं। कमजोरी, रक्तलप्ता, भूख में कमी, असामान्य श्वास और श्वसन ध्वनियों के साथ, असुविधा का प्रदर्शन, मुंह से रक्तस्राव, और चलने में अनिच्छा आदि लक्षण पशुओं में प्रकट होते हैं।

जोंक के लिए सामान्य रूप से पकड़ कर निकालना ही एकमात्र उपाय है। निकलते समय ध्यान रखें की पशु के शरीर में लार के साथ रक्त के प्रवाह को पतला करने और रक्त का थक्का बनने से रोकने के लिए रसायन शरीर में प्रविष्ट रहता है जिससे लंबे समय तक रक्त स्राव हो सकता है अतः रक्त स्राव रोकने के लिए पट्टी बांधे। जोंक के शरीर पर नमक डालने से ये पशु के शरीर से निकाल जाता है। है। कई बार जब ये शरीर के छिद्रों यथा; नासिका, कान या योनि से भीतर चले जाते तब इनको निकालना मुश्किल हो जाता है, अतः किसान भाइयों से अनुरोध है कि वे अपने पशुओं को तालाब में नहाने के लिए ना जाने दें तथा उन्हें साफ पानी से नहलाएँ व पीने के लिए दें। जिन घास के मैदानों में जोंक की उपस्थिति हो वहाँ चरने के लिए ना जाने दें।

किलनी:

किलनी (Tick) छोटे वाह्य परजीवी जीव हैं जो स्तनधारियों, पक्षियों और कभी-कभी सरीसृपों एवं उभयचरों के शरीर पर रहकर उनके खून चूसकर जीते हैं और पशुओं में लाइम रोग, क्यू ज्वर, बबेसिओसिस जैसी कई बीमारियां फैलाते हैं। अगर पशुपालक थोड़ा ध्यान दे तो इनसे पशुओं को बचाया जा सकता है और संभावित हानि को टाला जा सकता है। किलनी की उपस्थिति पशुपालक देख कर ही समझ सकते हैं। सामान्यता किलनी जानवरों के पेट, कानों की निचली तरफ, पूंछ व योनि के पास तथा जांघ के अंदर की सतह एंव अयन/अंडकोष के चारों तरफ पायी जाती हैं। इससे पशुओं में खुजली एवं जलन होना, दुग्ध उत्पादन में कमी आना, भूख कम लगाना जैसे प्रभाव दिखाई पड़ते है। किलनी से चमड़ी का खराब हो जाती है तथा बाल झड़ने लगते हैं। पशुओं में तनाव और चिड़चिड़ापन का बढ़ता है और उसके दूध उत्पादन पर भी असर पड़ता है। इसलिए शुरू में ही इन परीजीवियों का ध्यान रखना चाहिए।

किलनियों का जीवन चक्र इस प्रकार है कि वे अंडे देने के लिए पशु के शरीर को छोड़ कर पशुशाला की दीवारों में बने छेदों व दरारों में चली जाती हैं। जहां अंडे कुछ दिन पनपने के बाद पुनः पशु के शरीर से चिपक जाते है और अपना जीवन चक्र पूरा करते हैं। किलनी के संक्रमण में यह सलाह दी जाती है कि पशु को प्रतिदिन खुरैरा करें और इनकी रोकथाम के लिए पशुओं को पशु चिकित्सक की सलाह से कीटनाशक दवायें जैसे आइवेरमेक्टीन या मोक्सिडेक्टिन 1 मि ली प्रति 50 किग्रा भार पर सुई द्धारा त्वचा के नीचे दें अथवा साइपरमैथ्रिन/डेल्टामैथ्रिन 1-2 मिली प्रति लीटर पानी में घोलकर नहलायें तथा 5 मिली प्रति लीटर पानी में घोलकर बाड़े में छिड़काव करें। फ्लुमेथ्रिन 10 ग्रा॰ प्रति लीटर घोल की 1 मिली दवा प्रति 10 किग्रा भार पर सिर से पूंछ तक बूँद-बूँद कर रीढ़ की हड़डी पर शिर से लेकर पुंछ तक टपकायेँ।

