बीजोपचार से फसलोत्पादन का नुकसान कम होगा

बीजोपचार से फसलोत्पादन का नुकसान कम होगा

 खरीफ का मौसम प्रारम्भ हो गया है और किसानों की व्यस्तता बढ़ गई है। पिछले वर्षों की भांति किसान किसी प्रकार खेती के प्रमुख निवेशों, जैसे बीज, खाद, पानी, कृषि यंत्रों आदि की व्यवस्था कर पाए हैं ताकि समय से फसल की बुआई हो जाए।
इतनी मेहनत करने के बावजूद अच्छी उपज की सुनिश्चितता तय कर पाना उनके लिए असंभव प्रतीत होता है। फसलों के रोग और कीड़े अनुकूल मौसम पाने पर भारी नुकसान करते हैं और किसान की सारी मेहनत पर पानी फेर देते हैं। ऐसे में आवश्यक है कि उन बिन्दुओं पर ध्यान दिया जाय जहां कम मेहनत, कम पैसा तथा कम समय में इन शत्रुजीवों से फसल को बचाना संभव हो सके। बीज उपचार एक ऐसा मंत्र
है जो इस कसौटी पर खरा उतरता है क्योंकि फसलों के शत्रुजीवों के प्रति इसमें जैविक अथवा रासायनिक अवरोध होता है।
वर्तमान समय में किसान लगभग 70 प्रतिशत बीज अपनी पिछली फसल के उत्पाद से प्राप्त करते हैं और गुणवत्तापूर्वक बीजों की देश में भारी कमी है। किसान द्वारा पिछली फसल से बनाए गए बीजों का प्रयोग रोग तथा कीट की समस्या में वृद्धि करता है और किसान को वांछित उत्पादन नहीं मिल पाता। यदि इन्हीं बीजों को उपचारित कर लिया जाए तो फसल सुरक्षा की प्रमुख समस्याओं का समाधान बुआई के पूर्व ही हो जाता है। 
बीज उपचार शुष्क अथवा गीले, दोनों प्रकार से ही किया जाता है। शुष्क बीज उपचार के लिए एक घड़े में उचित मात्रा में बीज ले लें। इसमें बीज के अनुसार उचित मात्रा में संस्तुत रसायन अथवा जैविक एजेण्ट का चूर्ण डाल दें। घड़े का मुंह कपड़े से अच्छी प्रकार बांध दें तथा उसे गोल-गोल घुमाएं। इस प्रकार 10-15 मिनट तक घुमाने से बीजों के ऊपर दवा की पतली परत चढ़ जाती है जो इसे सुरक्षा प्रदान करती है। गीले बीज उपचार में रसायन अथवा जैविक एजेण्ट का लेप बनाकर उसे पॉलीथीन की चादर के ऊपर पतली परत में फैलाए गए बीजों के ऊपर छिड़क देते हैं तथा किसी डण्डे आदि से चलाकर लेप को बीजों में भली प्रकार मिला देते हैं। इसके अलावा कुछ मामलों में रसायन के घोल में बीजों को 10-15 मिनट या कभी-कभी कुछ घण्टों तक डुबाकर रखा जाता है।

खरीफ की प्रमुख फसलें व उनकी बीजोपचार की विधि
मक्का
मृदा जनित एवं बीज जनित रोगों से रक्षा के लिए मक्के के बीजों को ट्राइकोडर्मा वीरडी-टी हारजियानम 8-10 ग्राम/किग्रा बीज की दर से शोधित करें।
मूंगफली
तना सडऩ, बीज सडऩ, पौध सडऩ जैसे रोगों से फसल को बचाने के लिए बीजों का अरण्डी की खली 1000 किग्रा/हेक्टेयर या नीम की खली का मृदा में बुआई से पहले प्रयोग करें। ट्राइकोडर्मा वीरडी का 8-10 ग्राम/किग्रा बीज की दर से प्रयोग कर बीजों का शोधन करें।
धान
जड़ सडऩ एवं अन्य कीट से सुरक्षा के लिए ट्राइकोडर्मा 5-10 ग्राम/किग्रा बीज की दर से बुआई से पहले शोधन करें। क्लोरापायरीफॉस 30 ग्राम/10 किग्रा बीज की दर से शोधन कर सकते हैं।
मिर्च
श्यामवर्ण से बचाव के लिए ट्राइकोडर्मा वीरडी की 4 ग्राम/किग्रा की दर से बीजोपचार करना चाहिए। बीजोपचार के लिए कार्बेन्डाजिम की एक ग्राम/100 ग्राम बीज की दर का भी प्रयोग किया जा सकता है।
अरहर
उकठा एवं अंगमारी जैसे रोगों के इलाज के लिए 8-10 ग्राम/किग्रा बीज की दर से ट्राइकोडर्मा का प्रयोग करके बीजोपचार करें।
बाजरा
मृदा जनित रोगों से फसल को बचाने के लिए ट्राइकोडर्मा हारजियानम-टी. वीरडी का प्रयोग 4 ग्राम/किग्रा बीज की दर से बीजोपचार के लिए करें।
तिल
जड़ सडऩ, पौध झुलसा, पर्ण धब्बा जैसे रोगों से फसल के बचाव के लिए ये उपाए अपनाए जा सकते हैं
1. ट्राइकोडर्मा वीरडी का प्रयोग 8-10 ग्राम/किग्रा बीज की दर से, बीजोपचार के लिए
2. थीरम 2-2.5 ग्राम/किग्रा, एग्रीमायसिन-100 (250 पीपीएम) या स्ट्रैप्टोसाइक्लिन घोल 0.05 प्रतिशत का प्रयोग बीज के साथ करें।
ज्वार
बीज जनित रोगों से रक्षा के लिए ट्राइकोडर्मा हारजियानम-टी वीरडी का प्रयोग 4 ग्राम/किग्रा बीज की दर से करें।

स्रोत- 
डॉ. जय पी. राय एवं प्रो. श्रीराम सिंह