Aksh's blog

देश की कृषि व्यवस्था फसी बड़े संकट में

देश की कृषि व्यवस्था फसी बड़े संकट में

भारत में विकास का जो प्रारूप विकसित हुआ, उसमें मनुष्य के साथ प्रत्येक जीव व् जड़ प्रकृति की आवश्यकताओं का ध्यान रखा गया था। मनुष्य के केवल भौतिक पक्ष  की ही चिंता करने की बजाए उसके सामाजिक, मानसिक और आत्मिक पक्षो की भी चिंता की गई थी। केवल  मनुष्य को सुख-सुविधाओं से लैस करने की कभी कोई योजना अपने यहां नहीं बनाई गई, इसलिए देश में एक मुहावरा प्रचलित हुआ "उत्तम खेती, मध्यम बान; निकृष्ट  चाकरी, भीख निदान" इसका अर्थ बहुत साफ़ है। नौकरी करने को अपने देश में एक मुहावरा के तौर पर लिया गया अर्थात् नौकरी को कभी महत्ता नहीं दी गई। पशु,भूमि और मनुष्य इस प्रकार पूरी प्रकृति मात्र का पोषण करने वाली खेती को

आखिर किसान ही सभी वर्ग के निशाने पर क्यों हैं ?

आखिर किसान ही सभी वर्ग के निशाने पर क्यों हैं ?

सरकार ने हाल ही में उच्चतम न्यायालय में स्वीकार किया कि मुख्य रूप से नुकसान और कर्ज की वजह से पिछले चार वर्षों में लगभग 48,000 किसान अपनी ज़िन्दगी खत्म कर चुके हैं। सरकार के राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो (एनसीआरबी) के आँकड़ों से पता चलता है कि यही प्रवृत्ति 1997-2012 के दौरान रही, इस दौरान करीब 2,50,000 किसानों ने अपना जीवन गँवाया, इस अवधि के बाद सरकार विवरण देना बंद कर दिया। खर्चों को पूरा करने के लिए किसानों को बैंकों से या स्थानीय ऋणदाताओं से अपनी फसलों को बोने के लिए उधार लेना पड़ता है। ज़्यादातर मामलों में स्थानीय ऋणदाता होते हैं जो कर्ज देते हैं। एनएसएसओ आँकड़ों के मुताबिक 52% से अधिक

भारतीय गोवंश विशेष क्यों ?

आखिर भारतीय गोवंश विशेष क्यों ?

बार बार यह सवाल उठता रहा है कि पशुपालन में गौ पालन सर्वश्रेष्ठ, उसमे भी भारतीय गौ वंश ही क्यों? आखिर हमारे देश में गौ को माता का दर्जा क्यों दिया जाता है।?क्यों सभी विशेषज्ञ भारतीय गौवंश का दूध उत्तम बताते हैं?इन सभी सवालों का जवाब मथुरा के ‘पशु चिकित्सा विश्वविद्यालय एवं गौ अनुसंधान संस्थान’ में नेशनल ब्यूरो ऑफ जैनेटिक रिसोर्सेज, करनाल (नेशनल काउंसिल आफ एग्रीकल्चर रिसर्च - भारत सरकार) के वरिष्ठ वैज्ञानिक डॉ. देवेन्द्र सदाना द्वारा एक प्रस्तुति 4 सितम्बर को दी गई। मथुरा विश्वविद्यालय के वैज्ञानिकों के सामने दी गई प्रस्तुति में डॉ.

देश कब तक कृषि और किसानों की अनदेखी करता रहेगा

देश कब तक कृषि और किसानों की अनदेखी करता रहेगा

इस बात में कोई संदेह नहीं कि देश को एक गंभीर कृषि संकट का सामना करना पड़ रहा है। हर वर्ष उर्वरक और बीजों जैसे कृषि इनपुट्स की कीमतें बढ़ती जबकि खेती से आय कम होती जा रही है। इसके साथ ही जोत का आकार लगातार सिकुड़ता जा रहा है। ग्रामीण युवकों की बेरोजगारी में बहुत अधिक उछाल आया है। कृषि अब लाभदायक धंधा नहीं रह गया। दूसरी ओर युवकों के लिए रोजगार के अवसर बहुत कम रह गए हैं। यही स्थिति हताशा और आक्रोश को हवा दे रही है। सरकारी आंकड़ों के अनुसार देश भर में आत्महत्याएं करने वाले किसानों की संख्या गत वर्ष 12,000 का आंकड़ा पार कर गई थी। वास्तव में कुछ वर्ष पूर्व तो स्थिति इससे भी बदतर थी। गत 2 वर्षों स

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