Organic Farming

गौवंश जीवामृत बनाने की विधि

(अ) घन जीवामृत (एक एकड़ खेत के लिए)
सामग्री :-
1. 100 किलोग्राम गाय का गोबर
2. 1 किलोग्राम गुड/फलों का गुदा की चटनी
3. 2 किलोग्राम बेसन (चना, उड़द, अरहर, मूंग)
4. 50 ग्राम मेड़ या जंगल की मिट्टी 
5. 1 लीटर गौमूत्र
बनाने की विधि :- 

एक आसन प्रणाली श्री विधि से धान की खेती

कैरिबियन देश मेडागास्कर में 1983 में फादर हेनरी डी लाउलेनी ने इस तकनीक का आविष्कार किया था। श्री पद्धति धान उत्पादन की एक तकनीक है जिसके द्वारा पानी के बहुत कम प्रयोग से भी धान का बहुत अच्छा उत्पादन सम्भव होता है। इसे सघन धान प्रनाली (System of Rice Intensification-SRI या श्री पद्धति) के नाम से भी जाना जाता है। जहां पारंपरिक तकनीक में धान के पौधों को पानी से लबालब भरे खेतों में उगाया जाता है, वहीं मेडागास्कर तकनीक में पौधों की जड़ों में नमी बरकरार रखना ही पर्याप्त होता है, लेकिन सिंचाई के पुख्ता इंतजाम जरूरी हैं, ताकि जरूरत पड़ने पर फसल की सिंचाई की जा सके। सामान्यत: जमीन पर दरारें उभरने पर

सौंफ़ की उन्नत खेती

सौंफ का वानस्पतिक नाम है Foeniculum vulgare । यह व्यावसायिक रूप से एक वार्षिक जड़ी बूटी के रूप में खेती की जाती है, जो एक मोटा और सुगंधित मसाला फसल है। सौंफ़ देश के विभिन्न भागों में विभिन्न नामों से जाना जाता है। हिंदी में, सौंफ 'saunf' के रूप में जाना जाता है और तमिल में यह perungeerakam 'के रूप में जाना जाता है। भारत में सौंफ के प्रमुख उत्पादन केन्द्रों राजस्थान, आंध्र प्रदेश, पंजाब, मध्य प्रदेश, उत्तर प्रदेश, गुजरात, कर्नाटक और हरियाणा रहे हैं।

पपीता का उन्नत जैविक खेती

जलवायु -
पपीता यद्यपि उष्ण जलवायु का पौधा है , फिर भी यह उपोष्ण जलवायु में अच्छी तरह उगाया जाता है इसका उत्पादन समुद्र तल से 100 मीटर कि उचाई तक सुगमता से होता है . 12 डिग्री से . से नीचे का तापमान इसकी उत्पादकता को प्रभावित करता है . इसके लिए 20-25 डिग्री से . तापक्रम . उचित रहता है . जल भराव , ओला तथा अधिक तेज हवाएं इसे नुकसान है पहुंचाती .

तेजपत्ता ( दालचीनी) की जैविक उन्नत खेती

Kisanhelp.in खेती और कृषि मुद्दों से संबंधित मुद्दों का सामना कर रहे किसानों को कृषि तकनीक को समझने में किसानों की मदद करने वाली वेबसाइट हैं ।

वैज्ञानिक नाम

 

सिनामोममतमाला

 

 कुल

लोरेसी

अन्य नाम

 

दालचीनी, तमालका, इंडियन केसिया

प्राप्ति स्थान

 

हिमाचल प्रदेश, उत्तराखण्ड, जम्मू कश्मीर, सिक्किम तथा अरुणाचल प्रदेश

पादप परिचय

 

यह एक सीधा बहुवर्षिय पेड़ होता है इसके पेड़ 100 वर्षो तक उपज देते हैं तथा लागत कम लगा कर अच्छा लाभ मिलता है।

गौ वंश जैविक पंचगव्य का प्रयोग एवं महत्व

1. पंचगव्य

पंचगव्य , एक कार्बनिक उत्पाद विकास को बढ़ावा देने और संयंत्र प्रणाली में उन्मुक्ति प्रदान करने की भूमिका निभाने की क्षमता है। पंचगव्य नौ उत्पादों अर्थात के होते हैं। गाय के गोबर , गोमूत्र , दूध, दही , गुड़ , घी , केला, टेंडर नारियल और पानी। उपयुक्त रूप से मिलाया जाता है और इस्तेमाल किया, इन चमत्कारी प्रभाव है।

गाय के गोबर - 7 किलो
गाय घी - 1 किलो
सुबह और शाम के समय में ऊपर के दो मुद्दों को अच्छी तरह से दोनों मिक्स और 3 दिन के लिए रखना

हल्दी की उन्नत जैविक खेती

हल्दी जिंजिवरेंसी कुल का पौधा हैं। इसका का वानस्पतिक नाम कुर्कमा लांगा हैं। इसकी उत्पत्ति दक्षिण पूर्व एशिया में हुई हैं। हल्दी का उपयोग प्राचीनकाल से विभिन्न रूपों में किया जाता आ रहा हैं, क्योंकि इसमें रंग महक एवं औषधीय गुण पाये जाते हैं। हल्दी में जैव संरक्षण एवं जैव विनाश दोनों ही गुण विद्यमान हैं, क्योंकि यह तंतुओं की सुरक्षा एवं जीवाणु (वैक्टीरिया) को मारता है। इसका उपयोग औषधीय रूप में होने के साथ-साथ समाज में सभी शुभकार्यों में इसका उपयोग बहुत प्राचीनकाल से हो रहा है। वर्तमान समय में प्रसाधन के सर्वोत्तम उत्पाद हल्दी से ही बनाये जा रहे हैं। हल्दी में कुर्कमिन पाया जाता हैं तथा इससे ए

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