केंचुआ खाद से मिट्टी की उत्पादकता को बढ़ाया जा सकता है।

रासायनिक खादों के बुरे असर से निजात दिलाने के लिए  किसानों को केंचुए से बनी खाद(जेविक खाद ) का प्रयोग करना चाहिए !किसानों को जैविक खाद के बारे में उपयोगी जानकारी लेनी चाहिये क्योकि इससे रोजगार के नए मौके मुहैया होंगे। केंचुआ खाद समय की मांग है ! रासायनिक उर्वरकों की वजह से भूमि की उत्पादकता पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है, लेकिन केंचुआ खाद के इस्तेमाल से मिट्टी की उत्पादकता को बढ़ाया जा सकता है।

केमिकल से बंजर बनती जा रही जमीन

 लैब में लिए गए मिट्टी के नमूनों के आधार पर कृषि विशेषज्ञों का कहना है कि खेतों में अच्छी पैदावार लेने के लिए केमिकल फर्टिलाइजर, नमक और कीटनाशक दवाइयों के ज्यादा इस्तेमाल से जमीन बंजर बनती जा रही है। दनकौर इलाके के बिलासपुर कस्बे में जिले की एकमात्र मिट्टी परीक्षण लैब में करीब एक महीने पहले दादरी, बिसरख, दनकौर और जेवर ब्लॉक के करीब 8 हजार खेतों से लिए गए मिट्टी के नमूनों की जांच ने सबको चौंका दिया है।

जैविक खाद बनाकर खत्म कर सकते हैं गाजर घास

खेतों की मेड़, गलियारों और सड़कों के किनारे बहुतायात से उगने वाली गाजर घास दुनिया की सबसे विनाशकारी और आवंछित खर पतवार है। खेती को चौपट कर रही इस घास को जानवर तक नहीं खाते हैं। इसको खत्म करने के लिए अभी तक कोई कारगर दवा भी नहीं बनाई जा सकती है, लेकिन आप इसकी जैविक खाद जरूर बना सकते हैं।

मनुष्यों और पशु दोनों को त्वचा और सांस के रोग देने वाली इस घास को जैविक खाद में तब्दील कर ना सिर्फ खुद को बचाया जा सकता है बल्कि जमीन की उर्वरा शक्ति को भी बढ़ाया जा सकता है। खरपतवार विज्ञान अनुसंधान निदेशालय ने गाजर घास से कम्पोस्ट बनाने की विधि सुझाई है।

भिण्डी की फसल में कीटों से निपटने का जैविक तरीका

श में विभिन्न सब्जियों के बीच भिंडी बड़े पैमाने पर पैदा की जाती है। पिछले कुछ सालों से इसके उत्पादन में थोड़ी कमी आई है जिसका कारण फसल को नुकसान पहुंचाने वाले कीटों, रोगों और सूत्रकृमि में हो रही वृद्धि है। भिण्डी की नरम और कोमल प्रकृति तथा उच्च नमी के कारण इसकी खेती में कीटों व रोगों के हमले की संभावना अधिक रहती है। एक  अनुमान के अनुसार कीटों व रोगों के प्रकोप से कम से कम 35 से 40 प्रतिशत उत्पादन का नुकसान हो सकता है।भी ने भिंडी की खेती को व्यावसायिक रूप से अपनाया है। इन सभी सफल कृषकों की समस्या एक ही है जिससे इन्हें नुकसान उठाना पड़ता है, वो है भिण्डी में लगने वाले रोग व कीट।

Pages