भिण्डी की फसल में कीटों से निपटने का जैविक तरीका

श में विभिन्न सब्जियों के बीच भिंडी बड़े पैमाने पर पैदा की जाती है। पिछले कुछ सालों से इसके उत्पादन में थोड़ी कमी आई है जिसका कारण फसल को नुकसान पहुंचाने वाले कीटों, रोगों और सूत्रकृमि में हो रही वृद्धि है। भिण्डी की नरम और कोमल प्रकृति तथा उच्च नमी के कारण इसकी खेती में कीटों व रोगों के हमले की संभावना अधिक रहती है। एक  अनुमान के अनुसार कीटों व रोगों के प्रकोप से कम से कम 35 से 40 प्रतिशत उत्पादन का नुकसान हो सकता है।भी ने भिंडी की खेती को व्यावसायिक रूप से अपनाया है। इन सभी सफल कृषकों की समस्या एक ही है जिससे इन्हें नुकसान उठाना पड़ता है, वो है भिण्डी में लगने वाले रोग व कीट।

(आइवीआरआइ) में चार दिवसीय मेले का समापन

भारतीय पशु चिकित्सा अनुसंधान संस्थान (आइवीआरआइ) में चार दिवसीय मेले का शुक्रवार को समापन हो गया। मेले में यूपी, उत्तराखंड के अलावा पंजाब, हरियाणा, हिमांचल प्रदेश, चंडीगढ़ और जम्मू के करीब 15 हजार आए किसान आए। वह आइवीआरआइ से पशुपालन के लिए खोजी तमाम तकनीक से परिचित हुए। साथ ही खेती और पशुपालन के वैज्ञानिकों से अपनी समस्याओं का समाधान भी जाना। जाते-जाते संस्थान से तैयार किए गए करीब साढ़े छह लाख के उत्पादक खरीद ले गए।

आंचलिक कृषि मेले के तीसरा दिन

आंचलिक कृषि मेले के तीसरा  दिन

भारतीय पशु चिकित्सा अनुसंधान संस्थान (आईवीआरआई) इज्जतनगर में आयोजित उत्तर क्षेत्रीय आंचलिक कृषि मेले के तीसरे दिन ग्रामीण महिलाओं की चारा कटाई प्रतियोगिता आकर्षण का केंद्र रही। दो-दो महिलाओं के दो सौ ग्रुप ने इस प्रतियोगिता में भरपूर उत्साह के साथ भाग लेकर पांच किलो पूले का चारा काटने में देर नहीं लगाई। मशीन पर महज 22 सेकेंड में चारा काट देने वाली मुडिया गांव की कमला और सविता की जोड़ी ने प्रथम पुरस्कार हासिल किया। अब्दुल्लापुर की सोमवती और धनदेवी ने 26 सेकेेंड में चारा काट कर दूसरा तथा रूपापुर गांव की महिमा और मंजू ने 31 सेकेंड में चारे की कटाई करके तीसरा पुरस्कार जीता।

जहरीली खेती का जवाब जैविक खेती खेती

जो जमीन हमारा भरण-पोषण करती है उसमें अच्छी पैदावार के लिए रासायनिक खाद और कीटनाशकों के रूप में जहर डाल दिया गया है। इसलिए जो फसल हो रही है उसके दानों में जीवन कम जहर अधिक समा गया है। जो अन्न हम ग्रहण कर रहे हैं वह पोषण न देकर स्वास्थ्य को बिगाड़ रहा है। इसलिए जैविक या प्राकृतिक खेती पर ज्यादा जोर दिया जाने लगा है। 

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