मन, विचार और कर्म में सूखा
Submitted by Aksh on 5 May, 2016 - 13:13चार सदी पहले ही लोककवि 'घाघ" कह गए थे कि 'खेत बेपनियां जोतो तब, ऊपर कुंआ खुदाओ जब", यानी किसान पहले कुंआ खोदे (यानी सिंचाई का समुचित इंतजाम कर ले), फिर उसके बाद ही खेत को जोते। तब गंगा, जमुना, गोदावरी, सिंधु, कावेरी जैसी नदियों में भी साफ शीतल जल छलकता था और दूरदराज के इलाकों में भी कुंआ खोदते ही पानी मिल जाया करता था। लेकिन आजादी के बाद जब किसान उत्पादक के बजाय महज एक वोट बैंक बन गया तो चुनाव-दर-चुनाव हर राजनीतिक पार्टी किसानों को मुफ्त बिजली-पानी देने के वादे करने लगी। जल कभी भी भुनाया जा सकने वाला चेक है, ऐसा मान लिए जाने से आदतें और बिगड़ गईं।






