Error message

  • Deprecated function: Using ${var} in strings is deprecated, use {$var} instead in include_once() (line 1065 of includes/theme.inc).
  • Deprecated function: Using ${var} in strings is deprecated, use {$var} instead in include_once() (line 1065 of includes/theme.inc).
  • Deprecated function: Using ${var} in strings is deprecated, use {$var} instead in include_once() (line 1065 of includes/theme.inc).
  • Deprecated function: Using ${var} in strings is deprecated, use {$var} instead in include_once() (line 1065 of includes/theme.inc).

मिट्टी

पृथ्वी ऊपरी सतह पर मोटे, मध्यम और बारीक कार्बनिक तथा अकार्बनिक मिश्रित कणों को मृदा (मिट्टी / soil) कहते हैं। ऊपरी सतह पर से मिट्टी हटाने पर प्राय: चट्टान (शैल) पाई जाती है। कभी कभी थोड़ी गहराई पर ही चट्टान मिल जाती है। 'मृदा विज्ञान' (Pedology) भौतिक भूगोल की एक प्रमुख शाखा है जिसमें मृदा के निर्माण, उसकी विशेषताओं एवं धरातल पर उसके वितरण का वैज्ञानिक अध्ययन किया जाता हैं।
यह मानी हुई बात है कि जिस मिट्टी पर प्राकृतिक क्रियाएँ होती है, जल का प्रपात तथा वायु और सूर्यकिरण का संसर्ग होता रहता है, वह कुछ वर्षो में ऐसा रूप धारण कर लेती है जिससे उसके नीचे की भिन्न रूप रंग और गुणवाली मिट्टियों के बहुत से संस्तर हो जाते हैं। यदि हम मिट्टी की ऊपरी सतह पर १० या १२ फुट गहरा गड्ढा खोदें और मिट्टी के पार्श्व का अवलोकन करें, तो हमें नियमित रूप से कई भिन्न रूप रंग, रचना की मिट्टी एक स्तर से दूसरे स्तर तक मिलती जाएगी। वैज्ञानिकों ने इसके तीन ही प्रधान स्तर माने हैं और वे किन-किन कारणों से और किन-किन परिस्थितियों में पाए जाते हैं, इसका भी वर्णन किया है।
जल मिट्टी के ऊपरी संस्तर पर से होते हुए और बहुत से रासायनिक द्रव्यों को लेते हुए नीचे के संस्तर में जाता है और वहाँ मिट्टी के साथ मिलकर अनेक रासायनिक क्रियाओं द्वारा मिट्टी के रंग रूप को बदल देता है। इस तरह ऊपर से द्रव्य आकर नीचे के संस्तर मे जमा हो जाते हैं।
इनमें एक है ऊपरी संस्तर, जिसमें से जल द्वारा विलयन होकर द्रव्य नीचे की ओर जाते हैं, अथवा अवक्षेपण क्रिया द्वारा नीचे के स्तर में जमा हो जाते हैं। इस ऊपरी संस्तर को हम (अ) संस्तर कहते हैं। दूसरा वह संस्तर है, जिसमें ऊपर वर्णन की गई क्रिया द्वारा द्रव्य आकर जमा होते हैं इसे (ब) संस्तर कहते हैं। तीसरा संस्तर उसके नीचे है, जिसमें ऊपर की मिट्टी बनती है, इसे (स) संस्तर कहते है। इस संस्तर को दूसरे शब्दों में पैतृक संस्तर (parent horizon) भी कहा जाता है। यह नाम इसलिये सार्थक है कि इसी संस्तर से ऊपर वाली मिट्टी की उत्पति हुई है। इस संस्तर में चट्टान और उससे बने बड़े-बड़े मलबे (debris) पाए जाते हैं। हर एक संस्तर में [प्राय: (अ) और (ब) संस्तर में] भिन्न-भिन्न संस्तर सम्मिलित रहते हैं। संस्तरों का क्रमबद्ध संबंध दिखलाना अति कठिन समस्या है। इस समस्या को पहले रूस के वैज्ञानिकों ने हल किया था। सबसे कठिन समस्या तब प्रकट होती है जब मिट्टी के ऊपरी संस्तर का कुछ अंश अपरदन (erosion) द्वारा कट जाता है। कभी-कभी तो संपूर्ण (अ) संस्तर का कटाव हो जाता है और (स) संस्तर रह जाता है।
