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खेती का नाश नही सत्यानाश
Submitted by Aksh on 29 June, 2019 - 18:57भारत की अर्थव्यवस्था कृषि आधारित अर्थव्यवस्था है | देश के ग्रामीण इलाकों में रहनेवाली आबादी भारी तौर पर कृषि पर ही आधारित है | इस देश का किसान अपनी मेहनत और परिश्रम के बल पर अनाज उगाता है, उसे सींचता है फिर भी उनकी मेहनत का मूल्य उपजाने में लगी लागत से भी कम मिलता है| अब कृषि फायदे का सौदा नहीं रहा| लोग कृषि से दूसरी क्षेत्र की ओर पलायन को मजबूर हो रहे हैं| कृषि पर निर्भर रहनेवाले लोगों की तादाद तेजी से घाट रही है | देश में 45 फीसदी यानी आधे से भी कम लोग कृषि पर निर्भर है | देश का 64% क्षेत्र खेती के लिए मानसून और बारिश की मेहरबानी पर निर्भर है | आबादी बढ़ रही है, खाधान्नों की मांग बढ़ रही है
जैविक कृषि : कृषि विचार मन्थन से अमृत तत्व
Submitted by Aksh on 21 May, 2019 - 19:35किसी भी कार्य की दिशा में बढाया गया प्रथम कदम सबसे ज्यादा महत्वपूर्ण होता है, क्योंकि प्रथम कदम मार्ग को प्रशस्त करता है।
समय तथा हमारा जीवन हमसे अपेक्षा करता है कि हम स्वयं का ध्यान रखें तथा ध्यान हम तभी रख सकते हैं जब हमारा आहार शुध्द हो एवं शुध्द आहार के लिए कृषि (खेती) पर ध्यान अत्यन्त महत्वपूर्ण हैं।
भारतवर्ष में प्रायः खेती मानसून पर आधारित रहती है। यदि मानसून अच्छा रहा तो कृषि अच्छी रहेगी और यदि कृषि अच्छी रही तो बाजार की स्थिति भी मजबूत रहेगी।
जल ,जंगल और जमीन को लेकर हो सकता है तीसरा विश्व युद्ध
Submitted by Aksh on 15 February, 2019 - 19:17जल ,जंगल और जमीन को लेकर हो सकता है तीसरा विश्व युद्ध ऐसे कयास बहुत ही दिनों से लगाये जा रहे हैं लेकिन कब होगा ऐसा निश्चित रूप में कह पाना मुश्किल है।केपटाउन में पानी खत्म हो ने के बाद यह सत्य होता नजर आ रहा है कि 2040 के लगभग जब दुनिया के अधिकतर बड़े शहरों में पानी खत्म हो जाएगा और इस दौड़ में भारत के भी बहुत से शहर गिनती में हैं।
जैविक कीटनाशक अपनाकर पानी प्रदूषण से बचाएं
Submitted by Aksh on 13 January, 2019 - 20:02विकास की अंधी दौड़ में हमने अपनी परम्परागत खेती को छोड़कर आधुनिक कही जाने वाली खेती को अपनाया। हमारे बीज- हमारी खाद- हमारे जानवर सबको छोड़ हमने अपनाये उन्नत कहे जाने वाले बीज, रसायनिक खाद और तथाकथित उन्नत नस्ल के जानवर। नतीजा, स्वावलम्बी और आत्मनिर्भर किसान खाद, बीज, दवाई बेचने वालों से लेकर पानी बेचने वालों और कर्जा बांटने वालों तक के चँगुल में फंस गये। यहां तक की उन्नत खेती और कर्ज के चंगुल में फँसे कई किसान आत्म हत्या करने तक मजबूर हो गये । खेती में लगने वाले लागत और होने वाला लाभ भी बड़ा सवाल है, किन्तु खेती केवल और केवल लागत और लाभ ही नहीं है हमारे समाज और बच्चों का पोषण, मिट्टी की गुण






