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रासायनिक खाद का बेतहाशा उपयोग, उर्वरता बढ़ाने में जमीन हो रही बर्बाद

इन दिनों उत्पादन बढ़ाने के नाम पर किसानों द्वारा रासायनिक खादों का बेतहाशा उपयोग कर रहे हैं। इसके चलते जमीन में अम्लीयता की मात्रा बढ़ती जा रही है, जिसकी वजह धीरे-धीरे जमीन कठोर होती जा रही है। कठोर होने की वजह से जमीन की घुलनशीलता में कमी आ गई है। ऐसे में पौधे पोषक तत्वों का शोषण नहीं कर पा रहे हैं। जिससे उत्पादन में कमी आने की आशंका जताई जा रही है।

देश के अधिकांश स्थानों की जमीन में अम्ल की मात्रा बढ़ती जा रही है। यह सब हो रहा है उत्पादन बढ़ाने के नाम पर किसान द्वारा किए जा रहे रासायनिक खाद के बेहिसाब उपयोग की वजह से। रासायनिक खाद के अधिक उपयोग होने से जमीन कठोर होने लगी है। इससे उत्पादन पर असर पड़ने की बात कही जा रही है। हालांकि उत्पादन बढ़ाने के नाम पर ही इसका प्रयोग किया जा रहा है।

ऐसे में उत्पादन पर असर तो पड़ नहीं रहा, अलबत्ता जमीन की उरर्वता जरूर प्रभावित हो रही है। वहीं अम्लीयता बढ़ने की वजह से जमीन की धुलनशीलता में भी कमी आती जा रही है। इससे पौधे पोषक तत्वों को ग्रहण नहीं कर पा रहे हैं। हालात यह है कि पौधे कमजोर हो रहे हैं और इसका असर उत्पादन पर पड़ रहा है। खास बात यह है कि कृषि विभाग के अधिकारी उत्पादन घटने की बात को स्वीकार तो करते नहीं, लेकिन रासायनिक खाद से जमीन की उवर्रता घटने को स्वीकारने से हिचक रहे हैं।

बताया जाता है कि सभी ब्लॉकों में किसानों की मिट्टी लेकर जांच कराई जाती है।

स्फूर कहीं कम तो कहीं मध्यम

स्फूर की बात करें तो किसी ब्लॉक में इसकी मात्रा कम है तो किसी ब्लॉक में मध्यम है। कृषि विभाग के अधिकारियों की मानें तो जमीन में मौजूद स्फूर पौधे की जड़ का विकास करते हैं। इसकी कमी होने से पौधे की जड़ कमजोर हो जाती है और जड़ कमजोर होने से पौधे कमजोर हो जाते हैं। इससे उत्पादन में कमी होने की आशंका जताई जाती है। खास बात यह है कि किसी भी जमीन में उत्पादकता बनी रहे, इसके लिए नत्रजन, फॉस्फोरस व स्फूर की मात्रा बराबर होना चाहिए। इसका वैज्ञानिक मानक स्तर जमीन में 80 फीसद नत्रजन, 60 फीसद स्फूर व 40 फीसद पोटास का होना जरूरी है। इसे स्टैंडर्ड मानक कहा जाता है। इस मात्रा में कमी उत्पादन पर असर डालती है।

जैविक खाद इसका उपाय

रासायनिक खाद की बजाए जैविक खाद इसका उपाय है। हालांकि जैविक खाद का उपयोग किसान भी करना नहीं चाहते। बताया जाता है कि पहले केवल गोबर खाद का उपयोग किया जाता था, लेकिन अब पशुपालन नहीं करते इसके कारण गोबर खाद नहीं मिलती है। ऐसे में उत्पादन बढ़ाने के लिए किसान रासायनिक खाद का उपयोग करते हैं। अधिक मात्रा में इस खाद का उपयोग करने से जमीन की उर्वरा शक्ति क्षीण होती जाती है। साथ ही जमीन कठोर होने लगती है। इससे उत्पादन पर असर पड़ता है।लेकिन जिन किसानों के पास गोबर या कचड़े की खाद नही है वह साडावीर का प्रयोग सभी फसलों पर करें।

जागरुकता का अभाव

किसानों की जागरुकता भी इसका एक कारण मानी जाती है। बताया जाता है कि जैविक खेती के लिए शासन की ओर से अनुदान दिया जाता है। इसके बाद भी किसान इसका उपयोग नहीं करते। कृषि विभाग के अधिकारियों द्वारा जमीन में नत्रजन, पोटास व स्फूर की कमी को दूर करने के लिए रासायनिक खाद का उपयोग करने के लिए कहा जाता है। इसके कारण किसान भी अधिकारियों की सलाह पर रासायनिक खाद का उपयोग करते हैं। हालांकि अधिकारियों द्वारा संतुलित मात्रा में खाद डालने की सलाह दी जाती है, लेकिन उत्पादन बढ़ाने के नाम पर किसान जरूरत से ज्यादा खाद डाल देते हैं। इससे जमीन में रासायनिक खाद की अधिकता हो जाती है और जमीन कठोर हो जाती है।

नहीं बदलते फसल

वैज्ञानिकों द्वारा किसानों को हमेशा फसल बदलने की सलाह दी जाती है, लेकिन वे नहीं मानते है। अधिकारियों की माने तो पहले धान की फसल लगाने के बाद उस खेत पर सुखी फसल लगानी चाहिए। इससे जमीन की पोषक तत्वों को पौधे बराबर मात्रा में शोषित करते हैं। बताया जाता है कि धान के बाद किसान धान की फसल ही लगा लेते हैं। इससे जमीन की उर्वरता में कमी आ जाती है।

जमीन में जिन भी तत्वों की कमी होती है उसकी आपूर्ति रासायनिक खाद से की जाती है। जिले में कहीं भी उत्पादन कम नहीं हुआ है।

गयाराम उप संचालक, कृषि