इन संस्तरों के आंतरिक संबंध पर जिस विज्ञान के क्षेत्र में अनुसंधान होता है, उसे मृदाविज्ञान (Pedology) कहते हैं। इस विज्ञान से मिट्टी के वर्गीकरण में अधिक सहायता मिलती है। यह आधुनिक विज्ञान है और इसकी उत्तरोतर उन्नति होती जा रही है। अब यह प्राय: सिद्ध हो गया है कि मिट्टी की ऊपरी सतह के भौतिक और रासायनिक गुणों को जान लेने से ही कृषि को लाभ नहीं हो सकता। पौधों की बढ़ती को जानने के लिये तथा कृषकों को सलाह देने के लिए यह आवश्यक है कि मिट्टी के विभिन्न संस्तरों के भौतिक और रासायनिक गुण तथा इनका परस्पर संबंध जान लिया जाय।
मिट्टी में विभिन्न प्रकार के कण रहते हैं। इनमें जो औसतन न्यून मात्रा के कण हैं, वे ही मिट्टी को उर्वरा बनाने के लिये आवश्यक हैं। इनके कारण मिट्टी की मृदुकण रचना (crumb structure) की उत्पति होती है। इस रचना द्वारा मिट्टी में जल अवशोषण की क्रिया बढ़ जाती है तथा पौधों के लिये अन्य विभिन्न प्रकार के खाद्य पदार्थ भी अवशोषित होते हैं।
मिट्टी के भौतिक गुण मिट्टी की संरचना, जलवायु मिट्टी में स्थित ऊष्मा एवं खनिज पदार्थो पर निर्भर हैं। मिट्टी के कण भिन्न-भिन्न आकार प्रकार के, कोई बड़े तो कोई छोटे और कोई अति सूक्ष्म, होते हैं। बड़े आकार के कण छोटे-छोटे पत्थरों के टुकड़े होते हैं। जैसे जैसे इनपर प्राकृतिक क्रियाएँ होती जाती हैं, बड़े टुकड़े छोटे होते जाते हैं और अंत में बालू, सिल्ट, चिकनी मिट्टी अथवा दोमट मिट्टी के आकार के हो जाते हैं। मिट्टी के बड़े आकार के कण अधिकांश बलुई मिट्टी में पाए जाते हैं और छोटे आकार के कण मटियार मिट्टी में मिलते हैं। इन्हीं दोनों आकार के कणों के मिश्रण से भिन्न-भिन्न प्रकार की मिट्टियाँ बनती हैं और उनके भिन्न-भिन्न भौतिक गुण भी हुआ करते हैं। मिट्टी में स्थित भौतिक गुणों का कृषि विज्ञान से अत्यंत गहरा संबंध है।
मिट्टी के कुछ भौतिक गुण, जैसे आपेक्षिक गुरुत्व, कणविन्यास (structure), कण आकार, (texture), मिट्टी की सुघट्यता और संसंजन, रंग, भार कणांतरिक छिद्र, समूह आदि महत्व के हैं, मिट्टी का आपेक्षिक गुरुत्व दो प्रकार का, एक आभासी (apparent) और दूसरा निरपेक्ष (absolute) होता है।
आभासी आपेक्षिक गुरुत्व मिट्टी के भीतरी भाग में जल तथा वायु के समावेश से प्राप्त होता है, अर्थात् यह मिट्टी के भीतरी स्थित खनिज से मिश्रित जल और वायु का गुरुत्व है। इसलिये इस गुरुत्व की मात्रा निरपेक्ष आपेक्षिक गुरुत्व से कम होती है। किसी ज्ञात आयतन वाली शुष्क मिट्टी के भार और उसी आयतनवाले जल के भार का यह अनुपात है। यह १.४० से १.६८ तक होता है। चिकनी मिट्टी और सिल्ट के कण बहुत छोटे और हल्के होते हैं, इसलिये वे एक दूसरे के साथ सघन नहीं हो पाते। ऐसी मिट्टी का भार कम होता है। मटियार, दोमट तथा सिल्ट मिट्टी का भार जानने के लिये उसे शुष्क बना दिया जाता है, क्योंकि भिन्न-भिन्न प्रकार की मिट्टी में नमी भिन्न प्रकार की होती है। निरपेक्ष आपेक्षिक गुरुत्व मिट्टी के उन भागों से संबंध रखता है जो खनिज तत्व है। इस कारण इसका मान अधिक होता है। निरपेक्ष आपेक्षिक गुरुत्व १.४ से २.६ के बीच में होता है।
