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रायगढ़ के खेतों की उपजाउ मिट्टी हो रही अम्लीय

रायगढ़ के खेतों की उपजाउ मिट्टी हो रही अम्लीय

कृषि विभाग द्वारा की जा रही मृदा सैंपल की जांच में चौंकाने वाले खुलासे हो रहे हैं। जिले के उपजाउ मिट्टी में सबसे ज्यादा अम्ल की मात्रा पाई जा रही है। विभाग द्वारा अब तक 10 हजार मिट्टी का सैंपल परीक्षण किया जा चुका है जिसमें करीब 80 प्रतिशत मृदा अम्लीय है। इससे विभाग असमंजस में है और इस सोच में है कि किस प्रकार क्षारीय मिट्टी को उपजाउ बनाया जाए। इस प्रतिशत को देखते हुए इसकी रिपोर्ट सरकार को वृहद कार्ययोजना के लिए अनुशंसा की जाएगी।

रबी की फसल की बुबाई के समय रखें सावधानियाँ

रबी की फसल की बुबाई के समय रखें सावधानियाँ

इन फसलों की बोआई के समय कम तापमान तथा पकते समय शुष्क और गर्म वातावरण की आवश्यकता होती हैं। ये फसलें सामान्यतः अक्टूबर-नवम्बर के महिनों में बोई जाती हैं। रबी में सिंचाई के लिए हमें नलकूप तालाब कुवे और भूमिगत जल संसाधनों पर आश्रित रहना पड़ता हैं । इस बार रबी के मौसम में  सूखे की संभावना बहुत हैं इस लिए किसान भाई अपनी खेती की कार्य योजना बहुत सोच समझ के बना नी हैं ।
फसल के अच्छे उत्पादन के लिए इस प्रकार योजना बनाये

रसायन खेती का अन्तिम विकल्प नही है

रसायन खेती का अन्तिम विकल्प नही है

हमारे यहाँ एक कहावत कही जाती है जान के मक्खी नही निगली जाती है हम लोग जब कोई सामान खरीद्नें जाते हैं तो उसके बारे में तमाम सवाल दुकान वाले से करते हैं जबकि वह सामान की आयु एक साल दो साल अधिक से अधिक दस बीस साल होगी । लेकिन हम अपनी जिन्दगी का सौदा बिना सोचे बिना समझे करते है जो अन्न हम खाते हैं अपने परिवार को खिलाते हैं उसमें अंधाधुंध जहर मिलाते हैं । 

प्राचीन काल में राजा-महाराजा को मारने के लिए षडयंत्रकारी लोग राजा के रसोईए से मिलकर, राजा के भोजन में धीमी गति से फैलने वाला ज़हर मिलवा देते थे । परन्तु आजकल हम सब कुछ जानते हुए भी आँखे बंद करके इस ज़हर का सेवन करते हैं । 

अब गेहूं की पैदावार होगी 30 से 44 क्विंटल प्रति हेक्टेयर

अब गेहूं की पैदावार होगी 30 से 44 क्विंटल प्रति हेक्टेयर

भारतीय कृषि अनुसंधान संस्थान (आईएआरआई) के इंदौर स्थित क्षेत्रीय केंद्र ने देश के अलग-अलग भूभागों के लिये गेहूं की दो नयी प्रजातियां विकसित की हैं.

आईएआरआई के क्षेत्रीय केंद्र के प्रधान वैज्ञानिक (कृषि विस्तार) डॉ. अनिल कुमार सिंह ने बताया कि इस केंद्र की विकसित नयी गेहूं प्रजाति ‘पूसा उजाला’ की पहचान ऐसे प्रायद्वीपीय क्षेत्रों के लिये की गयी है जहां सिंचाई की सीमित सुविधाएं उपलब्ध होती हैं. इस प्रजाति से एक-दो सिंचाई में 30 से 44 क्विंटल प्रति हेक्टेयर की पैदावार ली जा सकती है.

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