Organic Farming

जलकुंभियों से बनाये मूल्यवान जैविक खाद

 

देश का शायद ही कोई गांव या शहर का ऐसा हिस्सा बचा होगा जहां पर ठहरा पानी हो और उसमे जलकुम्भी का राज न हो। सरकार चाहे तो एक पंथ से दो काज कर सकती है। इसपर कंट्रोल को लेकर बेरोजगार युवाओं को प्रशिक्षित करके फिजिकल तौर पर इसे खतम किया जा सकता है और दवाइयों का निर्माण करके या आयुर्वेद की दवाइयां बनाने वाली कंपनियों को सप्लाई करके युवा मोटी कमाई कर सकते हैं। इसके और भी उपयोग हैं जैसे फर्नीचर, हैंडबैग, आर्गेनिक खाद,जानवरों के चारे के साथ कागज बनाने में भी इसका इस्तेमाल किया जा सकता है।

उर्वरकों की क्षमता बढ़ाने के उपाय

भारत देश  में 80 प्रतिशत लोग खेती में लगे हैं। अधिक फसल उत्पादन के लिये आधुनिक कृषि तकनीक में उन्नत बीज, समय से फसल बुआई, कोड़ाई, पटवन, उर्वरक का उपयोग, खरपतवार नियंत्रण, कीट व रोग नियंत्रण, समय से कटाई एवं फसल चक्र का उपयोग करने लगेे हैं। इनमें सबसे महंगा उपादान उर्वरक है।

फसल चक्र के सिद्धान्त

फसल चक्र निर्धारण से पूर्व किसान को अपनी भूमि की किस्म फसल किस्म दैनिक आवश्यताएं लागत का स्वरूप तथा भूमि की उर्वरा शकित को बनाएं रखने के उददेश्य को ध्यान में रखना चाहिए । अत फसल चक्र अपनाते समय निम्न सिद्धान्तों का अनुसरण करना चाहिए । 1 दलहनी फसलों के बाद खाधान्न फसलें बोई जाये दलहनी फसलों की जड़ों में ग्रंथियां पाई जाती है जिनमें राइजोबियम जीवाणु पाये जाते हैं । हीमोग्लोबिन की उपसिथति से ये वायुमण्डलीय नाइट्रोजन का स्थिरीकरण करती है। उदाहरण के लिए चनामक्का अरहरगेहूं मेथीकपास मूगगेहूं लोबियाज्वार आदि । इस हेतु रबी खरीफ या जायद में से किसी भी ऋतु में दलहनी फसल अवश्य लेना चाहिए । 2 गहरी जड़ व

अश्वगंधा की उन्नत खेती

भारत में अश्वगंधा अथवा असगंध जिसका वानस्पतिक नाम वीथानीयां सोमनीफेरा है, यह एक महत्वपूर्ण औषधीय फसल के साथ-साथ नकदी फसल भी है।अश्वगंधा आयुर्वेदिक चिकित्सा पद्धति में प्रयोग किया जाने वाला एक महत्वपूर्ण पौधा है। इसके साथ-साथ इसे नकदी फसल के रूप में भी उगाया जाता है। सभी ग्रथों में अश्वगंधा के महत्ता के वर्णन को दर्शाया गया है। इसकी ताजा पत्तियों तथा जड़ों में घोंड़े की मूत्र की गंध आने के कारण ही इसका नाम अश्वगंधा पड़ा। विदानिया कुल की विश्व में 10 तथा भारत में 2 प्रजातियाँ ही पायी जाती हैं। आयुर्वेदिक चिकित्सा पद्धति में अश्वगंधा की माँग इसके अधिक गुणकारी होने के कारण बढ़ती जा रही है। यह पौ