मिट्टी के कण समूह बनाते हैं। भिन्न-भिन्न समूह भिन्न-भिन्न प्रकार की मिट्टी उत्पन्न करते हैं। ये कण एक दूसरे के साथ भिन्न-भिन्न प्रकार से मिले हुए हैं और इनका पारस्परिक संबंध दृढ़ तथा व्यवस्थित होता है। कण किसी भी रूप और आकार के हो सकते हैं। मिट्टी की उर्वरता कणों के विन्यास पर निर्भर है। पौधों को हवा और पानी की आवश्यकता होती है और हवा तथा पानी का मिट्टी में रहना कणों के विन्यास पर निर्भर है। ये कण समूह हैं-
(१) एककणीय (single grain),
(२) स्थूलकणीय (massive),
(३) मृदुकणीय (crumb),
(४) दानेदार (granular),
(५) खंडात्मक (fragmentary),
(६) पलवार (mulch),
(७) गिरिदार (nut)
(८) प्रिज़्मीय (prismatic),
(९) स्तंभाकार (columnar),
(१०) परतदार (platy),
(११) गोलाकार (shot) और
(१२) वज्रसारीय (orstein)
हो सकते हैं।
(१) एककणीय विन्यास में कण अधिकांश अलग-अलग रहते हैं। इसमें पानी अधिक देर तक नहीं ठहरता। रेतीली मिट्टी में ऐसा होता है।
(२) स्थूलकणीय में छोटे-छोटे कण मजबूती से इकट्ठे होकर बहुत बड़े बड़े हो जाते हैं। इसमें कणांतरिक छिद्र बहुत कम होते हैं।
(३) मृदुकणीय विन्यास में छोटे-छोटे कणों के परस्पर मिल जाने से मिट्टी बनती है। यह उर्वरा होती है। इसमें जल देर तक ठहरता है।
(४) कणों के परस्पर मिलकर कंकर बनने से दानेदार मिट्टी बनती है। पौधों की वृद्धि के लिये यह विन्यास अच्छा नहीं है।
(५) खंडात्मक बनावट में छोटे-छोटे कण बहुत बड़े ढेलों के समान हो जाते हैं और अनियमित रूप से वितरित रहते हैं। यह बनावट पौधों के लिये अच्छी नहीं है।
(६) पलवार विन्यास कार्बनिक पदार्थों के साथ कणों के मिश्रित होने से बनता है। इसमें कणों की पारस्परिक दूरी कम रहती है और पानी का अवशोषण अधिक होता है।
(७) गिरिदार रचना में छोटे-छोटे कण पत्थर के बड़े-बड़े टुकड़े के आकार को प्राप्त होते हैं। कण आपस में मिलकर बड़े ठोस हो जाते हैं और अनियमित रूप से वितरित रहते हैं। इस रचना में पानी नहीं ठहरता और कार्बनिक पदार्थ की कमी होने के कारण मिट्टी की उर्वरता कम रहती है।
(८) प्रिज्म़ीय बनावट कणों के त्रिकोणिक वितरण पर निर्भर है। वायु और जल की न्यूनता के कारण यह उतनी उपजाऊ नहीं है।
(९) स्तंभाकार रचना में कण एक दूसरे से मिलकर गोलाकार रूप धारण करते हैं और बहुत कठोर मिट्ट बनाते हैं।
(१०) परतदार मिट्टी की रचना अभ्रक में पाई गई परत का रूप धारण करती हैं। मिट्टी के कण परत के रूप में अभ्रक के सट्टश रहते हैं। यह रचना भी पौधों के लिये लाभदायक नहीं है, क्योंकि इसमे जल एक स्थान से दूसरे स्थान तक सरलता से नहीं जा पाता।
(११) गोलाकार रचना कणों के गेंद के समान गोल आकार होने पर बनती है। इसमें कार्बनिक पदार्थ की कमी होने से मिट्टी की उर्वरता कम रहती है।
(१२) वज्रसार विन्यास में मिट्टी के सभी कण एक दूसरे से आकर्षित होकर, परस्पर बहुत मजबूती से बँध जाते हैं। इसके बनने में मिट्टी का लोहा और कैल्सियम बहुत सहायक होते हैं। यह विन्यास पौधों के लिये हानिकारक है, क्योंकि इसमें न तो पौधों की जड़ें बढ़ सकती हैं, न जल का ही संचारण सरलता से हो सकता है तथा न हवा का प्रवेश ही स्वच्छंदता से हो सकता है।

