कृषि वैज्ञानिकों के अनुसार किसानों को 05 अपैल, 2015 तक निम्न कृषि कार्य करने की सलाह दी जाती है।

1. 3 तथा 4 अपैल को दिल्ली राष्टीय राजधानी के अधिकतर क्षेत्रों में वर्षा होने की सम्भावना को ध्यान में रखते हुए पूर्ण रूप से पके तोरिया या सरसों फसल की अतिशीघ्र कटाई करें। तथा कटी हुए फसल को ढक कर रखें । 75-80 प्रतिशत फली का रंग भूरा होना ही फसल पकने के लक्षण हैं। फलियों के अधिक पकने की स्थिति में दाने झड़ने की संभावना होती है। गहाई के बाद फसल अवशेषों को नष्ट कर दें, इससे कीट की संख्या को कम करने में मदद मिलती है।

बंजर हुई जमीन और घटी पैदावार बेबस किसान

सरकारी नीति में हरित खाद सब्सिडी सिस्टम को बढ़ावा देने की जरूरत है जो खेती को पारंपरिक प्राकृतिक पद्धति पर ले जाते हुए क्षरित, खस्ताहाल और बंजर हो चुकी जमीन की दशा सुधारे। केवल इतना ही नहीं बल्कि रासायनिक उर्वरकों के उत्पादन व प्रयोग का सीधा प्रभाव जलवायु परिवर्तन पर पड़ता है। इनके कारण ग्रीन हाउस गैसों का उत्सर्जन बढ़ रहा है। किसान नाइट्रोजन उर्वरक धड़ल्ले से इसलिए इस्तेमाल कर रहे हैं क्योंकि उस पर सरकारी छूट है और वह सस्ते दामों में उपलब्ध है। अगर सरकार हरित खाद पर यह छूट दे तो वे उसे इस्तेमाल करेंगे। 

किसानों के लिए वरदान थायो यूरिया जैव नियामक

uria tayo niyamak

कृषि में पानी की भूमिका के बारे में हम सभी अच्छी तरह से जानते हैं। किंतु बीते कुछ दशकों से जिस तरह से पानी की मांग में बढ़ोतरी और पानी के संसाधनों में कमी आई है उसे देखते हुए कृषि के सुखद भविष्य के बारे में विश्वासपूर्वक कुछ भी कह पाना कठिन है। साल दर साल मानसून का देरी से आना और निरंतर घटते भूजल ने किसानों और सरकार के समक्ष अनेक यक्ष प्रश्न खड़े कर दिए हैं। ऐसी विकट परिस्थितियों में कृषि विशेषज्ञों ने पानी की कमी से निपटने के लिए ‘थायो यूरिया जैव नियामक’ नामक एक ऐसी तकनीक ईजाद की है जिससे कृषि के लिए पानी की कमी संबंधी समस्या बीते कल की कहानी बनकर रह जाएगी। दूसरे शब्दों मे कहा जा सकता है क

बहुफसलीय खेती की जरुरत

multi crop

हरित क्रांति का अभिशाप झेल रहा पंजाब बहुफसलीय खेती की ओर मुड़ता दिखाई दे रहा है। कृषि वैज्ञानिकों का मानना है कि खेती में विविधता न केवल भूजल स्तर को बनाए रखने के लिए उपयोगी होगी, बल्कि फसलों की पैदावार में जो एकरुपता आ गई है, बल्कि फसलों की पैदावार में जो एकरुपता आ गई है उसे भी विविधता में बदला जा सकता है। हरित क्रांति के बाद प्रचलन में आई कृषि प्रणाली को बदलना इसलिए भी जरुरी हो गया है क्योंकि पंजाब कृशि विश्व विद्यालय की एक रिपोर्ट के मुताबिक पिछले 10 साल में अकेले पंजाब में 7000 से भी ज्यादा किसान आत्महत्या कर चुके हैं। इन बद्तर हालातों के मद्देनजर यह अच्छी बात रही कि पंजाब सरकार ने वैज्

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