उत्पादन कम होने के कारण

1970 तक देश के अधिकांश भागों में औसत उत्पादन स्तर अधिकांश विकसित व कई विकासशील देशों (इण्डोनेशिया, फ़िलिपीन्स, मेक्सिको, ब्राजील, ईसीएम के देश आदि) से भी काफ़ी कम रहा, किन्तु 'हरित क्रान्ति' एवं निरन्तर सरकार द्वारा कृषकों को लाभप्रद मूल्य दिलाने की प्रवृत्ति से कृषक अनेक प्रकार की नई तकनीकि अपनाते रहे हैं। रबी की फ़सल काल में सरसों एवं खरीफ मेंसोयाबीन व मूंगफली का बढ़ता उत्पादन सरकार द्वारा ऊँची कीमतें निर्धारित करने से ही सम्भव हो सका है। आज राजस्थान सरसों एवं तिल, गुजरात मूंगफली एवं मध्य प्रदेश सोयाबीन उत्पादक प्रमुख प्रदेश बन गये हैं। भाग्यवादी भारतीय किसान कृषि उत्पादन संबंधी उसे पर्या

धान की फसल में महावार महत्वपूर्ण कार्य

मई

१ पंत-४ सरजू-५२ आई.आर.-३६ नरेन्द्र ३५९ आदि।

२ धान के बीज शोधन बीज को १२ घन्टे पानी मे भिगोकर तथा सुखाकर नर्सरी में बोना।

जून

१ धान की नर्सरी डालना। सुगन्धित प्रजातियां शीघ्र पकने वाली।

२ नर्सरी में खैरा रोग लगने पर जिंक सल्फेट तथा यूरिया का द्दिडकाव सफेदा रोग हेतु फेरस सल्फेट तथा यूरिया का द्दिडकाव

३ धान की रोपाई

४ रोपाई के समय संस्तुत उर्वरक का प्रयोग एवं रोपाई के एक सप्ताह के अंदर ब्यूटाक्लोर से खरपतवार नियंत्रण

जुलाई

ड्रेगन फ्रूट की खेती

आम तौर पर ड्रेगन फ्रूट थाइलैंड, वियतनाम, इज़रायल और श्रीलंका में लोकप्रिय है। बाजार में 200 रु से 250 रु तक दाम मिलने की वजह से हाल के दिनों में भारत में भी इसकी खेती का प्रचलन बढ़ा है। कम वर्षा वाले क्षेत्र इसकी खेती के लिए उपयुक्त माने जाते हैं। ड्रेगन फ्रूट के पौधे का उपयोग सजावटी पौधे के साथ साथ ड्रेगन फ्रूट उपजाने के लिए होता है। ड्रेगन फ्रूट को ताजे फल के तौर पर खा सकते हैं साथ ही इस फल से जैम, आइस क्रीम, जैली, जूस और वाइन भी बना सकते हैं। सौंदर्य प्रसाधन के तौर पर भी इसे फेस पैक के रूप में इस्तेमाल किया जाता है।

ग्वारपाठा के पौधे के रोग

ग्वारपाठा या घृतकुमारी (aloevera) कांटेदार पत्तियों वाला पौधा हैं, जिसमें रोग को दूर करने के बहुत सारे गुण भरे होते हैं। यह भारत के गर्म जगहों में पाया जाने वाला एक बारहमासी पौधा हैं और लिलिएसी परिवार से संबंधित हैं। आयुर्वेद में इसे घृतकुमारी के नाम से जाना जाता है । ग्वारपाठा की 200 जातियां होती हैं, परंतु इसकी 5 जातियां ही मानव शरीर के लिए उपयोगी हैं। यह खून की कमी को दूर करता हैं तथा शरीर की रोग-प्रतिरोधक क्षमता को बढ़ाता हैं। पत्तियों का रस माइकोबैक्टीरियम क्षयरोग के विकास को रोकता हैं। यह एंटीइन्फ्लामेंटरी, एंटीसेप्टिक, एंटी अलसर, एंटी टूमओर और मधुमेह के उपचार में कारगर हैं। अर्द्ध ठो

जैविक खेती से फसलो की ज्यादा पैदावार और ज्यादा आय

फ़सल की लागत कम पानी कि मात्रा कम लगती है मृदा क संरचना सुधरती है जिस से फ़सल का विकास अच्छा होता है हर पर्यावरन सुधरता है मित्र कीटो के कारन उत्पादन बड़ता है

जैव तत्व के कारन फ़सल मे अन्य तत्व कि उपलब्धता बढ़ जाती है 

पौधो को जढ़ों तक हवा पानी अच्छे से मिलता है जिस से पौधा स्वस्थ होता है

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