रायगढ़ के खेतों की उपजाउ मिट्टी हो रही अम्लीय

रायगढ़ के खेतों की उपजाउ मिट्टी हो रही अम्लीय

कृषि विभाग द्वारा की जा रही मृदा सैंपल की जांच में चौंकाने वाले खुलासे हो रहे हैं। जिले के उपजाउ मिट्टी में सबसे ज्यादा अम्ल की मात्रा पाई जा रही है। विभाग द्वारा अब तक 10 हजार मिट्टी का सैंपल परीक्षण किया जा चुका है जिसमें करीब 80 प्रतिशत मृदा अम्लीय है। इससे विभाग असमंजस में है और इस सोच में है कि किस प्रकार क्षारीय मिट्टी को उपजाउ बनाया जाए। इस प्रतिशत को देखते हुए इसकी रिपोर्ट सरकार को वृहद कार्ययोजना के लिए अनुशंसा की जाएगी।

52-55 दिनों में तैयार होने वाली मूंग वैज्ञानिकों ने विकसित की

52-55 दिनों में तैयार होने वाली मूंग वैज्ञानिकों ने विकसित की

52-55 दिनों में तैयार होने वाली मूंग वैज्ञानिकों ने विकसित की 
 देश के कृषि वैज्ञानिकों ने मूंग की ऐसी किस्म विकसित की है जो मात्र 52 से 55 दिनों में तैयार हो जाती है। दलहन की खेती में लगने वाला लंबा समय किसानों द्वारा इसे कम अपनाए जाने के प्रमुख कारणों में से एक है।गे हूं के बाद बुवाई कर  सकेंगे 

नई दिल्ली में भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (आईसीएआर) द्वारा आयोजित राष्ट्रीय कृषि सम्मेलन (रबी अभियान 2016-17) के मौके पर वैज्ञानिकों द्वारा तैयार की गई आईपीएम 205-07 किस्म जारी की गई। आम तौर पर इस फसल को तैयार होने में 60 से 100 दिन लगते हैं।

हिन्दुस्तान की मिट्टी में सबसे ज्यादा पैदावार: राधामोहन

हिन्दुस्तान की मिट्टी में सबसे ज्यादा पैदावार: राधामोहन

देश में दलहन-तिलहन की दर्जनों फसलें हैं, जिनकी काफी पैदावार होती है। लगातार अंडा, मछली और दूध उत्पादन में भी ग्रोथ हो रही है। इससे स्पष्ट है कि हिंदुस्तान की मिट्टी में सबसे ज्यादा पैदावार है। यह कहना है केन्द्रीय कृषि मंत्री राधामोहन सिंह का।

सोमवार को इंदिरा गांधी कृषि विवि के आठवें दीक्षांत समारोह में मुख्य अतिथि के रूप में पहुंचे राधामोहन ने कहा कि भारत सरकार ने कृषि शिक्षा का बजट 405 से 570 करोड़ रुपए कर दिया है। 10 नए कृषि विवि की स्थापना की गई है।