जुयें:

दुनिया भर के पशुओं में जुयें का संक्रमण एक महत्वपूर्ण समस्या है जो गाय, भैंस और अन्य जुगाली करने वालों पशुओं के वृद्धि और प्रदर्शन को बाधित करती है। खुजली, त्वकछेद और केशाभाव जुयें के संक्रमण का सबसे आम संकेत है। इसके अतिरिक्त इसे पशु के शरीर पर नंगी आँखों से भी देखा जा सकता है। जूँ के अंडे या निम्फ़ त्वचा के पास के बालों से जुड़े होते हैं, जब की वयस्क जूँ विचरण करने के लिए स्वतंत्र होती है। एक जूँ का जीवन चक्र लगभग 30-40 दिन का होता है। जूँ एक पशु के शरीर से दूसरे मेजबान तक जल्दी पहुँचने का प्रयास करती है क्योंकी ये पशु शरीर से बाहर कुछ दिनों से अधिक समय तक जीवित नहीं रह सकती। खुजली एक सामान्य लक्षण है और खुजली से परेशान पशु अपने शरीर को दीवाल से रगड़ता है जिससे त्वचा कट जाती है और अन्य संक्रमण की समस्या आ जाती है। गंभीर मामलों में, विशेष रूप से बछड़ों में, रक्तलप्ता व वजन घटने का कारण भी जुयें हो सकती हैं। गंभीर रूप से पीड़ित गर्भवती जानवरों का गर्भपात भी हो सकता है।

जुयें के संक्रमण में यह सलाह दी जाती है कि पशु को प्रतिदिन खुरैरा करें और उपचार के लिए सिंथेटिक पाइरेथ्रोइड और ऑर्गनोफॉस्फेट रासायनिक समूहों के भीतर विभिन्न उत्पाद जो विशेष रूप से जूँ के लिए मवेशियों का इलाज करते हैं जैसे पेरमेथरिन (Permethrin), डेल्टामेथ्रिन (Deltamethrin), फ्लुमेथ्रिन (Flumethrin), साइपरमेथ्रिन (Cypermethrin) आदि को 10 ग्रा॰ प्रति लीटर घोल की 1 मिली दवा प्रति 10 किग्रा भार पर सिर से पूंछ तक बूँद-बूँद कर रीढ़ की हड़डी पर शिर से लेकर पुंछ तक टपकायेँ।

माइट्स (मेंज, कुट्की या चिचड़ी):

पशुपालक भाइयों हमारे मवेशी कई प्रजातियों के माइट्स से प्रभावित होते हैं, जो उनमें चर्म रोग का कारण बनते हैं। माइट्स अराचिन्डा (Arachnida) वर्ग से संबंधित है जिसमें मकड़ियों और किलनी भी शामिल होते हैं। वयस्क माइट्स के शरीर के दो भाग होते हैं और इसे आठ पैर होते हैं। माइट्स की महत्वपूर्ण प्रजातियां जो मवेशियों की त्वचा को संक्रमित करती हैं, उनमें सरकोप्टेस स्कैबी उपजाति बोविस (Sarcoptes scabiei var. bovis) शामिल हैं जो सार्कोप्टिक खुजली या खारिश का कारक है। सोरोप्टेस बोविस (Psoroptes bovis), सोरोप्टेस खुजली; और कोरिओप्टेस बोविस (Chorioptes bovis) से कोरिओप्टेस पपड़ी खाज होती है। हैं। माइट्स सभी रूपों में बहुत ही संक्रामक होता है और सीधे संपर्क द्वारा अन्य मवेशियों को संक्रमित करता है। एक चौथी प्रजाति, डेमोडेक्स बोविस (Demodex bovis) है, मवेशियों में बालों के रोम और संबंधित ग्रंथियों में पाई जाती है जो सामान्य रूप से मावेशी के स्वास्थ्य को प्रभावित नहीं करता है, पर भारी संक्रमण की स्थिति में चमड़े की गुणवत्ता को ख़राब कर सकता है। सर्दियों के महीनों में जब जानवरों को ठंड के मौसम से, अपर्याप्त पोषण, व सांस की बीमारियों आदि से तनाव होता है तब सबसे ज्यादा माइट्स की शिकायतें होती हैं।

