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खेतों से थाली तक पहुंचा ‘स्लो पॉयज़न’

कीटनाशकों और रसायनों के अंधाधुंध इस्तेमाल से जहां कृषि भूमि के बंजर होने का खतरा पैदा हो गया है, वहीं कृषि उत्पाद भी जहरीले हो गए हैं। अनाज ही नहीं, दलहन, फल और सब्जियों में भी रसायनों के विषैले तत्व पाए गए हैं, जो स्वास्थ्य के लिए बेहद हानिकारक हैं। इसके बावजूद अधिक उत्पादन की लालसा में देश में डीडीटी जैसे प्रतिबंधित कीटनाशकों का इस्तेमाल धड़ल्ले से जारी है। अकेले हरियाणा की कृषि भूमि हर साल एक हजार रुपए से ज्यादा के कीटनाशक निगल जाती है।

चौधरी चरण सिंह हरियाणा कृषि विश्वविद्यालय के कीट विज्ञान विभाग के वैज्ञानिकों ने कीटनाशकों के अत्यधिक इस्तेमाल से कृषि भूमि पर होने वाले असर को जांचने के लिए मिट्टी के 50 नमूने लिए। ये नमूने उन इलाकों से लिए गए थे, जहां कपास की फसल उगाई गई थी और उन पर कीटनाशकों का कई बार छिड़काव किया गया था। इसके साथ ही उन इलाकों के भी नमूने लिए गए, जहां कपास उगाई गई थी, लेकिन वहां कीटनाशकों का छिड़काव नहीं किया गया था। इन दोनों ही तरह के मिट्टी के नमूनों के परीक्षण में पाया गया कि कीटनाशकों के छिड़काव वाली कपास के खेत की मिट्टी में छह प्रकार के कीटनाशकों के तत्व पाए गए, जिनमें मेटासिस्टोक्स, एंडोसल्फान, साइपरमैथरीन, क्लोरो पाइरीफास, क्वीनलफास और ट्राइजोफास शामिल हैं। मिट्टी में इन कीटनाशकों की मात्रा 0.01 से 0.1 पीपीएम पाई गई। इन कीटनाशकों का इस्तेमाल कपास को विभिन्न प्रकार के कीटों और रोगों से बचाने के लिए किया जाता है। प्रदेश में वर्ष 1970-71 में कीटनाशकों की खपत महज 412 टन थी, 1990-91 में बढ़कर 5164 टन हो गई है। कीटनाशकों की लगातार बढ़ती खपत से कृषि वैज्ञानिक भी हैरान और चिंतित हैं। कीटनाशकों से जल प्रदूषण भी बढ़ रहा है। इस प्रदूषित जल से फल और सब्जियों का उत्पादन तो बढ़ जाता है, लेकिन उनके हानिकारक तत्व फलों और सब्जियों में समा जाते हैं।

कृषि वैज्ञानिकों का कहना है कि मिट्टी में कीटनाशकों के अवशेषों का होना भविष्य में घातक सिध्द होगा, क्योंकि मिट्टी के जहरीला होने से सर्वाधिक असर केंचुओं की तादाद पर पड़ेगा। इससे भूमि की उर्वरा शक्ति क्षीण होगी और फसलों की उत्पादकता पर भी प्रभावित होगी। साथ ही मिट्टी में कीटना इन अवशेषों का सीधा असर फसलों की उत्पादकता पर पड़ेगा। साथ ही मिट्टी में कीटनाशकों के अवशेषों की मौजूदगी का असर जैविक प्रक्रियाओं पर भी पड़ेगा। उन्होंने बताया कि यूरिया खाद को पौधे सीधे तौर पर अवशोषित ही कर सकते। इसके लिए यूरिया को नाइट्रेट में बदलने का कार्य विशेष प्रकार के बैक्टीरिया द्वारा किया जाता है। अगर भूमि जहरीली हो गई तो बैक्टीरिया की तादाद पर प्रभावित होगी।

स्वासथ्‍य विशेषज्ञों का कहना है कि जहरीले रसायन अनाज, दलहन और फल-सब्जियों के साथ मानव शरीर में प्रवेश कर रहे हैं। फलों और सब्जियों अच्छी तरह से धोने से इनका ऊपरी आवरण तो स्वच्छ कर लिया जाता है, लेकिन इनमें मौजूद विषैले तत्वों को अपने भोजन से दूर करने का कोई तरीका नहीं है। इसी स्लो पॉयजन से लोग कैंसर, एलर्जी, हार्ट, पेट, शुगर, रक्त विकार और आंखों की बीमारियों के शिकार हो रहे हैं।

इतना ही नहीं, पशुओं को लगाए जाने वाले ऑक्सीटॉक्सिन के इंजेक्शन से दूध भी जहरीला होता जा रहा है। अब तो यह इंजेक्शन फल और सब्जियों के पौधों और बेलों में भी धड़ल्ले से लगाया जा रहा है। ऑक्सीटॉक्सिन के तत्व वाले दूध, फल और सब्जियों से पुरुषों में नपुंसकता और महिलाओं में बांझपन जैसी बीमारियां बढ़ रही हैं।

बहरहाल, मौजूदा दौर में कीटनाशकों के पर पूरी तरह पाबंदी लगाना मुमकिन नहीं, लेकिन इतना जरूर है कि इनका इस्तेमाल सही समय पर और सही मात्रा में किया जाए।

-फ़िरदौस ख़ान