Organic Farming

जायद में दलहन की फसल लाभकारी सौदा

जायद में दलहन की फसल लाभकारी सौदा 
दलहनी का उत्पादन लगातार घटने से इनकी कीमतोे में आग लगी है। दाल गरीबों की थाली से दूर हो चुकी है। एसे में जायद की फसल उगाकर इस आग को बुझाया जा सकता है। रबी फसलों की कटाई फरवरी माह से शुरू होकर अप्रैल तक चलती रहती है और सभी खेत खाली पड़े रहते हैं। जायद ऋतु में दिन 12-13 घंटे का होने से दलहनी फसलों में ज्यादा भोजन बनता है जिससे फसल अवधि 70 से 80 दिन मात्र ही होती है। कम अवधि होने से उत्पादन लागत कम होने के साथ कीट व्याधि व जानवरों से नुकसान की संभावना भी कम हो जाती है और भरपूर उत्पादन मिलता है। 
खेत की तैयारी

प्राकृतिक हलवाहा केंचुआ से पायें प्राकृतिक जुताई

कहा जाता है कि मनुष्य धरती पर ईष्वर की सबसे खूबसूरत रचना है। डार्विन के ‘योग्यतम की उत्तरजीविता’ सिद्धांत के अनुसार मनुष्य सभी प्रजातियों में श्रेष्ठ प्रजाति है। लेकिन जीव विज्ञानी क्रिस्टोलर लाॅयड ने अपनी पुस्तक ‘व्हाट आॅन अर्थ इवाॅल्व्ड’ में पृथ्वी पर मौजूद 100 सफल प्रजातियों की सूची में केंचुए को सबसे ऊपर रखा है। उनके अनुसार केंचुआ धरती पर लगभग 60 करोड़ वर्षों से मौजूद है। जबकि मानव प्रजाति धरती पर लगभग 16 लाख वर्ष पूर्व से उपस्थित है। 

फसल चक्र को प्रभावित करने वाले कारक

1॰ जलवायु सम्बन्धी कारक ॰ जलवायु के मुख्य कारक तापक्रम वर्षा वायु एवं नमी है । यही कारक जलवायु को प्रभावित करते हैं जिससे फसल चक्र भी प्रभावित होता है । जलवायु के आधार पर फसलों को तीन वर्गो में मुख्य रूप से बांटा गया है जैसे ॰ खरीफ रबी एवं जायद ।
2॰ भूमि संबंधी कारक भूमि संबंधी कारको में भूमि की किस्म मृदा उर्वरता मृदा प्रतिकिरया जल निकास मृदा की भौतिक दशा आदि आते हैं । ये सभी कारक फसल की उपज पर गहरा प्रभाव डालते हैं 
3॰ सिंचाई के साधन सिंचाई जल की उपलब्धता के अनुसार ही फसल चक्र अपनाना चाहिए । यदि सिंचाई हेतु जल की उपलबधता कम है।

केंद्र सरकार की परंपरागत खेती विकास योजना

रसायनिक उर्वरकों के अंधाधुंध प्रयोग से दिनों-दिन घटती जमीन की उर्वरा शक्ति को फिर से बढ़ाने, उत्तम किस्म और ज्यादा पैदावार के लिए जिले में जैविक खेती की जाएगी। इसके लिए एक हजार एकड़ जमीन चिह्नित की गई है।

केंद्र सरकार की परंपरागत खेती विकास योजना के अंतर्गत पहले चरण में बुंदेेलखंड केे सभी जिलों समेत प्रदेश के 15 जिलों को इसमें शामिल किया गया है। इसमें जैविक खेती करने वाले किसानों के रजिस्ट्रेशन किए जाएंगे। योजना का मुख्य उद्देश्य रसायनिक खादों पर किसानों की बढ़ती निर्भरता खत्म करना है।

बढ़ता तापमान खेती के लिए नुकसानदायक

मौसम में एकाएक आई गर्मी व बढ़ता तापमान खेती के लिए नुकसानदायक है। इसके अलावा चेंपा व मौसमी कीट भी फसल को नुकसान पहुंचा सकते हैं।
मौसम में तापमान अधिक होने से गेहूं की फसल में ठीक से फुलाव नहीं आ पाता है और दाना भी कमजोर रह जाता है। उन्होंने किसानों को सलाह दी है कि ऐसे में फसल पर हल्की सिंचाई करें और सिंचाई उस समय करें, जब हवा तेज न हो। क्योंकि तेज हवा में बालियों के गिरने का खतरा बना रहता है।

मिली बग- की समस्या का जैविक नियंत्रण

मिली बग की प्रजातियो मे फेरेसिया वरगाटा (धारीदार मिली बग), स्यूडोकोकस लोन्गिसपिनस (लंबी पूंछ वाला मिली बग), प्लानोकोकस सिट्री (नीबूवर्गीय मिलीबग), फिनाकोकस सोलेनी (बैगन मिली बग), सेकेरीकोकस सेकेराई (गुलाबी गन्ना मिली बग), डाईस्मीकोकस ब्रिवीपेस (अनानास मिली बग), मेकोनेलीकोकस हिरसुटस (गुलाबी मिली बग), फिनाकोकस सोलनोप्सिस ( सोलनोप्सिस मिली बग), डासिचा मैंगीफेरी (आम मिली बग) आदि प्रमुख रूप से आते है।

अमृत जल

अमृत जल

यह गोबर, गौ-मूत्र और गुड को मिला कर बनया गया एक ऐसा घोल है जिसमें अवात जीवी सूक्ष्मजीवों की संख्या और विविधता बहुत अधिक होती है। इसमें मौजूद रासायनिक तत्व मिट्टी को उपजाऊ बनाते हैं और सूक्ष्मजीव मिट्टी के भौतिक और रासानिक गुणों को बढ़ाते हैं।

अमृत जल तैयार करने के लिए आवष्यक सामग्री क्या है ?

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