वयस्क मादा माइट पशु की त्वचा में सुरंग बनाती है और उस सुरंग में ही अंडे देती है अंडो से निकले अपरिपक्व बच्चे फैल कर नई सुरंग बनाते है और परिणाम स्वरूप संक्रमण शरीर के अन्य भागों में जल्दी से फैल जाता है। त्वचा की खुजली, सूजन के साथ त्वचा का गाढ़ा और कड़ा होना तथा बालों का झड़ना इसकी उपस्थिति के प्रमुख लक्षण है। मवेशियों में आमतौर पर ये घाव सबसे पहले गर्दन के नीचे, भीतरी जांघ, ब्रिस्केट, निचले पैरों और पूंछ व सिर पर दिखाई देते हैं। त्वचा स्क्रैपिंग की माईक्रोस्कोप द्वारा जांच करने पर माइट्स को पहचाना जा सकता है। माइट्स का संक्रामण भेड़, बकरी व सूअरों में भी होता है।संक्रमण आमतौर पर कंधों और दुम पर शुरू होते हैं, जो धीरे-धीरे पूरे शरीर पर फैल जाते हैं। माइट्स से प्रभावित पशु अपने शरीर को दीवालों ये पेड़ों से रगड़ता है जिससे त्वचा कट जाती है और इससे द्वितीयक संक्रमण का खतरा हो जाता है।

इनकी रोकथाम के लिए पशुओं को पशु चिकित्सक की सलाह से दवायें दें। परमेथ्रिन (40% permethrin), अमित्रज (12.5% amitraz), फोसमेट (11.75% phosmet) अथवा साइपरमैथ्रिन/डेल्टामैथ्रिन 1-2 मिली प्रति लीटर पानी में घोलकर नहलायें तथा 5 मिली प्रति लीटर पानी में घोलकर बाड़े में छिड़काव करना लाभप्रद रहता है। आइवेरमेक्टीन या मोक्सिडेक्टिन 1 मि ली प्रति 50 किग्रा भार पर सुई द्धारा त्वचा के नीचे दें और आइवेरमेक्टीन, मोक्सिडेक्टिन या फ्लुमेथ्रिन 10 ग्रा॰ प्रति लीटर घोल की 1 मिली दवा प्रति 10 किग्रा भार पर सिर से पूंछ तक बूँद-बूँद कर रीढ़ की हड़डी पर शिर से लेकर पुंछ तक टपकायेँ, इससे माइट्स पर नियंत्रण हो जाता है। नीम और करंज तेल, कपूर तथा गंधक के मिश्रण की चमड़े पर मालिश करना भी लाभप्रद होता है।

पिस्सू:

पिस्सू (Flea) साइफोनाप्टेरा (Siphonaptera) गण के कीट हैं। इनके पंख नहीं होते तथा मुख-अंग त्वचा को छेदने एवं रक्त चूसने के लिये विशेष रूप से बने होते हैं। पिस्सू वाह्य परजीवी है और स्तनधारियों एवं पक्षियों का खून चूसकर अपना पोषण करते हैं। माइट्स और पिस्सू दोनों से त्वचा में लगभग एक जैसे लक्षण पैदा होते हैं, पर पिस्सू समान्यतया शरीर के निचले भाग को प्रभावित करते हैं। इसका उपचार माइट्स के जैसा ही होता है।

डॉ आर के सिंह,
अध्यक्ष कृषि विज्ञान केंद्र बरेली
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