आम की फसल पर भी संकट

बे-मौसम बारिश का असर अन्य फसलों के साथ-साथ आम की फसल पर भी पड़ा है। पहले देर तक ठंड रहने से बौर की सेहत सही नहीं रही, जिससे प्रदेश के आम उत्पादन पर असर पड़ सकता है।आम का गढ़ मलिहाबाद इलाके के मेहमूदपुर गाँव के अजय पाठक (61 वर्ष) की बारिश और चार अप्रैल की सुबह चली आंधी ने चिंता बढ़ा दी है। ”यह साल आम उत्पादकों के लिए मुश्किल भरा रहने वाला है। पहले देर से बौर आया फिर बेमौसम बरसात और आंधी से तमाम बौर झड़ गया है। ऐसे में उत्पादन गिरना लाजिमी है।”

गर्मियों में 50 से 60 दिनों में पैदा होने वाली फसल उगा सकते हैं किसान

बारिश से बर्बाद हुई फसलों से जो नुकसान हुआ है, उसकी भरपाई किसान कम खर्चे और कम अवधि वाली फसलें लगा कर कुछ प्रतिशत तक कर सकते हैं। अप्रैल से जुलाई के बीच लौकी, तोरई, टमाटर, बैगन, लोबिया और मेंथा जैसी फसलें उगाई जा सकती हैं।

बे-मौसम हुई बरसात से प्रदेश भर में गेहूं, दलहन और तिलहन मिला कर कुल 26.62 लाख हेक्टेयर फसल बर्बाद हुई है, जिससे किसानों को कफी नुकसान का सामना करना पड़ा है। ऐसे में कृषि विशेषज्ञों और जागरुक किसानों ने किसान को कम समय ज्यादा उपज देने वाली फसल लगाने की सलाह दी है।

बारिश से तबाह किसानों को मोदी ने दी बड़ी सौगात

बिन मौसम बारिश और ओलावृष्टि से तबाह हुए लाखों किसानों को राहत देते हुए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कई बड़े ऐलान किए। नई व्यवस्था के तहत अब 50 फीसदी की जगह 33 फीसदी फसल खराब होने पर भी किसान मुआवजे के हकदार होंगे।

प्रधानमंत्री ने मुआवजे की राशि में भी 50 फीसदी बढ़ोतरी का ऐलान किया। उन्होंने बैंकों से कहा कि वे बेमौसम बारिश से प्रभावित किसानों के ऋण का पुनर्गठन करें।

साथ ही बीमा कंपनियों से भी किसानों के दावों का निपटान सक्रियता से करने को कहा। किसानों को मुआवजा देने संबंधी प्रावधान में आजादी के बाद पहली बार बदलाव हुआ है।

पानी के प्रबंधन व जैविक खाद के उपयोग से सस्ती होगी खेती

ची से सटे ओरमांझी के दूबराज महतो ऐसे किसान हैं, जिनके पास न खेती के लायक पर्याप्त जमीन है और न ही खेती से जुड़ी अत्याधुनिक जानकारी। दूबराज नेशनल हाइवे 33 के किनारे स्थित किराये की छह एकड़ जमीन पर सब्जियों की खेती करते हैं। इनमें से दो-ढाई एकड़ भूमि ऐसी है, जो तीन-चार साल पहले तक टांड़ हुआ करती थी। दूबराज ने उसे अपनी लगन-मेहनत से समतल व उर्वर बनाया। भू-स्वामी को वे प्रति एकड़ की दर से तीन से चार हजार रुपये सालाना किराया देते हैं। डेढ़ से दो लाख रुपये सालाना वे खेती में खर्च करते हैं। खेत के बगल में ही वे परिवार वालों की मदद से किराना की दुकान चलाते हैं और खेती को भी समय देते हैं। दूबराज साला

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